फिल्म सतलुज को लेकर पंजाब में विवाद गहराया हुआ है। इसी बीच मगंलवार को अकाल तख्त ने बड़ी घोषणा की है। अकाल तख्त ने कहा कि हरिके पत्तन में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा और उन लोगों की याद में एक ‘शहीदी’ स्मारक बनाएगी, जिनके शव पंजाब में उग्रवाद के दौर में लावारिस पाए गए थे।

अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गरगज्ज ने खालड़ा की आत्मा की शांति और उन सिख युवकों की शांति के लिए एक विशेष अरदास करने के बाद यह घोषणा की। ऐसे लोग जिन्हें लापता घोषित कर दिया गया था या जो कथित गैर-न्यायिक हत्याओं के शिकार हो गए थे और जिन्हें उचित रीति-रिवाजों से वंचित कर दिया गया था ।

कुलदीप सिंह गरगज्ज ने कहा कि हम उस स्थान पर एकत्रित हुए हैं जहां पंजाब के अनगिनत बेटों और बेटियों की हत्या कर दी गई और उनके शवों को नदियों में बहा दिया गया। आज से यह स्थान ‘शहीदी पत्तन’ के नाम से जाना जाएगा।

गरगज्ज ने कहा कि हमारे पंथ का कोई भी शहीद गुमनाम नहीं है। आज पूरा पंथ शहीदों को याद कर रहा है। शहीदों को याद रखना पंथ का कर्तव्य है। कौम खालड़ा को कौमी शहीद मानता है और मानता रहेगा।

खालड़ा को 6 सितंबर, 1995 को अमृतसर स्थित उनके घर के बाहर से अगवा कर लिया गया था और पंजाब पुलिस कर्मियों ने उनकी हत्या कर दी थी। यह घटना तब हुई जब उन्होंने उग्रवाद के दौर में संदिग्ध फर्जी मुठभेड़ों के बाद अमृतसर में कम से कम 2,097 “लावारिस” शवों के कथित अवैध दाह संस्कार का खुलासा किया था। अकाल तख्त ने हरिके पत्तन में अरदास की घोषणा की थी, जहां माना जाता है कि खालड़ा के शव का अंतिम संस्कार यहीं किया गया था।

घटनास्थल पर बड़ी संख्या में लोग जमा हुए थे। इनमें उन लोगों के परिवार के सदस्य भी शामिल थे जो उग्रवाद के दौर में लापता हो गए थे। इस कार्यक्रम में गुरु ग्रंथ साहिब को एक विशेष पालकी में स्थापित किया गया। श्री सुखमनी साहिब का पाठ किया गया और सचखंड श्री हरमंदिर साहिब के भाई सिमरप्रीत सिंह के नेतृत्व में हजूरी रागियों द्वारा गुरबानी कीर्तन प्रस्तुत किया गया।

समापन अरदास स्वयं गरगज्ज ने संपन्न की। जिन्होंने उन युवा पुरुषों, महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की दर्दनाक कहानियों को याद किया, जिन्हें कथित तौर पर “लावारिस” घोषित करके जला दिया गया था और जिनके शव सतलुज, ब्यास और अन्य जलमार्गों में बहा दिए गए थे।

उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद सभी शत्रुता समाप्त हो जानी चाहिए, लेकिन उस समय की दमनकारी सरकारों ने सिखों और हिंदुओं के शवों को ‘लावारिस’ घोषित करके और उन्हें उनके परिवारों को सौंपने से इनकार करके मौलिक मानवाधिकारों का उल्लंघन किया।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) को समुदाय के सहयोग से हरिके पट्टन में ‘शहीदी पट्टन स्मारक’ बनाने का निर्देश देने के अलावा, गरगज्ज ने कहा कि गुरुद्वारा निकाय के माध्यम से अकाल तख्त उन लोगों का दस्तावेजीकरण करेगा, जिन्हें कथित तौर पर “1982 और 1995 के बीच अज्ञात व्यक्तियों के रूप में मार दिया गया था”।

उन्होंने कहा कि ये अभिलेख श्री अकाल तख्त साहिब के आधिकारिक अभिलेखागार का हिस्सा बनेंगे। गरगज्ज ने सत्य और न्याय की खोज में सहयोग के लिए सटीक अभिलेखीय कार्य की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “ये अभिलेख यह सुनिश्चित करेंगे कि हमारे बच्चों के बलिदान मिटाए न जाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी प्रमाण के रूप में कार्य करेंगे।”

