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चीन युद्ध के बाद पहली बार संसद सत्र में नहीं पूछे जाएंगे सवाल, जानिए प्रश्नकाल से जुड़े सवालों के जवाब

Chakshu Roy: संसद के आगामी मानसून सत्र में प्रश्नकाल और ना ही गैर सरकारी विधेयक लाए जाने की अधिसूचना पर विपक्षी दलों नाराजगी जाहिर की है।

Translated By Ikram नई दिल्ली | Updated: September 3, 2020 9:54 AM
संसद भवन की तस्वीर। (पीटीआई)

Chakshu Roy

चीन से तनातनी और कोरोना वायरस महामारी के बीच लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय ने बुधवार को अधिसूचना जारी कर बताया कि मानसून सत्र के दौरान प्रश्नकाल नहीं होगा। अधिसूचना के मुताबिक दोनों सदनों की कार्यवाही अलग-अलग पालियों में सुबह नौ बजे से एक बजे तक और तीन बजे से सात बजे तक चलेगी। शनिवार तथा रविवार को भी संसद की कार्यवाही जारी रहेगी। संसद सत्र की शुरुआत 14 सितंबर को होगी और इसका समापन एक अक्टूबर को प्रस्तावित है।

संसद के आगामी मानसून सत्र में प्रश्नकाल और ना ही गैर सरकारी विधेयक लाए जाने की अधिसूचना पर विपक्षी दलों नाराजगी जाहिर की है। अधिसूचना जारी होने के बाद कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और भाकपा सहित कई विपक्षी दलों के नेता भड़क उठे और प्रश्नकाल स्थगित करने के फैसले की आलोचना करते हुए सरकार पर आरोप लगाया है कि वह कोविड-19 महामारी के नाम पर ‘लोकतंत्र की हत्या’ और ‘संसद को एक नोटिस बोर्ड’ बनाने की कोशिश कर रही है।

लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया, ‘सत्र के दौरान प्रश्न काल नहीं होगा। कोरोना महामारी के चलते पैदा हुई असाधारण परिस्थितयों को देखते हुए सरकार के आग्रह के मुताबिक लोकसभा अध्यक्ष ने निर्देश दिया है कि सत्र के दौरान गैर सरकारी विधेयकों के लिए कोई भी दिन तय ना किया जाए।’ ऐसी ही एक अधिसूचना राज्यसभा सचिवालय की ओर से जारी की गई है।

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ऐसें में हम यहां आपको बताएंगे कि प्रश्नकाल और शून्यकाल के दौरान संसद के दोनों सदनों में क्या होता है-
प्रश्नकाल क्या है और इसका क्या महत्व है?
प्रश्नकाल विपक्षी सदस्यों का एक मजबूत हथियार माना जाता है। प्रश्नकाल के दौरान संसद सदस्य मंत्रियों से सवाल पूछते हैं और अपने मंत्रालयों के कामकाज के लिए उन्हें जवाबदेह ठहराते हैं। पिछले सत्तर सालों में सांसदों ने सरकारी कामकाज की जानकारी के लिए इस ‘संसदीय डिवाइस’ का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया है। इस दौरान सांसदों द्वारा पूछे गए सवालों ने वित्तीय अनियमितताओं को उजागर किया है और सरकारी कामकाज के बारे में जानकारी और डेटा सार्वजनिक पटल पर पहुंचाई है। आजादी से पहले 1893 में सरकार से पहली बार सवाल पूछा गया था।

शून्यकाल का क्या होता है?
शून्यकाल की शुरुआत व्यवस्थित रूप से भारतीय संसद के पहले दशक में शुरू हुई जब सांसदों को निर्वाचन क्षेत्र और राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने की जरुरत महसूस हुई। शुरुआती दिनों में दोपहर एक बजे लंच के लिए संसद की कार्यवाही को विराम दिया जाता था। इसलिए सांसदों को अग्रिम सूचना या एडवांस नोटिस के बिना राष्ट्रीय मुद्दों को दोपहर 12 बजे उठाने का समय उपलब्ध हो गया। सदन के सदस्य लंच के लिए स्थगित होने के एक घंटे पहले तक अपने सवाल उठा सकते थे। इसी अवधारणा के चलते इस एक घंटे को शून्यकाल कहा जाता है और इस समय के दौरान उठाए गए मुद्दों को शून्यकाल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

हालांकि पिछले कुछ सालों में दोनों सदनों के पीठासीन ने इसे और भी प्रभावी बनाने कि लिए शून्यकाल के कामकाज को सुव्यवस्थित करने के लिए निर्देश दिए हैं। इसके महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके नियम पुस्तिका का हिस्सा ना होने के बावजूद मीडिया, सांसदों और पीठासीन अधिकारियों का समर्थन है। बता दें कि साल 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद ऐसा पहली बार है जब सदन में सवाल नहीं पूछे जाएंगे।

प्रश्नकाल कितनी बार होता है?
1952 में संसद के शुरुआती दिनों की बात करें तो लोकसभा नियमों के अनुसार प्रश्नकाल प्रतिदिन होते थे। राज्यसभा में सप्ताह में दो प्रश्नकाल का प्रावधान था। कुछ महीने बाद इसे सप्ताह में चार बार कर दिया गया। इसके बाद साल 1964 से प्रश्नकाल राज्यसभा में सत्र के प्रतिदिन होने लगा। अब संसद के दोनों सत्रों में प्रश्नकाल सत्र संचालन के सभी दिन होते हैं। हालांकि दो दिन ऐसे भी हैं जो अपवाद है। यानी जिस दिन राष्ट्रपति सेंट्रल हॉल में दोनों सदनों के सांसदों को संबोधित करते हैं उस दिन कोई प्रश्नकाल नहीं होता। राष्ट्रपति का भाषण नई लोकसभा की शुरुआत और नए संसद वर्ष के पहले दिन होता है। इसके अलावा जिस दिन वित्त मंत्री बजट पेश करते हैं उस दिन प्रशकान निर्धारित नहीं होता है। बता दें कि लोकसभा के आरंभ के बाद से निचले सदन में करीब 15 हजार सवाल पूछ गए हैं।

 

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