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हमारी याद आएगी: वीणा- जिनकी खूबसूरती पर फिल्म निर्माता हुए थे दीवाने

फिल्मजगत ग्लैमर की दुनिया है, जिसमें सुंदरता का अपना महत्व है। फिल्मजगत आज भी मधुबाला को याद करता है क्योंकि वह फिल्मी इतिहास में सबसे खूबसूरत अभिनेत्री मानी गईं थीं। मुंबई फिल्मजगत में और भी खूबसूरत अभिनेत्रियां आर्इं जिनकी सुंदरता ने फिल्म निर्माताओं को आकर्षित किया। ऐसी ही अभिनेत्रियों में से एक थीं सौ से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाली वीणा यानी तजौर सुल्ताना जिनकी कल 16वीं पुण्यतिथि है।

अपने समय की मशहूर अभिनेत्री वीणा यानी तजौर सुल्ताना।

वाकया 1941 का है। अमृतसर के एक कॉलेज में पढ़ने वाली 16 साल की ताजौर सुल्ताना ने लाहौर की एक फिल्म कंपनी का विज्ञापन पढ़कर अपने फोटो पंजाबी फिल्म ‘गवंडी’ बना रहे निर्माता को चुपके से भेज दिए थे। उसे अपने चुने जाने का यकीन था क्योंकि उसे लगता था कि दूर-दूर तक उसकी जैसी खूबसूरत लड़की दूसरी नहीं है। माता-पिता फिल्मों के खिलाफ थे। बावजूद इसके कि सुल्ताना का भाई शाहजादा इफ्तिखार भी ‘गवंडी’ के विज्ञापन देने वाली फिल्म कंपनी में कैमरामैन का सहायक था।

सुलताना फिल्म के लिए चुन ली गईं। ‘गवंडी’ के निर्माता सेठ किशोरीलाल ने सुल्ताना का नाम रख दिया था वीणा। फिल्म रिलीज हुई तो घर में बवाल हो गया। बात कॉलेज तक पहुंची, तो कॉलेज ने सुल्ताना का नाम काट उसे बाहर कर दिया। उधर सुल्ताना की सुंदरता के चर्चे शुरू हो गए। फिल्मवाले प्रस्ताव लेकर घर आने लगे तो घरवाले बिफर गए। सुल्ताना पर रोक लगाने की कोशिशें कीं। मामला जब आरपार होने को आया तो शाहजादा ने अपनी बहन को साथ लिया और मुंबई चला आया।

सुल्ताना यानी वीणा कमाल की खूबसूरत थी, जो भी उन्हें देखता, दीवाना बन जाता। जब वीणा मुंबई आईं, तो वहां के नामीगिरामी निर्माता उन पर लट्टू हो गए। एक बड़े निर्माता मजहर खान ने उन्हें अपनी नई फिल्म ‘याद’ में ले लिया। महबूब खान तो वीणा के सौंदर्य पर ऐसे फिदा हुए कि उन्होंने दस साल का अनुबंध वीणा के साथ कर लिया। हर महीने दो हजार रुपए की तनख्वाह तय कर दी, साथ ही अशोक कुमार के साथ ‘नजमा’ (1943) व ‘हुमायूं’ (1945) में वीणा को फिट कर दिया और ‘मदर इंडिया’ के लिए भी साइन कर लिया (बाद में यह भूमिका नरगिस ने की)।

इसके बाद तो वीणा चोटी की अभिनेत्रियों में गिनी जाने लगीं। ‘मुगले आजम’ बनाने वाले के आसिफ ने उन्हें ‘फूल’ में मौका दिया। अशोक कुमार उनसे प्रभावित हुए तो अपने घर की फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ में लिया। गुरुदत्त ने उन्हें ‘कागज के फूल’ में जगह दी। नाडियाडवाला ने ‘ताजमहल’ में उन्हें नूरजहां बनाया, तो शेख मुख्तार ने ‘नूरजहां’ नाम से फिल्म बनाकर शीर्षक भूमिका में वीणा को लिया। उम्र बढ़ी, तो वीणा ने चरित्र भूमिकाएं शुरू कीं। ‘दो रास्ते, ‘पाकीजा’ से लेकर ‘रजिया सुलतान’ जैसी फिल्में उनके हिस्से में आईं।

मुंबई फिल्मजगत वीणा पर लट्टू था, मगर वीणा का दिल आया अल नासिर पर, जो तीन शादियां कर चुके थे। अल नासिर भोपाल के शाही परिवार से थे। सुरैया हॉलीवुड स्टार ग्रेगरी पैक की फैन थी। जब ग्रेगरी मुंबई आए तो उन्हें आधी रात को सुरैया के घर ले जाकर मिलवाने का काम अल नासिर ने किया था। सुरैया की एक झलक पाने के लिए उनके घर के सामने सुबह से ही लोगों की भीड़ लग जाती थी। इनमें एक प्रेमी ऐसा भी था जो सुबह से शाम तक सुरैया की एक झलक देखने के लिए उनके घर के सामने खड़ा रहता था। उसे हटाने के लिए फिल्मजगत के नामीगिरामी लोगों को बड़ी कोशिशें करनी पड़ीं थीं। सुरैया का वह प्रेमी कोई और नहीं वीणा का भाई शाहजादा इफ्तिखार था।

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