संसद में जारी गतिरोध खत्म करने के लिए विपक्ष से बातचीत की पहल करने के दिन ही केंद्र सरकार ने बुधवार को संकेत दिया कि विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA Amendment Bill, 2026) में कोई भी दंडात्मक पूर्वव्यापी प्रावधान नहीं होगा। हालांकि, नागरिक समाज और धार्मिक संगठनों ने इस विधेयक को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि विधेयक में प्रस्तावित संपत्ति हस्तांतरण से जुड़े नियमों का इस्तेमाल पहले किए गए निवेशों या संपत्तियों पर कार्रवाई के लिए किया जा सकता है।
सूत्रों ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि इस FCRA विधेयक को मौजूदा सत्र में पेश किया जाएगा या नहीं। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि विपक्ष संसद में चर्चा चलने देने के लिए तैयार होता है या नहीं। संसद का मौजूदा मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त होना है।
भारत के कैथोलिक बिशप सम्मेलन के सलाहकार और समन्वयक जोनाथन लालरेमरुआटा ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि जब सीबीसीआई प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री से मुलाकात की तो हमें आश्वासन दिया गया था कि यह कानून पूर्वव्यापी नहीं होगा।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने भी कहा कि यह भाजपा का अल्पसंख्यक संगठनों से किया गया वादा है। दक्षिणी राज्य से ताल्लुक रखने वाले एक अन्य भाजपा नेता ने कहा कि उम्मीद है कि FCRA विधेयक के आने से कांग्रेस और अन्य स्वार्थी तत्वों द्वारा फैलाए जा रहे इस दुष्प्रचार का पर्दाफाश हो जाएगा कि यह विधेयक ईसाइयों को निशाना बनाने के लिए है।
मिजोरम के मुख्यमंत्री आज अमित शाह से करेंगे मुलाकात
सूत्रों के अनुसार, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात करने वाले हैं और इस मुलाकात में इस मुद्दे पर चर्चा होने की संभावना है।
चिंताएं इस बात को लेकर हैं कि जब किसी संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द, सरेंडर या समाप्त हो जाता है तो विदेशी योगदान से निर्मित संपत्तियों को सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण को सौंपने के लिए एक ढांचा तैयार किया जाए। इससे ईसाई संगठनों में चिंता पैदा हो गई है क्योंकि कई चर्च और संस्थान विदेशी योगदान से बनाए गए हैं।
हालांकि, एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य संस्थानों के प्रबंधन में निरंतरता सुनिश्चित करना है, यदि उनके एफसीआरए पंजीकरण में कोई रुकावट आती है।
अधिकारी ने कहा कि मूलतः इसका उद्देश्य संस्था के संचालन में किसी प्रकार की रुकावट आने की स्थिति में उसके उचित प्रबंधन को सुनिश्चित करना है। ऐसी स्थिति में एक अंतरिम प्रबंधन होगा जो संपत्ति की देखरेख करेगा और यदि बाद में मूल स्वामी या संस्था वापस आती है, तो संपत्ति उन्हें सौंप दी जाएगी। हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि किसी भी धार्मिक संस्था का प्रबंधन उस धर्म की परंपराओं के अनुसार होना चाहिए जिससे वह संबंधित है। विधेयक को इसी के अनुरूप तैयार किया गया है।
विधेयक के तीन प्रावधान क्या हैं?
आलोचकों ने विधेयक के तीन प्रावधानों की ओर इशारा किया है। धारा 14बी एफसीआरए प्रमाणपत्र की समाप्ति की अवधारणा को प्रस्तुत करती है। इसमें कहा गया है कि यदि कोई संगठन नवीनीकरण के लिए आवेदन नहीं करता है, उसका नवीनीकरण अस्वीकार कर दिया जाता है या नवीनीकरण के बिना प्रमाणपत्र की वैधता समाप्त हो जाती है, तो प्रमाणपत्र को समाप्त माना जाएगा।
विधेयक की धारा 16A के अनुसार, यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है तो उसे विदेशी चंदे से मिली राशि और उससे बनाई गई सभी संपत्तियां नामित प्राधिकरण के अधीन चली जाएंगी। यह प्राधिकरण उन संपत्तियों का प्रबंधन करेगा। यदि संस्था तय समय-सीमा के भीतर दोबारा नया या नवीनीकृत FCRA पंजीकरण हासिल कर लेती है, तो उसकी संपत्तियां उसे वापस कर दी जाएंगी, लेकिन अगर संस्था निर्धारित अवधि में नया या नवीनीकृत पंजीकरण नहीं करा पाती, तो वे संपत्तियां स्थायी रूप से नामित प्राधिकरण की हो जाएंगी। इसके बाद प्राधिकरण उन संपत्तियों को सरकारी विभागों या एजेंसियों को हस्तांतरित कर सकता है या कानून के अनुसार उनका निपटान कर सकता है।
