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1984 सिख विरोधी दंगे: गवाहों ने लिया था कमलनाथ का नाम, आयोग ने कहा- दोषी ठहराना संभव नहीं

सिख विरोधी दंगे की जांच के लिए गठित नानावती आयोग ने संसद के समीप गुरुद्वारा रकाबगंज पर हमले की जांच के दौरान पाया साक्ष्य ये बताता है कि वे भीड़ में देखे गए थे लेकिन बेहतर साक्ष्य के अभाव में यह कहना संभव नहीं है कि उन्होंने ने किसी तरह से भीड़ को उकसाया या वे गुरुद्वारे पर हमले में शामिल थे।

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कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ (Express Photo)

1984 सिंख विरोधी दंगे के गवाहों ने कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम लिया था, लेकिन नानवती आयोग ने कहा कि उन्हें दोषी ठहराना संभव नहीं है। सिख विरोधी दंगे की जांच के लिए गठित नानावती आयोग ने संसद के समीप गुरुद्वारा रकाबगंज पर हमले की जांच के दौरान यह तथ्य पाया कि, “कमलनाथ द्वारा दायर किया गया जवाब अस्पष्ट था। साक्ष्य ये बताता है कि वे भीड़ में देखे गए थे और उन्होंने वहां पर जाने के समय और वहां से निकलने के समय को स्पष्ट रूप से नहीं बताया था।” वरिष्ठ कांग्रेस नेता के खिलाफ दो गवाह सामने आए थे। हालांकि, आखिरकार आयाग ने यह निष्कर्ष निकाला कि, “बेहतर साक्ष्य के अभाव में यह संभव नहीं है कि नाथ ने किसी तरह से भीड़ को उकसाया या वे गुरुद्वारे पर हमले में शामिल थे।”

सिख विरोधी दंगे में कमलनाथ की कथित भूमिका गवाह नंबर 2 मुख्तार सिंह, जो गुरुद्वारा के स्टॉफ क्वार्टर में रहते थे और गवाह नंबर 17 मनीष सिंह सूरी जो कि उस समय इंडियन एक्सप्रेस के स्टाॅफ रिपोर्टर थे, की गवाही पर आधारित थी। सिंह ने कहा, “1 नवंबर 1984 को गुरुद्वारा रकाबगंज पर हमला हुआ था और यह करीब आधे घंटे तक जारी रहा। हालांकि, वहां कुछ पुलिसवाले थे, लेकिन किसी तरह की कार्रवाई नहीं की। हमला रोकने आए बुजुर्ग सिख और उनके बेटे को भीड़ द्वारा जला दिया गया।”

सिंह के बयान के आधार पर आयोग ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया, “जैसे ही भीड़ गुरुद्वारे में दाखिल हुई, मुख्य दरवाजे को तोड़ने की कोशिश की गई, लेकिन सफल नहीं हुए। इसके बाद आग लगा दी गई। मुख्तार सिंह व अन्य श्रद्धालुओं ने कर्मचारियों के साथ मिलकर आग बुझायी। पटाखे फोड़ और पत्थर फेंक भीड़ को बाहर निकाला। पटाखे फोड़ने की आवाज सुन भीड़ को लगा कि गोली चल रही है और वे भाग गए। भीड़ ने जब एक बार फिर गुरुद्वारे में घुसने की कोशिश की तो एक व्यक्ति जो अंदर मौजूद थे, ने लाइसेंसी हथियार से हवा में कुछ फायरिंग की ताकि भीड़ डर जाए।”

सिंह ने आयोग को बताया कि पहली बार पीछे हटने के बाद भीड़ बड़ी हो चुकी थी और उस समय कांग्रेस नेता कमलनाथ तथा वसंद साठे भीड़ में देखे गए थे। रिपोर्ट में आगे बताया गया है, “कांग्रेस नेता द्वारा निर्देश दिए जाने के बाद पुलिस ने गुरुद्वारा पर कई राउंड फायरिंग की। कुछ देर बाद गुरुद्वारा प्रबंधक गुरदिल सिंह ने कांग्रेस नेताओं से गुहार लगाई कि वे भीड़ को हमला करने से रोके और यहां से जाने को कहें। उनके गुहार के बाद भीड़ पीछे हट गई लेकिन कुछ देर बाद फिर से बड़ी भीड़ गुरुद्वारा के समीप इकट्ठा हो गई।”

