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जब ‘फ्लाइंग सिख’ ने उड़ा दिये थे पाकिस्तानी फील्ड मार्शल के होश!, बंटवारे के जख्म से बुलंदियों तक ऐसी है मिल्खा की कहानी

पद्मश्री से सम्मानित धावक मिल्खा सिंह एथलेटिक्स में दुनियाभर में भारत का परचम लहराया है। 20 नवंबर 1929 को पाकिस्तान के गोविंदपुरा में जन्मे मिल्खा का एक महीने तक कोरोना संक्रमण से जूझने के बाद शुक्रवार देर रात 11:30 बजे चंडीगढ़ में निधन हो गया।

फ्लाइंग सिख के नाम से विख्यात महान फर्राटा धावक मिल्खा सिंह का निधन हो गया। (Express File)

भारत के इतिहास में जब-जब महान धावकों को याद किया जाएगा लोगों के जहन में सबसे पहला नाम ‘फ्लाइंग सिख’ मिल्खा सिंह का नाम आएगा। पद्मश्री से सम्मानित धावक मिल्खा सिंह ने एथलेटिक्स में दुनियाभर में भारत का परचम लहराया है। 20 नवंबर 1929 को पाकिस्तान के गोविंदपुरा में जन्मे मिल्खा का एक महीने तक कोरोना संक्रमण से जूझने के बाद शुक्रवार देर रात 11:30 बजे चंडीगढ़ में निधन हो गया।

भारत को मिल्खा सबसे बड़ा ट्रैक और फील्ड मैडल जिता सकते थे। लेकिन वे रोम ओलंपिक में कांस्य पदक से 0.1 सेकंड से चूक गए थे। दरअसल मिलखा कि आदत थी कि हर रेस में वे एक दफा पीछे मुड़कर जरूर देखते थे। रोम ओलिंपिक में मामला बहुत करीब का था। जबरदस्त ढंग से शुरुआत करने के बाद उन्होंने वही किए जो हमेशा करते थे। मिल्खा ने रेस के बीच में पीछे पलटकर देखा और अपनी लय खो बैठे।

सबसे बड़े मैडल से चूके –
इस रेस में कांस्य पदक विजेता का समय 45.5 था और मिल्खा ने 45.6 सेकेंड में दौड़ पूरी की थी।’ इस रेस में 250 मीटर तक मिल्खा पहले स्थान पर भाग रहे थे। लेकिन इसके बाद उनकी गति कुछ धीमी हो गई और बाकी के धावक उनसे आगे निकल गए थे। मिल्खा ने अपने करियर में भारत के लिए एशियाई खेलों में 4 स्वर्ण पदक और राष्ट्रमण्डल खेल में एक गोल्ड मेडल जीते हैं।

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बंटवारे का जख्म –
भारत-पाकिस्तान बंटवारे ने बहुत सारे लोगों को अनाथ और बेघर किया था जिसमें से मिल्खा सिंह भी एक हैं। बंटवारे के दौरान उनके माता-पिता की मौत हो गई थी। जिसके बाद वे अपनी बहन के साथ भारत आ गए थे और एथलीट के रूप भारतीय सेना में शामिल हो गए।

1947 में बंटवारे के दो दिन बाद मिल्खा के गांव में दंगे हो गए। उनके पिता ने मिल्खा को मुल्तान भेजा, जहां उनके बड़े भाई माखन सिंह तैनात थे। माखन तीन दिन बाद कोट अड्डू अपनी यूनिट के साथ पहुंचा। लेकिन तब तक मिल्खा के माता-पिता और दो भाइयों को दंगाइयों ने मार डाला था।

इस दर्दनाक मंजर के बाद वे पाकिस्तान से महिला बोगी के डिब्बे में बर्थ के नीचे छिपकर दिल्ली पहुंचे। अपने भाई मलखान सिंह के कहने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया और चौथी कोशिश के बाद साल 1951 में सेना में भर्ती हो गए।

1962 के जकार्ता एशियाई खेलों के दौरान मिल्खा सिंह। (Express Archive)

आजाद भारत का पहला गोल्ड –
साल 1958 में हुए राष्ट्रमण्डल खेल के दौरान मिल्खा सिंह एक अपरिचित नाम था। उन्हें कोई नहीं जानता था। लेकिन पंजाब के एक साधारण लड़के ने बिना किसी प्रॉपर ट्रेनिंग के साउथ अफ्रीका के मैल्कम स्पेंस को पछाड़ते हुए इतिहास रच दिया। मिल्खा ने राष्ट्रमण्डल खेल में आजाद भारत का पहला गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

नैशनल रिकॉर्ड –
मिल्खा ने 1958 के एशियन गेम्स में नैशनल रिकॉर्ड बनाया। मिल्खा सिंह को 400 मीटर की दौड़ बहुत भाती थी। यहां उन्होंने 47 सेकंड में गोल्ड मेडल हासिल किया। सिल्वर मेडल जीतने वाले पाब्लो सोमब्लिंगो से करीब दो सेकंड कम वक्त लिया था मिल्खा सिंह ने।

अब्दुल खालिद को हराया –
दूसरा गोल्ड मेडल और खास था। 200 मीटर की दौड़ में मिल्खा ने चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के अब्दुल खालिद को हराया था। खालिद ने गेम्स के नए रेकॉर्ड के साथ 100 मीटर में गोल्ड मेडल जीता था। खालिद को एशिया का सर्वश्रेष्ठ फर्राटा धावक कहा जाता था। मिल्खा, लेकिन शानदा फॉर्म में थे। उन्होंने महज 21.6 सेकंड में गोल्ड मेडल जीतकर एशियन गेम्स का नया रेकॉर्ड बना दिया। फिनिशिंग लाइन पर टांग की मांसपेशियों में खिंचाव आने की वजह से गिर गए थे। वह 0.1 सेकंड के अंतर से जीते और लोगों ने मान लिया कि इस ऐथलीट ने काफी मुकाम हासिल करने हैं।

पाकिस्तानी फील्ड मार्शल अयूब खान के होश उड़ाए –
पाकिस्तान में एक प्रतियोगिता के दौरान मिलखा को दौड़ते हुए देखकर पाकिस्तानी फील्ड मार्शल अयूब खान के होश उड़ गए थे। मिल्खा की प्रतिभा और रफ्तार को देखते हुआ अयूब खान ने उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ का खिलाब दिया था।

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