नरेंद्र मोदी ने जब देश की सत्ता संभाली थी तो उन्होंने विदेशों में प्रशिक्षित अर्थशास्त्रियों को आर्थिक नीतियों की रूपरेखा तय करने की जिम्मेदारी दी थी। इनमें आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन, अरविंद पानगड़िया और अरविंद सुब्रमण्यम प्रमुख तौर पर शामिल हैं। राजन को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आरबीआई का गवर्नर नियुक्त किया था, जिन्हें पीएम मोदी ने बनाए रखा था। एक-एक कर तीनों अर्थशास्त्रियों ने पद छोड़ दिए। कार्यकाल पूरा होने के बाद राजन वापस शिकागो यूनिवर्सिटी में पढ़ाने चले गए। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले पानगड़िया को पीएम मोदी ने नीति आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था, लेकिन छुट्टियां खत्म होने के बाद वह भी पिछले साल अमेरिका लौट गए। पिछले महीने भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने भी पद छोड़ने की घोषणा कर दी थी। सुब्रमण्यम आईएमएफ के साथ भी जुड़े रह चुके हैं। उन्होंने परिवार को ज्यादा समय देना और शोध व लेखन को वक्त देने की बात कही थी। इस तरह मोदी सरकार ने उदारीकरण को बढ़ावा देने के लिए जिन तीन विदेशी अर्थशास्त्रियों को लाया था वे सभी जा चुके हैं। ‘रॉयटर्स’ के अनुसार, नीतियां तय करने की अधिकांश जिम्मेदारी पीएमओ ने अपने हाथ में ले ली है। इस प्रक्रिया में दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी सोच रखने वाले अर्थशास्त्रियों का एक गुट शामिल हैं। रॉयटर्स ने कम से कम एक दर्जन सरकारी अधिकारियों, सलाहकारों और बीजेपी के सदस्यों से बात करने के बाद यह दावा किया है।
घरेलू विशेषज्ञों की सुनेगी मोदी सरकार!: आरएसएस से जुड़ी संस्था को उम्मीद है कि विदेशी अर्थशास्त्रियों के जाने के बाद मोदी सरकार घरेलू विशेषज्ञों की बात सुनेगी। स्वदेशी जागरण मंच के प्रमुख अश्वनी महाजन ने कहा, ‘अरविंद सुब्रमण्यम के जाने के बाद हमारी अपेक्षा है कि मोदी सरकार अब घरेलू विशेषज्ञों की बात सुनेगी। इन विदेशी अर्थशास्त्रियों की रवानगी से देश को कोई नुकसान नहीं होगा। अध्ययन-अध्यापन के नाम पर छुट्टी लेकर आने वाले लोगों के दम पर राष्ट्र का निर्माण नहीं किया जा सकता है। भारत की समस्याओं को देश की मिट्टी से जुड़े सलाहकार ही बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।’ बता दें कि स्वदेशी जागरण मंच ने एयर इंडिया को निजी हाथों में सौंपने और वालमार्ट द्वारा फ्लिपकार्ट को खरीदने का प्रबल विरोध किया है। रिपोर्ट के अनुसार, अरुण जेटली के बीमार पड़ने के बाद से अरविंद सुब्रमण्यम को नजरअंदाज किया जाने लगा था। एक अधिकारी ने बताया कि सरकार किसी भी तरह के स्वतंत्र आवाज को सुनने के लिए तैयार नहीं है। उन्हें बस ‘यस मैन’ चाहिए जो बस उनकी हां में हां मिलाएं।