सूरी ने आयोग को बताया कि वे शाम 4 बजे के करीब गुरुद्वारा रकाबगंज गए थे और देखा कि करीब 4000 लोगों की भीड़ का नेतृत्व कमलनाथ कर रहे हैं। रिपोर्ट में सूरी के हवाले से बताया गया है, “भीड़ गुरुद्वारे में घुसने की कोशिश कर रही थी। लेकिन कांग्रेस सांसद व अन्य कांग्रेस नेता भीड़ को काबू करने में सक्षम थे।” सूरी ने अपने बयान में यह भी कहा कि कमलनाथ ने गुरुद्वारा के निकट भीड़ को रोकने की कोई कोशिश नहीं की। रिपोर्ट में सूरी के बयान के हवाले से यह बताया गया है, “कमलनाथ भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे और भीड़ उनके निर्देश का इंतजार कर रही थी। सूरी ने कमलनाथ द्वारा दिए गए किसी निर्देश को नहीं सुना। हालांकि, सूरी ने यह देखा कि वे भीड़ में मौजूद लोगों से बात कर रहे थे।”

आयोग द्वारा मांगे गए जवाब में अपने शपथ पत्र के माध्यम से कमलनाथ ने कहा कि 1 नवंबर 1984 की दोपहर उन्हें सूचना मिली की कि गुरुद्वारा के नजदीक हिंसा हुई है और वे कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता थे, इसलिए वहां जाने का निश्चय किया। रिपोर्ट में कमलनाथ के बयान के हवाले से बताया गया है, “जब कमलनाथ वहां पहुंचे तो अर्धसैनिक बल के जवान भी मौजूद थे। उन्होंने वहां भीड़ में मौजूद लोगों से यह जानने की कोशिश किया कि वे यहां क्यों इकट्ठा हुए हैं। उन्हें बताया गया कि कुछ हिंदू पुरुषों और स्त्रियों को गुरुद्वारे में बंधक बना लिया गया है और यही गुस्सा की सबसे बड़ी वजह थी। लेकिन इस वक्त वहां पुलिस कमीश्नर आ गए और वे आश्वस्त हो गए कि पुलिस पूरी स्थिति को संभाल लेगी। कमलनाथ ने वहां मौजूद लोगों से कानून को अपने हाथ में नहीं लेने की अपील भी की। उन्होंने इस बात से इंकार किया कि किसी को फायरिंग करने का निर्देश दिया। साथ ही कमलनाथ ने इस बात से भी इंकार किया कि इससे पहले उन्होंने कभी किसी तरह की भीड़ का नेतृत्व या उसे नियंत्रित किया।”

कमलनाथ के बयान पर आयोग ने निष्कर्ष दिया, “कमलनाथ का बयान पूरी तरह अस्पष्ट है। उन्होंने यह साफ तौर पर नहीं बताया कि किस समय वे वहां गए और कितनी देर रहे। गुरुद्वारा के समीप सुबह 11:30 से 3:30 तक स्थिति खराब रही। साक्ष्य बताते हैं कि वे दोपहर 2 बजे के करीब भीड़ में देखे गए थे। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि वे गुरुद्वारा किसी के साथ गए थे या अकेले गए थे और कैसे गए थे। हालांकि, कमलनाथ से 20 साल बाद डिटेल मांगी गई। इसलिए यह भी संभव हो सकता है कि इस वजह से वे पूरी जानकारी नहीं दे पाए। सूरी ने जो बयान दिया है उसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि कमलनाथ ने किसी तरह से भीड़ को उकसाया है। सिंह उस जगह से काफी दूर थे, जहां कमलनाथ खड़े थे। वे ऐसा कुछ नहीं सुन सके तो कमलनाथ ने भीड़ में खड़े लोगों से कहा। ऐसी स्थिति में सबूतों के अभाव में आयोग के लिए यह कहना संभव नहीं है कि कमलनाथ ने किसी तरह से भीड़ को उकसाया था या वे गुरुद्वारे पर हमले में शामिल थे।”

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