केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने द इंडियन एक्सप्रेस को एक इंटरव्यू दिया। इसमें उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन, एग्जाम पेपर लीक, बेरोजगारी से लेकर शिक्षा और रोजगार, सरकारी स्कूलों की क्वालिटी, नौकरियां बनाने में प्राइवेट सेक्टर की भूमिका और Gen Z के सामने आने वाले मौके और चुनौतियों पर बात की।

सवाल: जब आपने जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन देखा, तो आपका पहला इंप्रेशन क्या था? क्या आपको लगता है कि यह सिर्फ NEET पेपर लीक के बारे में था? प्रदर्शन करने वाले सिर्फ NEET के उम्मीदवार ही नहीं थे, बल्कि वे लोग भी थे जो रोजगार, खासकर जॉब मार्केट में मौकों की कमी के बारे में चिंता जता रहे थे।

जवाब: जब ऐसे युवा एक जगह विरोध प्रदर्शन करने आते हैं, तो उनके मुद्दे कभी भी एक चीज़ तक सीमित नहीं होते। वह उम्र 16 से 26 के बीच बहुत डायनामिक उम्र होती है। नौकरियां? हां, क्यों नहीं… पेपर लीक? हां, हमें करना चाहिए… क्योंकि वे अभी भी बहुत आदर्शवादी हैं। और उस उम्र में, जो कुछ भी गलत हो रहा होता है, भले ही वह दुनिया के एक हिस्से तक ही सीमित हो, वे उसे अपना लेते हैं। हां, हम इसके लिए भी लड़ेंगे। तो NEET एग्जाम लीक का दूसरी चीज़ों तक फैलना उस उम्र के ग्रुप के लिए बहुत आम बात है।

सवाल: तो क्या कई मुद्दे थे जो उन्हें परेशान करते थे?

जवाब: एक बहुत ही खास बात थी। कोई एक जैसी बात या कोई एक हायरार्किकल लीडरशिप नहीं थी जो सबकी चिंताओं को आवाज़ दे। हां, एक ग्रुप में कुछ लोग थे जो लीडर थे, और उन्होंने पेपर लीक के बारे में चिंताएं ज़ाहिर कीं। लेकिन दूसरे ग्रुप भी थे जिनके दूसरे इंटरेस्ट थे। वे इंटरेस्ट इस लीडरशिप पर अपलोड नहीं हो रहे थे। दूसरे लोग थे जिनके दूसरे इश्यू थे। चाहे वह जॉब हो या कहीं और कुछ और, उन पर कुछ पत्रकारों ग्रुप से बात की जा रही थी जो उनसे संपर्क करते थे। बहुत सारे ग्रुप अपने-अपने मकसद के लिए बोल रहे थे। यह आम बात है, हर कोई इसे समझता था।

सवाल: काफी संख्या में ग्रेजुएट न तो शिक्षा में काम कर रहे हैं और न ही ट्रेनिंग में, जो एक गहरे मुद्दे की ओर इशारा करता है। सरकारी नौकरियों पर बहुत ज़्यादा निर्भरता है, लेकिन वे कुल रोज़गार का सिर्फ़ 1-2% हैं। ग्रेजुएट्स की संख्या अच्छी प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों की उपलब्धता से कहीं ज़्यादा है और सिर्फ़ एक छोटा सा हिस्सा ही फ़ॉर्मल कॉन्ट्रैक्ट के साथ रेगुलर सैलरी वाली नौकरी पा रहा है, तो किन स्ट्रक्चरल सुधारों की ज़रूरत है?

जवाब: देखिए, जिन कोर्स में हम सब जाते हैं, शामिल होते हैं और उनसे निकलते हैं, वे आपको नौकरियों के लिए तैयार नहीं करते। लेकिन मज़े की बात यह है कि वे आपको एंटरप्रेन्योर बनने के लिए भी तैयार नहीं करते। आपको किसी के लिए काम करने की जरूरत नहीं है। आप खुद कुछ कर सकते हैं। लेकिन कोर्स आपको काफ़ी नहीं देते। उदाहरण के लिए अगर आप किसी विकसित देश में हैं, तो वे एक युवा व्यक्ति को उन विषय में उच्च शिक्षा करने का ऑप्शन देते हैं जिनमें उनकी दिलचस्पी है या किसी लोकल टेक्निकल यूनिवर्सिटी में जाने का जो एक खास स्किल सिखाती है और फिर आपको यह भी बताती है कि उस स्किल को कैसे हैंडल करना है और आप उस स्किल से क्या-क्या कर सकते हैं।

