केंद्र सरकार ने तकनीक के क्षेत्र में भारत को आगे बढ़ाने के लिए 22 प्राइवेट कंपनियों को लगभग 2192 करोड़ के सॉफ्ट लोन की मंजूरी दी थी। ये कंपनियां स्पेस साइंस, ऊर्जा, तकनीक, दवा और अन्य क्षेत्रों में काम करती हैं। इन 22 कंपनियों का चयन 12 सदस्यों वाली एक चयन समिति या पैनल ने किया था। लोन के लिए 124 कंपनियों ने आवेदन किया था।
सवाल यह है कि इस मामले में विवाद कहां से शुरू हुआ?
इंडियन एक्सप्रेस के द्वारा की गई पड़ताल में सामने आया है कि जिन 22 प्राइवेट कंपनियों को लोन मिला, उनमें से 15 कंपनियां ऐसी थीं जिनका संबंध चयन समिति के 7 सदस्यों से था और इस वजह से हितों का टकराव (Conflict of Interest) का सवाल खड़ा होता है।
इन 15 कंपनियों को 1,377 करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग मिली। इनमें से नौ कंपनियों का संबंध पैनल के अध्यक्ष सौरभ श्रीवास्तव से है। सौरभ श्रीवास्तव एंजेल इन्वेस्टिंग नेटवर्क (एआईएन) के संस्थापक भी हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या इन कंपनियों का चयन पूरी तरह निष्पक्षता के आधार पर किया गया?
ये 12 सदस्य प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीडीबी) की निवेश समिति का हिस्सा हैं। इस समिति को नवंबर 2025 में शुरू किए गए 1 लाख करोड़ रुपये के रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन (आरडीआई) फंड के लिए कंपनियों का चयन करने का काम सौंपा गया है।
इंडियन एक्सप्रेस के द्वारा संपर्क किए जाने पर पैनल के सातों सदस्यों ने किसी भी प्रकार की गड़बड़ी होने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने हितों की जानकारी सरकार को पहले ही दे दी थी और उनसे जुड़ी कंपनियों से संबंधित फैसलों से खुद को अलग कर लिया था।
कांग्रेस सांसद प्रवीण चक्रवर्ती ने उठाया मामला
इस मुद्दे को संसद में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रवीण चक्रवर्ती ने उठाया था। उनके सवालों के जवाब में 30 जुलाई को विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने चयन समिति या पैनल के सात सदस्यों ने उन कंपनियों में अपनी वित्तीय हिस्सेदारी होने की जानकारी दी थी जिन्हें फंडिंग के लिए चुना गया था। चूंकि इन कंपनियों में निवेश को लेकर सवाल नहीं पूछा गया था इसलिए सरकार ने इसकी जानकारी नहीं दी।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की ओर से कहा गया कि कंपनियों का चयन पूरी तरह से योग्यता के आधार पर किया गया था। विभाग ने यह भी कहा कि पैनल के जिन सदस्यों का किसी कंपनी के साथ हितों का टकराव (Conflict of Interest) था, उन्होंने उस कंपनी के द्वारा दिए गए प्रस्ताव की जांच या मंजूरी की प्रक्रिया में भाग नहीं लिया।
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में चक्रवर्ती ने कहा कि डीप टेक से जुड़ी फंडिंग समिति में वैज्ञानिकों, शिक्षाविद और ऐसे लोगों को रखा जाना चाहिए जिनका फायदा कमाने का कोई इरादा न हो।
Registrar of Companies (RoC), संसद के रिकॉर्ड और चयन समिति या पैनल के सदस्यों और उनसे जुड़ी कंपनियों के बारे में वेबसाइटों से क्या जानकारी मिली?
