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और बढ़ी तनातनी: वित्‍त मंत्री बोले- RBI की सुस्‍ती से बना खरबों का NPA

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल वी आचार्य ने इससे पहले शुक्रवार को कहा था, "केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता की उपेक्षा करना ‘बड़ा घातक’ हो सकता है।"

वित्त मंत्री अरुण जेटली। (फोटोः पीटीआई)

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अंधाधुंध कर्ज देने (साल 2008 से 2014 के बीच) वाले बैंकों पर रोक लगाने में नाकाम रहने को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की आलोचना की है। मंगलवार (30 अक्टूबर) को उन्होंने कहा, “बैंकों में इसी वजह से फंसे कर्ज (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) का संकट बढ़ा है। आरबीआई की सुस्ती से यह खरबों में पहुंच गया है।” वित्त मंत्री की यह टिप्पणी तब आई है, जब आरबीआई की स्वायत्तता को लेकर वित्त मंत्रालय व केंद्रीय बैंक के बीच तनातनी बढ़ने से जुड़ी खबरें आईं। ऐसे में जेटली का ताजा बयान इन दोनों पक्षों के बीच और तनातनी बढ़ने के इशारे करता है।

इंडिया लीडरशिप समिट के दौरान जेटली ने आगे बताया, “वैश्विक आर्थिक संकट के बाद आप देखें 2008 से 2014 के बीच अर्थव्यवस्था को कृत्रिम रूप से आगे बढ़ाने के लिए बैंकों को अपना दरवाजा खोलने और अंधाधुंध तरीके से कर्ज देने को कहा गया। पर आरबीआई की निगाहें कहीं और थीं। उस दौरान बैंकों ने अंधाधुंध तरीके से कर्ज बांटा।” उनके मुताबिक, तत्कालीन सरकार बैंकों पर कर्ज देने के लिए जोर दे रही थी। उससे एक साल के भीतर कर्ज में 31 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई, जबकि औसत बढ़ोतरी 14 प्रतिशत थी।

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इससे पहले, आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल वी आचार्य ने शुक्रवार को कहा था, “केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता की उपेक्षा करना ‘बड़ा घातक’ हो सकता है।” उनके इस बयान को आरबीआई के नीतिगत रुख में नरमी लाने और उसकी शक्तियों को कम करने के लिए सरकार के दबाव व केंद्रीय बैंक की ओर से उसके प्रतिरोध के तौर पर देखा जा रहा है। आचार्य ने बताया था, “आरबीआई बैंकों के बही-खाते दुरुस्त करने पर जोर दे रहा है।” ऐसे में उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बेहतर तरीके से नियमन के लिए आरबीआई को अधिक शक्तियां देने की मांग की। वह बोले कि बड़े पैमाने पर वित्तीय और वृहत आर्थिक स्थिरता के लिए यह स्वतंत्रता जरूरी है।

हालांकि, इस बाबत जेटली और वित्त मंत्रालय की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। वित्त मंत्री ने आचार्य के भाषण या मंत्रालय व आरबीआई के बीच कथित तनातनी पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने इससे पहले कहा था कि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी के लिए राजनेताओं को आरोप झेलने पड़ते हैं, जबकि निगरानी करने वाले बच जाते हैं।

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आपको बता दें कि बैंकों की 31 मार्च, 2018 की स्थिति के अनुसार 9.61 लाख करोड़ रुपए से अधिक का एनपीए पहुंच चुका है। देश के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) राजीव महर्षि ने भी इस बात को लेकर हाल ही में आरबीआई की भूमिका पर सवालिया निशान लगाए थे। उन्होंने पूछा था कि बैंक जब भारी मात्रा में कर्ज बांट रहे थे, जिससे संपत्ति और देनदारियों में असंतुलन पैदा हुआ व कर्ज फंसा (एनपीए बन गया) तो बैंकिंग क्षेत्र का नियामक आरबीआई क्या कर रहा था? (भाषा इनपुट्स के साथ)

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