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राजनीति: सौर ऊर्जा से चमकेगी दुनिया

दुनिया को सौर ऊर्जा का पक्षधर सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए कि वह धीरे-धीरे सस्ती होती जाएगी, बल्कि इसकी जरूरत इसलिए भी है कि बांध बना कर या ताप बिजली घर लगा कर भी भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता है।

Author Updated: December 29, 2020 3:51 AM
energyसौर ऊर्जा का सांकेतिक फोटो।

अभिषेक कुमार सिंह

पांच साल पहले वर्ष 2015 में पेरिस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में उल्लेखनीय पहल करते हुए भारत ने सूर्यपुत्र सौ देशों का एक सौर गठबंधन बनाने की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य एक ओर सौर ऊर्जा के हिसाब से धनी (जिन देशों में ज्यादा धूप रहती है) एक सौ दो देशों को एक मंच पर लाना और अंतरराष्ट्रीय सौर बाजार को आगे बढ़ाना था, तो दूसरी ओर भारत में भी सौर बिजली उत्पादन में उल्लेखनीय इजाफा करना था।

तब कहा गया था कि अगर यह गठजोड़ मुकम्मल रूप में सामने आता है तो दुनिया की काया पलटने के साथ-साथ भारत की तकदीर भी बदल सकता है। सबसे ज्यादा असर खुद भारत के अंदर ही होने की उम्मीद जताई गई थी, क्योंकि तब इसमें अगले सात वर्षों में (यानी 2022 तक) एक लाख मेगावाट (एक सौ गीगावाट) बिजली भारत में सूरज से बनाने का लक्ष्य रखा गया था। हाल के एक घटनाक्रम को देखें तो कह सकते हैं कि भारत इस दिशा में काफी तेजी से बढ़ रहा है।

इसी महीने गुजरात के कच्छ क्षेत्र में बनने वाले दुनिया के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा पार्क (रिन्यूएबल एनर्जी पार्क) की नींव रखी गई। भारत-पाकिस्तान सीमा के पास भुज से बहत्तर किलोमीटर उत्तर की ओर खावड़ा में पूरी तरह से बंजर जमीन पर बनने वाला यह सौर ऊर्जा पार्क बहत्तर हजार से अधिक हेक्टेयर जमीन पर फैला होगा। सौर बिजली बनाने की इन कोशिशों का एक मतलब यह निकलता है कि भारत और ऐसी पहल करने वाले दुनिया के अन्य देश पृथ्वी पर कार्बन उत्सर्जन से होने वाली समस्याओं में कमी लाने की कोशिश कर रहे हैं।

ऊर्जा के लिए सूरज पर निर्भरता की कई वजहें हैं। पहली तो यही है कि ऊर्जा प्राप्त करने के जो दूसरे साधन हैं उनकी या तो भंडार क्षमता बहुत सीमित है या फिर उनके कई खतरे हैं। जैसे ताप बिजली संयंत्रों में तेल अथवा कोयले को जला कर बिजली पैदा की जाती है और ये दोनों ही स्रोत भविष्य में खत्म हो सकते हैं। इसके अलावा इनसे कार्बन डाईआक्साइड आदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है जिससे वैश्विक तापमान बढ़ने जैसी समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं।

इसके बाद पानी से विशालकाय टर्बाइन चला कर जो जलविद्युत परियोजनाएं चलाई जा रही हैं, उनकी भी अपनी सीमाएं हैं। जरूरत बढ़ने पर उनके लिए बांधों का आकार बढ़ाया जा रहा है, लेकिन भूकंप में उनके ढहने और प्रलय जैसे हालात बन जाने का खतरा हमेशा खड़ा रहता है। साथ ही, इन बड़े बांधों में जमा गाद (तलहटी में जमा मिट्टी और वनस्पति के अंश) से भारी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है जो ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ाती है।

जहां तक बात है परमाणु बिजली संयंत्रों की, तो इनसे स्वच्छ ऊर्जा तो मिलती है जिसका कोई सीधा पर्यावरणीय प्रभाव पैदा नहीं होता, लेकिन दूसरे खतरे काफी ज्यादा हैं। जैसे, भूकंप, सुनामी या युद्ध की स्थिति में यदि परमाणु संयंत्र को कोई नुकसान पहुंचता है तो उससे होने वाले रिसाव से खतरनाक विकिरण फैल सकता है, जो सभी जीवधारियों के लिए संहारक हो सकता है।

इसके अलावा परमाणु संयंत्रों से निकलने वाले रेडियोएक्टिव कचरे के सुरक्षित निपटान की समस्या भी पैदा होती है। ऐसे में नाभिकीय ऊर्जा एक सुरक्षित विकल्प नहीं मानी जाती। वैसे तो जैव ईंधन (बायोफ्यूल), पवन ऊर्जा और भूतापीय ऊर्जा जैसे कुछ और ऊर्जा उत्पादन के विकल्प हैं, लेकिन ये उतने कारगर नहीं साबित हुए हैं जितनी सौर ऊर्जा। सौर बिजली पैदा करने के लिए हमारे देश में राजस्थान और गुजरात में विशालकाय संयंत्र लगाए जा रहे हैं। हालांकि सौर ऊर्जा हासिल करने के लिए जरूरी नहीं कि बड़े प्लांट ही लगाए जाएं।

