भारत सरकार लगातार दावा करती है कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की गई है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) के जरिए करोड़ों किसानों के खातों में सीधे पैसे भेजे जा रहे हैं और कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाया गया है। लेकिन राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के घरेलू उपभोग व्यय सर्वे (HCES 2022-23) के आंकड़े एक अलग कहानी कहते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत की खपत तो बढ़ी है, गरीबी घटी है। लेकिन खेती पर निर्भर परिवार पहली बार औसत ग्रामीण परिवार से पीछे रह गए हैं। जनसत्ता की स्पेशल सीरीज आंकड़े बोलते हैं में आज बात भारत के अन्नदाता की। बात इस पर कि आखिर क्यों भारत जैसे कृषि प्रधान जैसे देश में किसान पीछे छूट गए…
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क्या बदला?
करीब दो दशक तक खेती करने वाले परिवारों का मासिक उपभोग खर्च ग्रामीण औसत से अधिक रहा। लेकिन 2022-23 में पहली बार यह औसत से नीचे चला गया। यानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गैर-कृषि क्षेत्र की आय खेती की तुलना में तेज़ी से बढ़ी है।
| वर्ष | खेती से जुड़े परिवार का MPCE | ग्रामीण औसत MPCE |
|---|---|---|
| 1999-2000 | ₹520 | ₹486 |
| 2004-05 | ₹583 | ₹559 |
| 2011-12 | ₹1,436 | ₹1,430 |
| 2022-23 | ₹3,702 | ₹3,773 |
आंकड़ा क्या कहता है?
यह आंकड़ा यह नहीं कहता कि किसानों की आय घट गई है बल्कि यह बताता है कि ग्रामीण भारत के बाकी वर्ग खेती करने वाले परिवारों से तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ग्रामीण विकास का फायदा खेती करने वालों की तुलना में गैर-कृषि गतिविधियों से जुड़े परिवारों को अधिक मिला है।
MSP बढ़ी, फिर भी किसानों की आय क्यों नहीं बढ़ी?
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने धान, गेहूं, दालों और तिलहनों सहित कई फसलों के MSP में लगातार बढ़ोतरी की है। सरकार का दावा है कि किसानों को उनकी लागत का कम से कम 1.5 गुना मूल्य दिया जा रहा है।
सरकार MSP बढ़ा रही है लेकिन उससे किसानों की आर्थिक स्थिति उतनी नहीं सुधर रही जितनी उम्मीद थी। इसे सरल भाषा में ऐसे समझिए:
किसान पहले ग्रामीण औसत से बेहतर स्थिति में थे, अब पीछे हो गए। हर परिवार हर महीने जितना खर्च कर पाता है, उसे उसकी आर्थिक स्थिति का एक संकेत माना जाता है।
- 1999-2000 में किसान परिवार का औसत मासिक खर्च: ₹520
- ग्रामीण औसत: ₹486, यानी किसान थोड़ा बेहतर स्थिति में थे।
लेकिन 2022-23 में:
किसान परिवार: ₹3,702
- ग्रामीण औसत: ₹3,773
- अब किसान औसत ग्रामीण परिवार से भी थोड़ा पीछे हैं।
इसका साफतौर पर मतलब है कि किसानों की हालत खराब नहीं हुई लेकिन दूसरे ग्रामीण परिवार उनसे ज्यादा तेजी से आगे बढ़ गए।
MSP बढ़ी, फिर भी किसानों की आय क्यों नहीं बढ़ी?
लेकिन सवाल यह है कि क्या MSP बढ़ने का लाभ हर किसान तक पहुंचता है? विशेषज्ञों के अनुसार जवाब ‘नहीं’ है। आंकड़ों की मानें तो इसके तीन कारण हैं:
- -86% किसान छोटे और सीमांत हैं। उनके पास जमीन कम है। इसलिए MSP बढ़ने का फायदा भी सीमित मिलता है।
- -हर किसान MSP पर फसल नहीं बेच पाता। सरकारी खरीद कुछ फसलों और कुछ राज्यों तक ही सीमित है।
- -खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। बीज, खाद, डीजल, मजदूरी और सिंचाई महंगी हो गई है। MSP बढ़ने से जो अतिरिक्त पैसा मिलता है, उसका बड़ा हिस्सा खर्च में निकल जाता है।
यानी पहले की तुलना में कम लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं।
गरीबी घटी
अच्छी खबर भी है – ग्रामीण भारत में गरीबी पहले से कम हुई है। HCES 2022-23 के आधार पर तैयार अनुमानों के अनुसार ग्रामीण भारत में गरीबी में काफी कमी आई है।
तेंदुलकर पद्धति
2011-12 : 25.7%
2022-23 : 7.2%
रंगराजन पद्धति
2011-12 : 30.9%
2022-23 : 12.3%
यह संकेत देता है कि देश में जीवन स्तर बेहतर हुआ है। लेकिन इसके बावजूद खेती करने वाले परिवार अपेक्षाकृत पीछे रह गए हैं।
एक और बड़ा संकेत: बढ़ती आर्थिक असमानता?
