महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ऑटो चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य करना चाहते हैं। अभी इस फैसले पर कोई अंतिम मुहर नहीं लगी है, लेकिन इस एक विचार ने ही बीजेपी के कई नेताओं को असहज कर दिया है। दूसरे राज्यों के कई नेता इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं, इससे पैदा होने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डाल रहे हैं।
बिहार में बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता गुरु प्रकाश पासवान ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा,” बीजेपी राष्ट्रीय एकता और सांस्कृति विविधता दोनों का सम्मान करती है। मराठी भाषा का सम्मान करना महाराष्ट्र की पहचान के लिहाज से जरूरी है, लेकिन भारत की आत्मा का मूल आधर यह भी है कि सभी को समान अधिकार मिले। इस घटनाक्रम पर हमारी नजर है, अभी काफी शुरुआती चर्चा चल रही है।”
बीजेपी के साथी ही नहीं दे रहे समर्थन?
बिहार में ही जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसान ने भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के इस विचार पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। वे कहते हैं, ” महाराष्ट्र सरकार अगर कोई ऐसा फैसला लेती है तो वो वहां के स्थानीय लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन महाराष्ट्र में कई गैर मराठी लोग भी रहते हैं, इसमें बड़ी संख्या में टैक्सी ड्राइवर्स शामिल हैं जो कितने सालों से यहां रह रहे हैं। ऐसे ड्राइवर्स को पहले मराठी सीखने का पर्याप्त समय देना चाहिए।
उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद महाराष्ट्र सरकार के इस विचार से खुश नहीं हैं। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए उन्होंने कहा है कि एक स्थानीय भाषा के बारे में पता होना अलग बात है, लेकिन इसे अनिवार्य कर देना अलग। अगर सरकार ऐसे कोई नियम लाना चाहती है तो जरूरी है कि पहले लोगों को ट्रेन किया जाए। लेकिन फिर भी इस प्रकार के नियम सही नहीं हैं। इससे समाज का सौहार्द बिगड़ता है।
महाराष्ट्र सरकार का फैसला क्या था?
पिछले महाने महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सारनिक ने कहा था कि एक मई से ही मराठी को सभी लाइसेंसधारी ऑटो चालको के लिए अनिवार्य कर दिया जाएगा। उन्होंने तो चेतावनी भी दी थी कि अगर कोई मराठी बोल या नहीं लिख पाया तो उसका लाइसेंस भी चला जाएगा। लेकिन पिछले हफ्ते राज्य सरकार ने 100 दिन की वेरिफिकेशन ड्राइव चलाने का ऐलान किया। तर्क दिया गया कि ऐसे सख्त नियम बनाने से पहले ऑपरेटर्स को पर्याप्त समय देना जरूरी है।
कांग्रेस और सपा ने बनाया बड़ा मुद्दा
महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले से कई पार्टियां असहज नजर आई थीं। बिहार और उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा विरोध के सुर सुनाई दिए क्योंकि वहां से ही सबसे ज्यादा लोग काम की तलाश में आते हैं। आरजेडी के प्रवक्ता मनोज कुमार झा ने कहा, ” ऐसे निर्देश हमे अजीब लगते हैं। भाषा कभी भी लड़ाई का आधार नहीं बन कती है। यहां भाषा के जरिए भी राजनीति करने की कोशिश हो रही है। भाषाओं का काम एकजुट करना होता है। अगर ऑटो चालकों पर एक ही भाषा थोपी जाएगी तो यह उनके बोलने के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित कर सकता है।”
बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राजेश कुमार का कहना है कि महाराष्ट्र सरकार का यह फैसला संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। भाषा के आधार पर सिर्फ भड़काने की कोशिश हो रही है। बीजेपी बस भाषा और धर्म आधारित राजनीति करना ही जानती है। सपा नेता माता प्रसाद पांडे भी इस फैसले से खुश नहीं हैं। उनके मुताबिक ऐसी सख्ती माइग्रेंट वर्कर्स के हितों को आहत कर सकती है। वे कहते हैं कि ये कमजोर वर्ग के लोग हैं, उन पर भाषा को जबरदस्ती थोपना ठीक नहीं है। इस तरह भाषा थोपना उन्हें तोड़ देगा।
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