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सिंघु की झोपड़ी को बठिंडा ले जा रहे किसान

किसान आंदोलन स्थगित होने की घोषणा के बाद से सिंघु सीमा से किसानों ने अपने डेरे, तंबू, झोपड़ी आदि को उखाड़ना शुरू कर दिया है।

किसान आंदोलन स्थगित होने की घोषणा के बाद से सिंघु सीमा से किसानों ने अपने डेरे, तंबू, झोपड़ी आदि को उखाड़ना शुरू कर दिया है। एक साल से अधिक समय तक चले इस आंदोलन से जुड़े रहने वाले किसान यहां की यादों को भी अपने साथ ले जा रहे हैं। कोई यहां उपयोग में लाई गई र्इंट को तो कोई यहां की मिट्टी को अपने साथ ले जा रहा है। पंजाब के बठिंडा जिले के रामपुरा फूल गांव के रहने वाले सरबजीत सिंह अपनी बनी बनाई झोपड़ी को अपने घर ले जा रहे हैं।

सिंघु सीमा पर रविवार को मौजूद सरबजीत सिंह ने बताया कि हमारी यह झोपड़ी किसानों की जीत की गवाह है। साथ ही यह हमारे उस संघर्ष की भी गवाह है जो हमने एक साल तक सरकार के खिलाफ किया। सरबजीत ने बताया कि इस झोपड़ी ने हमें सर्दी, धूप और बारिश से तो बचाया ही है, हमें लगातार लड़ने की प्रेरणा भी दी है। उन्होंने बताया कि यह झोपड़ी हमारे लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है, ऐसे में भला हम इसे कैसे तोड़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि हमने इस झोपड़ी को अपने साथ बठिंडा में अपने गांव ले जाने को फैसला किया है।

एक साल से सिंघु सीमा पर ही रह रहे सरबजीत ने बताया कि इसे ट्रक ट्रोले से ले जाया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस झोपड़ी का आधार लोहे के गार्डर से बना है जबकि इसकी दीवार और छत बांस व सरकंडों से बनी है। उन्होंने बताया कि गांव ले जाकर इसे और बेहतर बनाया जाएगा। इसके बाद इसे मानवता की सेवा के लिए उपयोग किया जाएगा। उन्होंने कहा कि हमारा विचार है कि इस झोपड़ी के माध्यम से एक आश्रम खोला जाए, जहां से जरूरतमंद लोगों की मदद की जा सके।

हम सबसे बाद में पैदल जाएंगे सिंघु सीमा पर लोगों को मालिश की सेवा देने वाले ‘मिट्टी एड’ के निछेत्र सिंह ने बताया कि हम आंदोलन के पहले दिन से यहां मौजूद हैं और हम सबसे बाद में पैदल यहां से जाएंगे। उन्होंने बताया कि हम रास्ते में थके हारे लोगों को सेवा देते हुए जाएंगे। पंजाब के रहने वाले हरमित सिंह इन दिनों दिल्ली में रहते हैं। हरमित सिंह ने बताया कि किसान आंदोलन के स्थगित होने के बाद जब लोग यहां से जा रहे हैं तो खुशी के साथ-साथ दुख भी है। उन्होंने बताया कि खुशी इस बात की है कि हम जीत कर जा रहे हैं। सिंघु सीमा पर मौजूद लोगों का एक परिवार जैसा बन गया था, अब हम एक-दूसरे से बिछड़ रहे हैं तो थोड़ा दुख होना स्वाभाविक है।

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