घरों की छतों पर भी छोटे-छोटे प्लांट स्थापित किए जा सकते हैं। बहरहाल, ऊर्जा के सारे स्रोतों की क्षमता और उनके सकारात्मक-नकारात्मक पहलुओं का अध्ययन जिस एक निष्कर्ष पर जाकर ठहरता है, वह यह है कि भविष्य में सूरज ही हमारा कल्याण करेगा। खास तौर से विषुवत रेखा से कर्क रेखा के बीच पड़ने वाले करीब सौ देशों के लिए सौर ऊर्जा एक वरदान ही साबित हो सकती है क्योंकि इन देशों में वर्षा ऋतु को छोड़ कर पूरे साल अच्छी धूप खिली रहती है। ये देश अगर सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ा दें तो न सिर्फ ये अपनी काफी सारी ऊर्जा जरूरतें एक अक्षय ऊर्जा स्रोत से पूरी करेंगे, बल्कि दुनिया के कार्बन उत्सर्जन में भी जबर्दस्त कटौती देखने को मिलेगी।

पृथ्वी पर सूरज से आने वाली धूप की ताकत का अंदाजा लगाते हुए इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आइईए) ने वर्ष 2014 में एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसका अनुमान यह है कि सन 2050 तक सौर ऊर्जा से ही सबसे ज्यादा मात्रा में बिजली बनाई जा रही होगी। इस आकलन के मुताबिक सौर ऊर्जा की एक तकनीक सोलर फोटोवोल्टिक (पीवी) सिस्टम से 2050 तक दुनिया की जरूरत की सोलह फीसद बिजली संसार में पैदा की जा रही होगी। इसकी दूसरी तकनीक- सोलर थर्मल इलेक्ट्रिसिटी (एसटीई) से करीब ग्यारह फीसद बिजली अलग मिल रही होगी। इन दोनों सौर तकनीकों से 2050 तक इतनी बिजली मिल सकेगी जिससे लगभग छह अरब टन कार्बन डाईआॅक्साइड का उत्सर्जन हर साल रोका जा सकेगा। यह मात्रा मौजूदा समय में ही पूरे विश्व के परिवहन क्षेत्र द्वारा छोड़ी जा रही कार्बन डाईआॅक्साइड के बराबर है।

इस समय भारत में सबसे ज्यादा उनसठ फीसद बिजली कोयले से बनाई जाती है। इसे ताप (थर्मल) बिजली कहा जाता है। इसकी वजह यह है कि कोयले से मिलने वाली बिजली सबसे सस्ती पड़ती है। देश में सत्रह फीसद बिजली जलविद्युत परियोजनाओं से, नौ फीसद प्राकृतिक गैस से, तीन फीसद नाभिकीय संयंत्रों से और बारह फीसद अक्षय ऊर्जा स्रोतों यानी हवा या सूरज से पैदा की जाती है। परमाणु संयंत्रों से मिलने वाली बिजली के बारे में भी कहा जाता है कि दूसरे स्रोतों की तुलना में यह भविष्य में काफी सस्ती पड़ेगी।

लेकिन जो लोग सौर ऊर्जा के पैरोकार हैं, वे इसके गणित को समझते हुए कहते हैं कि जैसे-जैसे सौर ऊर्जा का विस्तार होगा, उसकी लागत घटती जाएगी और निकट भविष्य में यही ऊर्जा का सबसे सस्ता विकल्प होगा। फिलहाल हमारे देश में उत्पादित होने वाली सौर बिजली की प्रति यूनिट औसत कीमत 6.50 रुपए पड़ती है जो कोयले से मिलने वाली बिजली के मुकाबले औसतन चौदह फीसद ज्यादा है।

भारत में अभी सोलर बिजली इसलिए महंगी है क्योंकि इसके उत्पादन से जुड़ी परियोजनाओं पर काम देरी से शुरू हुआ। जर्मनी में सौर बिजली का उत्पादन वर्ष 2001 में ही शुरू हो गया था और अब वहां छत्तीस हजार मेगावाट बिजली पैदा की जाती है, जबकि भारत में इसकी शुरुआत 2012 में हुई और तब के पच्चीस मेगावाट उत्पादन से हाल तक बढ़ोत्तरी सिर्फ 1760 मेगावाट तक हो पाई है।

दुनिया को सौर ऊर्जा का पक्षधर सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए कि वह धीरे-धीरे सस्ती होती जाएगी, बल्कि इसकी जरूरत इसलिए भी है कि बांध बना कर या ताप बिजली घर लगा कर भी भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता है। इसके बरक्स पृथ्वी हर साल लगभग एक लाख बीस हजार टेरावाट (सौर ऊर्जा को नापने वाली एक इकाई) सौर ऊर्जा प्राप्त करती है, जबकि पूरी दुनिया की बिजली की सालाना खपत फिलहाल 15-20 टेरावॉट ही है।

अनुमान तो यह भी लगाया जाता है कि इंसान को इस वक्त जितनी बिजली की आवश्यकता पूरे साल सभी कार्यों के लिए है, उतनी सौर ऊर्जा तो एक ही दिन में पृथ्वी पर पहुंच जाती है। जाहिर है, यदि हम सूरज से आने वाली सारी ऊर्जा को समेट सकें तो अपनी जरूरतें ही पूरी नहीं कर सकेंगे, बल्कि पृथ्वी जैसे सैकड़ों ग्रहों को भी जगमग कर सकते हैं।

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