एफसीआरए संशोधन विधेयक के प्रस्तावित सेक्शन 16बी में कहा गया है कि संशोधन लागू होने से पहले पुराने कानून के तहत जिन संपत्तियों का स्वामित्व पहले ही सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण को सौंपा जा चुका है, उन पर भी नई व्यवस्था लागू होगी।
हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि यदि सेक्शन 16A और 16B को साथ पढ़ा जाए, तो इसका असर उन संगठनों पर भी पड़ सकता है जिनका एफसीआरए पंजीकरण वर्षों पहले समाप्त हो चुका था। इस व्याख्या के अनुसार, ऐसे संगठन जो अब विदेशी चंदा नहीं लेते और केवल घरेलू स्रोतों से काम कर रहे हैं, वे भी नई एसेट-वेस्टिंग व्यवस्था के दायरे में आ सकते हैं, क्योंकि उनका एफसीआरए प्रमाणपत्र समाप्त हो चुका है। ऐसी स्थिति में विदेशी चंदे से बनाई गई स्कूल, अस्पताल, सामुदायिक केंद्र जैसी संपत्तियां भी नामित प्राधिकरण के नियंत्रण में जा सकती हैं। हालांकि, सरकार ने विधेयक में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया है कि उसका उद्देश्य इन प्रावधानों को पूर्व प्रभाव के साथ लागू करना या पुराने मामलों पर इस तरह लागू करना है।
रिजिजू ने कल राहुल गांधी से की थी मुलाकात
इस बीच, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की और संसद के सुचारू संचालन के लिए उनका सहयोग मांगा। सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी के साथ लगभग 50 मिनट की बैठक के दौरान रिजिजू ने लंबित विधायी एजेंडा पर प्रकाश डाला। जिसमें एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधन और परिसीमन विधेयक से जुड़े संवैधानिक संशोधन विधेयक को फिर से पेश करने की संभावना शामिल है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार को विपक्ष से कोई आश्वासन नहीं मिला, जिसने अपनी मांग दोहराई कि अमित शाह 20 जुलाई को दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों और युवाओं पर पुलिस की कार्रवाई पर सदन में बयान दें और संसद अयोध्या के राम मंदिर में दान की गई धनराशि की कथित चोरी पर चर्चा करे।
कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व ने रिजिजू को बताया कि वे इस समय परिसीमन के खिलाफ हैं और इस मुद्दे पर उनके रुख में कोई बदलाव नहीं आया है। रिजिजू ने कांग्रेस से अपने रुख पर पुनर्विचार करने को कहा।
इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए रिजिजू ने कहा कि मैंने विपक्ष को बातचीत का प्रस्ताव दिया है, भले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद हों। देखते हैं विपक्ष क्या जवाब देता है, लेकिन फिलहाल मौजूदा सत्र को आगे बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
कांग्रेस नेताओं ने कहा कि विपक्षी दल गुरुवार सुबह संसद के पुन: सत्र शुरू होने से पहले रिजिजू द्वारा उठाए गए मुद्दों पर विचार-विमर्श करेंगे। कांग्रेस ने संयुक्त रुख तय करने के लिए अन्य विपक्षी दलों से परामर्श करने का निर्णय लिया है, जिनमें वे दल भी शामिल हैं जो इंडिया ब्लॉक का हिस्सा नहीं हैं।
सूत्रों के अनुसार, डीएमके के साथ भी अनौपचारिक बातचीत जारी है, जिसने इस सत्र में अलग रुख अपनाया है। डीएमके हालिया विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस द्वारा उससे संबंध तोड़ने और तमिलनाडु में विजय के नेतृत्व वाली टीवीके के साथ सरकार बनाने के फैसले से नाराज है।
हालांकि, कांग्रेस खेमे का मानना है कि डीएमके, जिसने परिसीमन का मुखर विरोध किया था। वह अपना रुख नहीं बदलेगी। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अप्रैल में परिसीमन विधेयक की एक प्रति जला दी थी और इसे काला कानून बताया था। अब वे इस विधेयक का समर्थन कैसे कर सकते हैं? हमें नहीं लगता कि डीएमके ऐसा करेगी। सूत्रों के अनुसार, रिजिजू और राहुल गांधी के बीच एक और दौर की बातचीत हो सकती है, जिसके बाद दोनों पक्ष अपनी-अपनी रणनीतियां तय कर सकते हैं।
‘…बिगड़ जाएंगे भारत-यूएस के बीच रिश्ते’, अमेरिकी सांसद ने FCRA बिल को लेकर दी चेतावनी
अमेरिकी सांसद ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में भारत के प्रस्तावित बदलावों पर चिंता जताई है। उन्होंने चेतावनी दी कि इन बदलावों से भारत और अमेरिका के बीच आपसी रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने कहा कि प्रस्तावित FCRA बदलाव, जो NGOs, ट्रस्ट, एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन और धार्मिक संगठनों को मिलने वाले विदेशी डोनेशन से जुड़े हैं, भारत सरकार को चर्च और धार्मिक चैरिटी पर कब्ज़ा करने की इजाज़त दे सकते हैं। पढ़ें पूरी खबर।