HCES रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष है कि NSSO के उपभोग सर्वे और राष्ट्रीय आय लेखा (NAS) के निजी उपभोग व्यय के आंकड़ों के बीच अंतर लगातार बढ़ रहा है।
| वर्ष | NSSO उपभोग, NAS के प्रतिशत के रूप में |
|---|---|
| 1972-73 | 94.5% |
| 1993-94 | 61.9% |
| 2011-12 | 46.9% |
| 2022-23 | 47.6% |
यह अंतर बताता है कि देश की आर्थिक वृद्धि और लोगों के वास्तविक उपभोग के बीच एक बड़ी खाई मौजूद है। अर्थशास्त्री इसे बढ़ती असमानता, आय वितरण और सर्वेक्षण पद्धति- तीनों के संदर्भ में देखते हैं।
HCES (Household Consumption Expenditure Survey) यानी घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण भारत सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO – National Statistics Office) द्वारा कराया जाने वाला एक राष्ट्रीय सर्वे है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि देश के परिवार अपनी आय का कितना और किस चीज़ पर खर्च कर रहे हैं।
क्या बदल रही है ग्रामीण अर्थव्यवस्था?
HCES 2022-23 का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि अब ग्रामीण परिवार अपनी कुल खपत का 46.4% हिस्सा भोजन (Food Items) पर खर्च करते हैं। 2011-12 में यह हिस्सा 52.9% था।
लोग अब सिर्फ खाने पर खर्च नहीं कर रहे
पहले गांव के लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा खाने पर खर्च करते थे।
- 2011-12: 52.9%
- 2022-23: 46.4%
अब शिक्षा, इलाज, मोबाइल, इंटरनेट, यात्रा जैसी चीजों पर ज्यादा खर्च हो रहा है। यह बताता है कि ग्रामीण जीवनशैली बदल रही है।
यानी कुल मिलाकर कहें तो ग्रामीण भारत की तस्वीर सुधर रही है लेकिन खेती करने वाले परिवार उसी गति से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इसलिए सिर्फ MSP बढ़ा देना किसानों की आय बढ़ाने के लिए काफी नहीं है।
किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना होगा, भंडारण और फूड प्रोसेसिंग बढ़ानी होगी, खेती की लागत कम करनी होगी और गांवों में खेती के अलावा रोजगार के अवसर भी बढ़ाने होंगे। MSP बढ़ने के बावजूद किसान इसलिए पीछे रह गए क्योंकि ज्यादातर किसान MSP का पूरा लाभ नहीं ले पाते, खेती महंगी होती जा रही है और गांव के दूसरे लोग खेती के अलावा दूसरी नौकरियों से ज्यादा कमाई करने लगे हैं।
आगे का रास्ता
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल MSP बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि नीति को उत्पादन से आगे बढ़कर वैल्यू एडिशन, फूड प्रोसेसिंग, किसान उत्पादक संगठन (FPO), बेहतर बाजार पहुंच, भंडारण और कृषि आधारित उद्योगों पर अधिक ध्यान देना होगा।
साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि रोजगार के अवसर बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है ताकि खेती पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके।
ग्रामीण भारत बदल रहा है। खपत बढ़ रही है, गरीबी घट रही है और गैर-कृषि आय के स्रोत मजबूत हो रहे हैं। लेकिन खेती पर निर्भर परिवार पहली बार ग्रामीण औसत से पीछे रह गए हैं। यानी सवाल अब सिर्फ MSP बढ़ाने का नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि खेती भी उतनी ही लाभकारी बने जितने तेजी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्र आगे बढ़ रहे हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था रिपोर्ट कार्ड
NSSO/NAS अनुपात: 50 साल का सफर
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