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भाजपाई बने एस.जयशंकर गुजरात से लड़ेंगे राज्यसभा उपचुनाव, पार्टी ने जारी की उम्मीदवारों की लिस्ट

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर सोमवार को औपचारिक रूप से कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा के समक्ष भाजपा में शामिल हो गए। 64 वर्षीय जयशंकर न तो राज्यसभा और न ही लोकसभा के सदस्य हैं।

विदेश मंत्री एस जयशंकर। (Photo: PTI)

मोदी सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद 64 वर्षीय एस जयशंकर 24 दिन बाद औपचारिक रूप से संसद भवन परिसर भाजपा में शामिल हुए। इस मौके पर भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी मौजूद रहे। अब वे गुजरात से राज्यसभा का उपचुनाव लड़ेंगे। पार्टी ने गुजरात में खाली हुए राज्यसभा की दो सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी है। इनमें एक एस. जयशंकर और दूसरा जेएम ठाकोर (लोखंडवाला) का नाम शामिल है।

अनुभवी नौकरशाह एवं पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर पहले ऐसे विदेश सचिव हैं जो विदेश मंत्री भी बने हैं। जयशंकर को चीन एवं अमेरिका मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। जयशंकर को विदेश सेवा से अवकाशग्रहण करने के 16 महीने बाद यह महत्वपूर्ण दायित्व दिया गया है। 64 वर्षीय जयशंकर न तो राज्यसभा और न ही लोकसभा के सदस्य हैं। अनुभवी राजनयिक जयशंकर चीन और अमेरिका के साथ बातचीत में भारत के प्रतिनिधि भी रहे थे।

देश के प्रमुख सामरिक विश्लेषकों में से एक दिवंगत के . सुब्रमण्यम के पुत्र जयशंकर ऐतिहासिक भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के लिए बातचीत करने वाली भारतीय टीम के एक प्रमुख सदस्य थे। इस समझौते के लिए 2005 में शुरूआत हुयी थी और 2007 में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली संप्रग सरकार ने इस पर हस्ताक्षर किए थे।

जनवरी 2015 में जयशंकर को विदेश सचिव नियुक्त किया गया था और सुजाता सिंह को हटाने के सरकार के फैसले के समय को लेकर विभिन्न तबकों ने तीखी प्रतिक्रिया जतायी थी। जयशंकर अमेरिका और चीन में भारत के राजदूत के पदों पर भी काम कर चुके हैं।

1977 बैच के भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) अधिकारी जयशंकर ने लद्दाख के देपसांग और डोकलाम गतिरोध के बाद चीन के साथ संकट को हल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त और चेक गणराज्य में राजदूत पदों पर भी काम कर चुके हैं।वे जनवरी 2015 से जनवरी 2018 तक विदेश सचिव रहे हैं।

जयशंकर के समक्ष जी..20, शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स संगठन जैसे विभिन्न वैश्विक मंचों पर भारत के वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने की उम्मीदों को अमल में लाने की जिम्मेदारी भी रहेगी। हालांकि, उनके नेतृत्व में अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और यूरोपीय संघ तथा पड़ोसी देशों के साथ व्यापार एवं रक्षा संबंधों को और मजबूत बनाने पर मंत्रालय का मुख्य जोर रहेगा। उनके समक्ष एक अन्य चुनौती चीन के साथ भारत के संबंधों को और मजबूत बनाने पर होगी जो 2017 के मध्य में डोकलाम विवाद के बाद प्रभावित हुए। (भाषा इनपुट के साथ)

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