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कृषि कानून विवाद: अड़े रहे किसान संगठन, केंद्र सरकार का रुख भी कड़ा

किसान नेताओं ने कहा कि भले ही बैठक पांच घंटे चली, लेकिन दोनों पक्ष मुश्किल से 30 मिनट के लिए ही आमने-सामने बैठे। बैठक की शुरुआत में ही किसान नेताओं ने सरकार को प्रस्ताव खारिज करने की सूचना दे दी थी।

Author नई दिल्ली | Updated: January 23, 2021 5:24 AM
Farmers Movementसरकार के साथ बैठक में वार्ता टूट जाने के बाद मीडिया से बात करते बीकेयू नेता राकेश सिंह टिकैत। (Photo- ANI)

सरकार और किसानों के बीच 11वें दौर की बातचीत विफल हो गई। किसान नेता नए कृषि कानूनों को रद्द करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी की अपनी मांग पर अड़े रहे। जबकि, सरकार ने कानूनों को डेढ़ साल तक स्थगित रखने और इस दौरान संयुक्त कमेटी द्वारा समीक्षा की अपनी पेशकश पर किसानों से पुनर्विचार को कहा। ग्यारहवें दौर की वार्ता के बेनतीजा रहने के साथ ही किसान नेताओं ने आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी।

बैठक के बाद वार्ता की नई तारीख की कोई चर्चा नहीं हुई। मंत्रियों ने किसान यूनियनों से कहा कि उन्हें सभी संभव विकल्प दिए गए हैं और उन्हें कानूनों को निलंबित रखने के प्रस्ताव पर आपस में आंतरिक चर्चा करनी चाहिए। तोमर ने किसान नेताओं से कहा कि यदि वे प्रस्ताव पर चर्चा करना चाहते हैं तो सरकार एक और बैठक के लिए तैयार है। इस पर किसान तैयार नहीं हुए।

शुक्रवार की बैठक में सरकार ने अपना रुख कड़ा करते हुए कहा कि यदि किसान संगठन अगर कानूनों को निलंबित किए जाने संबंधी प्रस्ताव पर चर्चा के लिए सहमत हों तो ही वह दोबारा बैठक के लिए तैयार होगी। इसके साथ ही किसान संगठनों ने कहा कि वे अब अपना आंदोलन तेज करेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि बैठक के दौरान सरकार का रवैया ठीक नहीं था। बैठक पांच घंटे तक चली।

किसान नेताओं ने कहा कि भले ही बैठक पांच घंटे चली, लेकिन दोनों पक्ष मुश्किल से 30 मिनट के लिए ही आमने-सामने बैठे। बैठक की शुरुआत में ही किसान नेताओं ने सरकार को सूचित किया कि उन्होंने बुधवार को पिछले दौर की बैठक में सरकार द्वारा रखे गए प्रस्ताव को खारिज करने का निर्णय किया है। वार्ता में सरकार की ओर से कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, रेलवे, वाणिज्य और खाद्य मंत्री पीयूष गोयल तथा वाणिज्य राज्य मंत्री सोमप्रकाश शामिल हुए जिन्होंने किसान यूनियनों के प्रतिनिधियों से अपने रुख पर पुनर्विचार करने को कहा। इसके बाद दोनों पक्ष दोपहर भोज के लिए चले गए।

किसान नेताओं ने अपने लंगर में भोजन किया, जो तीन घंटे से अधिक समय तक चला। इस दौरान 41 किसान संगठनों के नेताओं ने छोटे-छोटे समूहों में आपस में चर्चा की, जबकि तीनों केंद्रीय मंत्रियों ने विज्ञान भवन में एक अलग कक्ष में प्रतीक्षा की। बैठक के बाद भारतीय किसान यूनियन (उग्राहां) के नेता जोगिंदर सिंह उग्राहां ने कहा कि वार्ता टूट गई है, क्योंकि यूनियनों ने सरकार के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार ने कहा कि कानूनों को निलंबित रखने की अवधि दो साल तक विस्तारित की जा सकती है, लेकिन यूनियन तीनों कानूनों को पूरी तरह वापस लिए जाने तथा फसलों की खरीद पर एमएसपी की कानूनी गारंटी दिए जाने की अपनी मांगों पर अड़ी रहीं।

बुधवार को हुई पिछले दौर की बातचीत में सरकार ने तीनों नए कृषि कानूनों के क्रियान्वयन को स्थगित रखने और समाधान निकालने के लिए एक संयुक्त समिति बनाने की पेशकश की थी। हालांकि गुरुवार को विचार-विमर्श के बाद किसान यूनियनों ने इस पेशकश को खारिज करने का फैसला किया और वे इन कानूनों को रद्द किए जाने तथा एमएसपी की कानूनी गारंटी दिए जाने की अपनी दो प्रमुख मांगों पर अड़े रहे।

किसान नेता दर्शनपाल ने कहा, ‘हमने सरकार से कहा कि हम कानूनों को निरस्त करने के अलावा किसी और चीज के लिए सहमत नहीं होंगे। लेकिन मंत्री ने हमें अलग से चर्चा करने और मामले पर फिर से विचार कर फैसला बताने को कहा।’ टिकैत ने कहा, ‘हमने अपनी स्थिति सरकार को स्पष्ट रूप से बता दी कि हम कानूनों को निरस्त कराना चाहते हैं, न कि स्थगित।’

भारतीय किसान यूनियन (असली अराजनीतिक) के अध्यक्ष हरपाल सिंह ने कहा, ‘यदि हम सरकार की पेशकश को स्वीकार कर लेते हैं, तो दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हमारे साथी कानूनों को रद्द करने के अलावा कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे। वे हमें नहीं बख्शेंगे। हम उन्हें क्या उपलब्धि दिखाएंगे?’ उन्होंने सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया और कहा कि यह विश्वास करना मुश्किल है कि वह 18 महीने तक कानूनों के क्रियान्वयन को स्थगित रखकर अपनी बात पर कायम रहेगी।

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