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कश्मीर: कोर्ट में 80 फीसदी मामलों में झटका, फिर भी फारूक अब्दुल्ला पर लगाया PSA

पुलवामा हमले के बाद से 4 अगस्त तक यानि कि आर्टिकल 370 के प्रावधान हटाने से पहले तक जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की श्रीनगर बेंच में बंदी प्रत्यक्षीकरण की 150 याचिकाएं दाखिल की गई।

farooq abdullahफारूक अब्दुल्ला (फोटो सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

केन्द्र सरकार ने जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला पर रविवार रात PSA (Public Safety Act) लगाकर उन्हें हिरासत में ले लिया। इससे पहले फारुख अब्दुल्ला को नजरबंद रखा गया था। एमडीएमके नेता वाइको ने बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर फारुख अब्दुल्ला को कोर्ट में पेश करने की मांग की थी। याचिका पर सुनवाई से ऐन पहले सरकार ने फारुख अब्दुल्ला पर पीएसए एक्ट लगाकर उन्हें हिरासत में ले लिया। PSA एक्ट के तहत सरकार किसी भी व्यक्ति को 3 माह से लेकर 1 साल तक बिना ट्रायल के हिरासत में रख सकती है। सुप्रीम कोर्ट आगामी 30 सितंबर को इस मामले पर सुनवाई करेगा। कोर्ट में सरकार के फैसले को कड़ी चुनौती मिलने का अनुमान है।

बता दें कि जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधान हटाए जाने के बाद से यानि कि 5 अगस्त के बाद से माना जा रहा है कि करीब 4000 लोगों को हिरासत में रखा गया है। इनमें से 300 लोगों को PSA के तहत हिरासत में लिया गया है। अब जम्मू कश्मीर में जारी लॉकडाउन कहें या कुछ और कारण इन मामलों में सिर्फ दर्जनभर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दाखिल हुई हैं।

वहीं द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा हासिल किए गए आंकड़ों के अनुसार, पुलवामा हमले के बाद से 4 अगस्त तक यानि कि आर्टिकल 370 के प्रावधान हटाने से पहले तक जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की श्रीनगर बेंच में बंदी प्रत्यक्षीकरण की 150 याचिकाएं दाखिल की गई। इनमें से 39 याचिकाओं पर फैसला आया और खास बात ये है कि 80 प्रतिशत मामलों में कोर्ट ने PSA के तहत हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा करने का आदेश दिया।

आंकड़े बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के तहत हाईकोर्ट ने 6 कारणों से आरोपी को रिहा करने के आदेश दिए। इनमें संविधान द्वारा दिए अधिकारों का उल्लंघन, प्रक्रिया में गंभीर खामियां, अन्य जरुरी कानून होने की स्थिति में PSA का इस्तेमाल नहीं करना और हिरासत को सही ठहराने के लिए नए फैक्ट का नहीं होना जैसे कारण शामिल हैं।

जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट द्वारा PSA से जुड़े 39 मामलों में दिए गए फैसले का अधय्यन करने पर पता चलता है कि 8 मामलों में कोर्ट ने कहा कि डीएम द्वारा इन मामलों में अर्जी नहीं दी गई। इसके साथ ही डीएम खुद आरोपी को हिरासत में लेने के मसले पर निश्चित नहीं थे। वहीं 5 मामलों में सरकार द्वारा गंभीर गलतियां की गई, जिनमें अदालत में क्रिमिनल मामले दर्ज ही नहीं किए गए, जिसके बाद अदालत द्वारा आरोपी को रिहा कर दिया गया।

इसी तरह 9 मामलों में सरकार आरोपी को हिरासत में लेने का सही कारण नहीं बता सकी। 9 अन्य मामलों में आरोपी को संविधान में दिए गए अधिकारों से वंचित रखा गया और उसे हिरासत में रखने के कारण संबंधी जानकारी भी नहीं दी गई। इसी तरह अन्य मामलों में भी सरकार की गलतियां कोर्ट में पकड़ी गई, जिनके आधार पर आरोपियों को रिहा करने का आदेश दिया गया। ऐसे में माना जा रहा है कि फारुख अब्दुल्ला को PSA के तहत हिरासत में रखने के फैसले को कोर्ट में कड़ी चुनौती मिल सकती है।

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