फिर यह आपको यह भी बताता है कि मैनेजमेंट के मामले में यह आपको कहां तक ले जाएगा। आप अपने काम खुद मैनेज करें, या कोई ऐसा हो जो आपके लिए इसे मैनेज कर सके। तो, यह आपको मार्केटप्लेस के लिए तैयार करता है, या तो किसी के लिए एम्प्लॉई बनने के लिए या अपना काम करने के लिए। हमारे यूनिवर्सिटी कोर्स में ऐसा नहीं होता। वे आपको एक सर्टिफिकेट देते हैं, जो किसी चीज़ का बैचलर डिग्री होता है। अगर आपने इकोनॉमिक्स या पॉलिटिकल साइंस किया है, तो उसके बाद आप उसका क्या करते हैं? BA के बाद, आप क्या करते हैं? आप MA करते हैं। लेकिन MA के बाद, आपके पास कुछ होना चाहिए। UGC एंट्रेंस एग्जाम। मेरे समय में, UGC एग्जाम जूनियर रिसर्च फेलोशिप, या JRF, और फिर सीनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए होता था। तो, आप रिसर्च कर सकते हैं। लेकिन जो लोग मेरे साथ क्लास में थे, उनमें से सभी ने JRF और SRF नहीं किए। उन्होंने क्या किया? तो हमारे सिस्टम ने सर्टिफाइड या डिग्री वाले युवा तैयार किए, लेकिन वे अभी खुद को संभालने के लिए तैयार नहीं थे, न तो एक एम्प्लॉई के तौर पर और न ही खुद कुछ शुरू करने के लिए। या फिर जाकर अपने पेरेंट्स के बिज़नेस में शामिल हो जाएं। हमें इसी सुधार की ज़रूरत है।

सवाल: जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग की गई थी। पीछे मुड़कर देखें तो, आपको क्या लगता है कि सरकार से कहां गलती हुई?

जवाब: मुझे नहीं लगता कि अब मेरे पास कोई दूसरा तरीका है जिसके बारे में मैं सोच सकूं। जो हो गया सो हो गया। पीछे मुड़कर देखने पर, यह कहने का कोई फ़ायदा नहीं है कि मैं इसे इस तरह कर सकता था या हमें इसे इस तरह से संभालना चाहिए था। यह मुमकिन नहीं है।

सवाल: जॉब मार्केट तेज़ी से अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है, जिसमें अलग-अलग तबके के लोग बहुत अलग-अलग चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। गिग वर्कर्स के लिए सोशल सिक्योरिटी से लेकर रुकी हुई सैलरी, बढ़ती लागत, जॉब सिक्योरिटी और मिडिल क्लास के लिए बदलती स्किल ज़रूरतें। सरकार ऐसी पॉलिसी कैसे बना सकती है जो इन अलग-अलग ज़रूरतों को पूरा करे और साथ ही यह भी पक्का करे कि प्राइवेट सेक्टर अच्छी क्वालिटी की नौकरियां पैदा करे?

जवाब: सिवाय प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा देने के, सरकार के तौर पर आप ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते। यह प्राइवेट सेक्टर पर निर्भर है। यह उनका पैसा है जिसे वे इन्वेस्ट कर रहे हैं। एक हद के बाद उन्हें बताना सरकार का काम नहीं होगा। लेकिन अगर मार्केट को इसकी जरूरत है, मतलब अगर किसी चीज की जरूरत है और प्राइवेट सेक्टर को लगता है कि अगर वे इन्वेस्ट करते हैं, तो उन्हें उससे कुछ मिल सकता है, तो वे असल में आएंगे, तो मार्केट की ताकतें ही तय करती हैं कि प्राइवेट या सरकारी सेक्टर पैसा कहां लगाएगा। इसलिए, जब तक कुछ खास लोगों या कुछ खास नौकरियों की मांग नहीं होगी जिनके लिए कुछ खास लोगों की ज़रूरत होगी, तब तक इन्वेस्टमेंट नहीं होगा। इसलिए, हमें ऐसे हालात बनाने और उनसे मेल खाने वाले लोगों की पहचान करने की ज़रूरत है।