पैनल के चेयरमैन सौरभ श्रीवास्तव का मामला
सौरभ श्रीवास्तव नैसकॉम (नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज) और आईवीसीए (इंडियन वेंचर एंड ऑल्टरनेट कैपिटल एसोसिएशन) के पूर्व अध्यक्ष और निवेश फर्म इंडियन एंजेल नेटवर्क (आईएएन) ग्रुप के सह-संस्थापक हैं। वह 12 सदस्यों वाले पैनल के चेयरमैन हैं।
आरओसी के रिकॉर्ड और आईएएन की वेबसाइट से पता चलता है कि वह उन 22 कंपनियों में से सबसे अधिक कंपनियों से जुड़े हुए हैं।
| क्रम संख्या | कंपनी | शहर | RDI Fund सहायता | IAN Group/संबंधित निवेश | श्रीवास्तव/अन्य संबंध |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. | Noccarc Robotics | पुणे | 11.41 करोड़ रुपये | शुरुआत में और बाद में भी IAN Group ने निवेश किया। IAN Fund की ट्रस्टी Vistra ITCL (India) के पास कंपनी की 44.05% हिस्सेदारी है। | श्रीवास्तव कंपनी के निदेशक हैं और उनके पास 0.75% व्यक्तिगत हिस्सेदारी भी है। |
| 2. | EndureAir Systems | नोएडा | 30.01 करोड़ रुपये | IAN Fund ने भी निवेश किया है। | मार्च 2025 तक IIT कानपुर की संस्था FIRST के पास 2.35% हिस्सेदारी थी। श्रीवास्तव FIRST के भी निदेशक हैं। |
| 3. | BigEndian Semiconductors | बेंगलुरु | 130 करोड़ रुपये | IAN Fund ने निवेश किया है। | — |
| 4. | e-TRNL Energy | मुंबई | 94 करोड़ रुपये | IAN Fund ने निवेश किया है। | — |
| 5. | Dhruva Space | हैदराबाद | 105 करोड़ रुपये | IAN ने निवेश किया है। | श्रीवास्तव के पास कंपनी का 1 प्रेफरेंस शेयर है। |
| 6. | Astrome Technologies | बेंगलुरु | 64.05 करोड़ रुपये | नवंबर 2025 तक Vistra ITCL और IAN Services के माध्यम से IAN Group के पास 1,501 शेयर थे। | — |
| 7. | Peptris Technologies | बेंगलुरु | 86 करोड़ रुपये | IAN Fund ने निवेश किया है। | — |
| 8. | Serigen Mediproducts | पुणे | 20 करोड़ रुपये | IAN के पास 5 प्रेफरेंस शेयर तथा IAN Alpha Fund के पास 1,004 प्रेफरेंस शेयर हैं। | — |
| 9. | Manastu Space Technologies | ठाणे | 116 करोड़ रुपये | IAN Services के पास 67 प्रेफरेंस शेयर हैं। | — |
सौरभ श्रीवास्तव ने क्या कहा?
