10 साल सरकार में रहने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) नेतृत्व की लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) का केरल में इस बार सूपड़ा साफ हो गया। इसी हार के साथ 49 साल में पहली बार देश में वामदल की किसी भी राज्य में अब इनकी कहीं भी सरकार नहीं रहेगी। 1977 के बाद ऐसा हो रहा है कि देश के किसी भी राज्य में वाम दल की सरकार नहीं है।

केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में वाम दल की सरकार का इतिहास रहा है। देश में पहली बार केरल ही वह राज्य था, जहां 1957 में वाम दल की सरकार बनी थी और 2026 की विधानसभा चुनाव में हार के साथ ही यह आखिरी राज्य भी बना जहां से वाम दल की सत्ता से विदाई हो गई।

2026 के इस विधानसभा चुनाव में लेफ्ट डेमोक्रेट को यूडीएफ (यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) दल से हार मिली है।

केरल

1957 में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया ने पहली बार केरल में अपनी सरकार बनाई थी। इतना ही नहीं यह वह साल था जब पूरे विश्व में किसी राज्य में कहीं वाम दल की सरकार बनी थी।

इस सरकार ने कई नीतियां शुरू की थी, जैसे कि व्यापक कृषि और भूमि सुधार, जिन्हें हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए कल्याणकारी उपायों के साथ लागू किया गया था।

राज्यसभा सांसद एक रामचंद्रन पिल्लई ने लिखा कि मुख्यमंत्री ईएमएस नंबूदिरिपाद की सरकार ने भारत में पहली बार पिछड़े समाज के एक वर्ग को आरक्षण के लाभों से वंचित करने का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने आगे कहा कि क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित करने की वर्तमान प्रथा भी इसी सिफारिश के जमीन पर आई।

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में 1977 से 2011 तक कम्युनिस्ट पार्टी का सबसे लंबा शासन रहा। बंगाल में 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। आजादी के बाद पार्टी ने बंगाल में 1977 में कांग्रेस की चुनावी धांधली और इमरजेंसी के दौरान अत्याचारों को दिया। कुछ समय बाद 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी दो भागों में बंट गई, पहली सीपीआई और दूसरी सीपीआई (एम।

करीब तीन दशक बाद 2011 में पश्चिम बंगाल में भी लेफ्ट की सरकार की विदाई हो गई और वजह बनी ममता बनर्जी। ममता बनर्जी ने जमीन अधिग्रहण आंदोलन चलाकर पश्चिम बंगाल से वाम सरकार की विदाई कर दी।

त्रिपुरा

त्रिपुरा में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार साल 1977 में बनी थी। वाम ने यहां कई चुनाव जीते, इसमें मुख्यमंत्री माणिक सरकार का 1998 से 2018 तक दो दशक लंबा शासन भी शामिल है। त्रिपुरा में करीब 70 फीसदी आबादी बंगाली है और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट का प्रभाव त्रिपुरा में भी पहुंच गया था। कम्युनिस्टों ने आजादी से बहुत पहले ही इस राज्य में काम करना शुरू कर दिया था। इन्होंने मुख्य रूप से आदिवासियों के बीच में काम किया और पार्टी को शक्तिशाली बनाया। कम्यूनिस्टों ने यहां शाही परिवारों को निशाना बनाया और गरीबों पर अत्याचार करने के आरोप लगाए।

भाजपा ने यहाँ साल 2018 में जीत दर्ज की और इस जीत का श्रेय अपने कार्यकर्ताओं और आरएसएस को दिया। जिन्होंने यहां महिलाओं, युवाओं और आदिवासियों का एकजुट किया था।

ऐसे में अब लेफ्ट पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं, क्योंकि यह पार्टी धीर-धीरे अपने पतन की ओर बढ़ रही है।