इस अवसर पर मीडिया से बात करते हुए एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने कहा कि खालड़ा ने उन युवा सिखों के लिए न्याय दिलाने के लिए अथक प्रयास किया, जिनका “लावारिस” घोषित होने के बाद अंतिम संस्कार कर दिया गया था। उन्होंने दावा किया कि सच्चाई की आवाज को दबाने के प्रयास में पुलिस ने खालड़ा का अपहरण किया। उन्हें यातनाएं दीं और उनके शव को नदी में फेंक दिया।

धामी ने कहा कि खालड़ा एक “पंथिक शहीद” हैं, जिनका सिख समुदाय में अपार सम्मान है। उन्होंने आगे कहा कि एसजीपीसी जत्थेदार द्वारा जारी निर्देश का पालन करते हुए हरिके पट्टन में एक शहीदी स्मारक का निर्माण करेगी, जहां “शहीदों” के नाम अंकित किए जाएंगे।

हरिके पत्तन में आयोजित सभा में कार्यकर्ता, पीड़ितों के परिवार के सदस्य, धर्मगुरु और आम लोग शामिल हुए, जिन्होंने अरदास में भाग लिया और घोषणाओं को सुना। कई वक्ताओं ने शोक संतृप्त परिवारों को न्याय दिलाने के लिए निरंतर कानूनी और नैतिक दबाव की आवश्यकता पर बल दिया, जबकि सामुदायिक नेताओं ने स्मारक और अभिलेखीय परियोजना के लिए समर्थन का वादा किया।

केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने पंजाब में उग्रवाद के दुखद दौर में जान गंवाने वाले सभी लोगों को अपनी अरदास में शामिल करने के लिए अकाल तख्त जत्थेदार के प्रति आभार व्यक्त किया।

प्रार्थना से पहले रवनीत सिंह बिट्टू ने जत्थेदार साहब से अपील की कि वे अपनी अरदास में 1990 के दशक में पंजाब में हुई हिंसा के सभी पीड़ितों को याद रखें। उन्होंने कहा कि उस समय जो खून बहा, वह केवल आतंकवादियों का नहीं था, न ही पुलिस का, और न ही केवल निर्दोष नागरिकों का। वह पंजाब का खून था। वह पंजाबियों का खून था… जत्थेदार साहब, आपको विनम्र निवेदन है कि कृपया आज की अरदास में 1990 के दशक में पंजाब में हुए मानव नरसंहार को याद रखें। उन्होंने आगे कहा कि यह अपील “पंजाब, पंजाबियों और पंजाबियत” के बारे में है, न कि किसी एक समुदाय के बारे में।

इस बीच, राज्य भाजपा प्रमुख केवल सिंह ढिल्लों ने कहा कि ‘सतलुज’ फिल्म विवाद अब समाप्त होना चाहिए, क्योंकि “इन घावों को फिर से कुरेदने से किसी का भला नहीं होगा। पंजाब पहले ही बहुत खून बहा चुका है और ठीक होने में समय लगता है।

एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा, “धर्म की परवाह किए बिना पंजाबियों की हत्याओं को कभी नहीं भुलाया जाना चाहिए। आइए हम अपने लोगों की स्मृति का सम्मान करें, न कि शोर मचाने के लिए इसका दुरुपयोग करें। मैं विशेष रूप से मीडिया से इस मामले पर जिम्मेदारी और संयम के साथ रिपोर्टिंग करने की अपील करता हूं – पंजाब की शांति सर्वोपरि है।”

‘सतलुज’ फिल्म पर रवनीत सिंह बिट्टू के बयान से नाराज हैं पंजाब बीजेपी के सिख नेता?

बीजेपी के लिए पंजाब में सिखों का समर्थन हासिल करना मुश्किल रहा है। एक वक्त में पंजाब में उसकी सहयोगी रही अकाली दल के साथ उसके राजनीतिक रिश्ते खराब हो चुके हैं और किसान आंदोलन के दौरान भी सिख समुदाय की नाराजगी सामने आई थी। पढ़ें पूरी खबर।