सवाल: वेस्ट एशिया संकट ने फरवरी में भारत पर असर डालना शुरू किया, जिससे सप्लाई चेन में रुकावट आई, कंस्ट्रक्शन की लागत बढ़ी और LPG की कमी हो गई। एक मंत्री के तौर पर कोविड-19 संकट को भी मैनेज करने के बाद यह संकट अलग कैसे है?

जवाब: पिछला संकट थोड़े समय के लिए था। गैस की उपलब्धता, जिसके कारण हमें इंडस्ट्री से कहना पड़ा कि वे इसे 100% से घटाकर 70% कर दें। घरेलू कंज्यूमर देखे गए। इस बीच, डिपार्टमेंट एक साथ आए। असल में एक सीनियर मंत्री की अगुवाई में मंत्रियों का एक ग्रुप हर दिन इसका रिव्यू करने लगा और यह बताने लगा कि सप्लाई कहां से आएगी। एक बार आ गई, तो यह कहां जाएगी, ताकि यह पक्का हो सके कि किसी को ज़्यादा नुकसान न हो। इसलिए, हम सभी ने मिलकर काम किया और इसलिए, इसे कम से कम समय में मैनेज करना और सीमित करना संभव था।

सवाल: क्या हमने इन संकटों से कुछ सीखा है, और क्या हमने भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा आने पर नुकसान को कम करने के लिए कोई फ्रेमवर्क या प्लान बनाया है?

जवाब: हां, मुझे लगता है कि अब इंस्टीट्यूशनल अरेंजमेंट कहीं ज़्यादा अच्छी तरह से तय हैं। तो उम्मीद है कि ये यादें इंस्टीट्यूशन में होनी चाहिए। अगली बार, भगवान न करे, हमारे सामने ऐसी कोई सिचुएशन आए, तो हम इसे बेहतर तरीके से हैंडल कर पाएंगे।

सवाल: हाल के इन्वेस्टमेंट डेटा से पता चलता है कि ज़्यादातर डोमेस्टिक कॉर्पोरेट इन्वेस्टमेंट AI जैसे उभरते हुए फील्ड्स में जा रहा है। Gen Z को आपकी क्या सलाह है क्योंकि टेक्नोलॉजी इतनी तेज़ी से डेवलप हो रही है?

जवाब: बेशक, उन्हें AI सीखना चाहिए। आप जिस भी फील्ड में हों, आपसे इसे जानने की उम्मीद की जाएगी। शायद आपके लिए इसे जानना बेहतर होगा क्योंकि आप देख सकते हैं कि यह आपकी एफिशिएंसी को कैसे बेहतर बनाता है। किसी भी जेनरेशन को सीखने से कोई नहीं रोक सकता।

सवाल: आपकी Gen Z स्टोरी क्या है? आपको क्या लगता है कि इस जेनरेशन में आपके पर्सनल एक्सपीरियंस से क्या अलग है? क्या यह टेक्नोलॉजी है, जिस तरह से हम कम्युनिकेट करते हैं, हमारी एक्सपेक्टेशन्स हैं?

जवाब: मुझे लगता है कि आपको पिछली जेनरेशन्स के मुकाबले एक बड़ा एडवांटेज है। सबसे बड़ा एडवांटेज यह है कि आपके हाथ में सब कुछ है- आपके मोबाइल फोन में। तो, आपका कॉन्फिडेंस उसी से आता है। यह अच्छी बात है। लेकिन इसके साथ यह समझने की ज़रूरत है कि, ‘मैं कितना इस्तेमाल कर सकता हूं, और मुझे इसे कितना इस्तेमाल करना चाहिए?’ और मैं इसे कब इस्तेमाल करूँ, और कब नहीं?’ एक बार जब यह समझदारी आ जाएगी, तो यह आपके बड़े होने पर एक शानदार बदलाव होगा। इस समय, आप बहुत खुशकिस्मत हैं क्योंकि आपके पास टेक्नोलॉजी है।

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