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समांतर संसद

नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों का रुख लगातार तीखा होता जा रहा है, तो इसके पीछे बड़ा कारण सरकार का उदासीन, टालमटोल वाला और हठधर्मी रवैया है।

अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते किसान। फाइल फोटो।

नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों का रुख लगातार तीखा होता जा रहा है, तो इसके पीछे बड़ा कारण सरकार का उदासीन, टालमटोल वाला और हठधर्मी रवैया है। अब स्थिति यह है कि दिल्ली की सीमाओं पर धरना दिए बैठे किसानों ने संसद के करीब पहुंच कर अपनी समांतर संसद चलानी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि सांसद आम लोगों का वोट पाकर ही संसद पहुंचते हैं, वे याद रखें कि सदन में किसानों की बात उठानी है। सरकार किसानों से बात नहीं कर रही, इसलिए उन्हें अपनी बात रखने के लिए यह तरीका निकालना पड़ा है। इस समांतर संसद में किसान नेताओं ने निर्वाचित सांसदों को धमकाया भी कि अगर वे किसानों की मांगों को संसद में नहीं उठाएंगे, तो उन्हें इसका नतीजा भी भुगतना पड़ सकता है। हालांकि ज्यादातर विपक्षी दल शुरू से किसानों की मांग के समर्थन में रहे हैं। इसे लेकर कांग्रेस नेताओं ने फिर संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। दूसरे विपक्षी दलों की तरफ से भी इसे लेकर सदन में हंगामा स्वाभाविक है। किसान आंदोलन को चलते आठ महीने हो गए, कड़ी सर्दी, धूप और बारिश झेलते किसान सड़कों पर डेरा डाले हुए हैं। मगर सरकार की तरफ से कोई व्यावहारिक रास्ता निकालने की पहल अब तक नहीं दिखी है।

किसान अपनी मांग पर अड़े हैं कि तीनों नए कृषि कानून रद्द किए जाएं और न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी दी जाए। मगर सरकार किसी भी रूप में कानून वापस लेने को तैयार नहीं है। इस हठधर्मिता में कोई बीच का रास्ता नहीं बन रहा। कानून बनाना सरकारों का काम है, मगर उसे लेकर अगर नागरिकों की तरफ से कोई आपत्ति दर्ज कराई जाती है, तो उस पर विचार करना, उन कमियों को दूर करना भी सरकार का ही दायित्व है। हालांकि सरकार कहती रही है कि वह किसानों के सुझावों के मुताबिक इन कानूनों में संशोधन को तैयार है, पर जिन बिंदुओं को लेकर किसानों को एतराज है, उन पर वह बात ही नहीं करना चाहती। दरअसल, ये कानून जिन स्थितियों में पारित कराए गए, उससे ही सरकार की मंशा पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। अनेक कृषि विशेषज्ञ, किसान संगठन इन कानूनों में फसलों की खरीद, भंडारण, सहकारी खेती आदि से जुड़े प्रावधानों को खेती-किसानी के लिए खतरा मानते रहे हैं। इनके जरिए खेती पर कारपोरेट घरानों के कब्जे की आशंका जताई जाती रही है। उन्हें इन कानूनों में संशोधन की गुंजाइश नजर नहीं आती, इसलिए वे उन्हें पूरी तरह रद्द करने की मांग कर रहे हैं।

कानूनों को उचित ठहराने के लिए सरकार ने कभी तार्किक ढंग से बात नहीं की, बल्कि उसने इस आंदोलन को ही बदनाम करने की कोशिश करती अधिक देखी गई। पहले इसे देश के एक छोटे-से हिस्से के किसानों का आंदोलन बताया गया, फिर इसे खालिस्तान समर्थक कहा गया, फिर अनेक तरीकों से धरने पर बैठे किसानों को परेशान करने की कोशिश की गई। अनेक किसान नेताओं और उनका समर्थन कर रहे लोगों पर राजद्रोह का मामला दर्ज करके उन्हें जेलों में डाल दिया गया। इस तरह किसानों की नाराजगी लगातार बढ़ती गई। अगर सरकार सचमुच इस आंदोलन की गंभीरता को समझती, तो शायद यह नौबत न आने पाती कि किसान संसद सत्र के समांतर अपनी संसद लगाते। हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाके में गांव-गांव में जनप्रतिनिधियों को किसानों का मुखर विरोध झेलना पड़ रहा है। सरकार इस मसले को जितना टालेगी, नजरअंदाज या किसानों को छकाने का प्रयास करेगी, उतना ही इस आंदोलन का रुख उग्र होने की आशंका बनी रहेगी।

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