सौरभ श्रीवास्तव ने कहा, “निवेश समिति में उद्योग और तकनीक क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल हैं। इसलिए हितों का टकराव होने से इनकार नहीं किया जा सकता। खासकर उस स्थिति में जब समिति के सदस्य फंड के मामलों से जुड़े हों और उन्होंने किसी कंपनी में निवेश किया हो। ऐसे सभी मामलों में नियम साफ हैं- समिति के सदस्य को स्वयं को अलग रखना होगा और इसे बैठकों में दर्ज भी किया जाता है।”
के. आर. एस. जमवाल
के. आर. एस. जमवाल टाटा इंडस्ट्रीज के पूर्व कार्यकारी निदेशक हैं। जिन 22 कंपनियों का चयन हुआ, जमवाल का उनमें से सात कंपनियों से संबंध रहा है।
| कंपनी | मुख्यालय | RDI Fund | जमवाल से संबंधित जानकारी |
|---|---|---|---|
| Tejas Networks | बेंगलुरु | 250 करोड़ रुपये | यह टाटा समूह की कंपनी है। जमवाल जून 2026 तक टाटा इंडस्ट्रीज़ के कार्यकारी निदेशक थे। |
| Manastu Space Technologies | ठाणे | 116 करोड़ रुपये | उनके पास 67 प्रेफरेंस शेयर हैं। |
| ThinkMetal | चेन्नई | 6.7 करोड़ रुपये | उनके पास 53 प्रेफरेंस शेयर हैं। |
प्रक्रिया पूरी तरह सही और पारदर्शी हो- चक्रवर्ती
राज्यसभा सांसद चक्रवर्ती ने कहा, ”मैं किसी पर कोई आरोप नहीं लगा रहा हूं और ना ही यह कह रहा हूं कि यहां कोई गलत काम हुआ है। मेरी चिंता सिर्फ संस्थागत मजबूती (Institutional Robustness) को लेकर है। मैं पूरी तरह इस विचार का समर्थ करता हूं कि सरकार को अत्याधुनिक तकनीक (Cutting-edge Technology) में रिसर्च और डिवेलपमेंट (R&D) के लिए फंड देना चाहिए। यह कोई वित्तीय निवेश कार्यक्रम नहीं बल्कि जनता के पैसे से चलने वाली एक रणनीतिक सार्वजनिक (Strategic Public Goods Initiative) है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि इसकी प्रक्रियाएं पूरी तरह सही और पारदर्शी हों।
चक्रवर्ती ने आगे कहा, ”कॉरपोरेट जगत में हितों का टकराव जैसी स्थितियां अक्सर सामने आती हैं और उनका समाधान आमतौर पर खुलासा और संबंधित वयक्ति के खुद को निर्णय प्रक्रिया से अलग कर लेने (Recusal) के जरिए किया जाता है। लेकिन सार्वजनिक धन के मामले में कॉरपोरेट जगत और सरकार के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। सार्वजनिक धन के इस्तेमाल के अतिरिक्त सुरक्षा उपाय (Guardrails) जरूरी हैं जो व्यवस्था कॉरपोरेट सेक्टर के लिए पर्याप्त हो सकताी है। वह सार्वजनिक नीति (Public Policy) के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। ऐसी पहल को ना केवल पारदर्शिता को सर्वोच्च मानकों का पालन करना चाहिए बल्कि लोगों को यह स्पष्ट रूप से दिखना भी चाहिए कि ऐसा किया जा रहा है।”
निवेश समिति या पैनल से जिन सात निजी कंपनियों का संबंध नहीं है, वे कंपनियां ये हैं।
| कंपनी | मुख्यालय | RDI Fund |
|---|---|---|
| आईस्टेम रिसर्च (iStem Research) | बेंगलुरु | ₹125 करोड़ |
| यूबीफ्लाई टेक्नोलॉजीज (UBIFLY Technologies) | मुंबई | ₹285 करोड़ |
| क्वनु लैब्स (QNu Labs) | बेंगलुरु | ₹150 करोड़ |
| गैलेक्सी स्पेस सॉल्यूशंस (Galaxy Space Solutions) | चेन्नई | ₹63.84 करोड़ |
| मल्टी नैनो सेंस टेक्नोलॉजीज (Multi Nano Sense Technologies) | बेंगलुरु | ₹37.51 करोड़ |
| आइडियाफोर्ज टेक्नोलॉजी (ideaForge Technology) | ठाणे | ₹151 करोड़ |
| एंडिमेंशन टेक्नोलॉजी (Andimension Technology) | मुंबई | ₹3 करोड़ |
संसद के रिकॉर्ड से पता चलता है कि के. आर. एस. जमवाल ने एंड्योरएयर सिस्टम्स, बिगएंडियन सेमीकंडक्टर्स, पेप्ट्रिस टेक्नोलॉजीज और नोकार्क रोबोटिक्स में भी अपनी हिस्सेदारी का खुलासा किया है। जमवाल ने कहा, “मैंने तेजस नेटवर्क्स की मूल्यांकन बैठक और फैसले से खुद को अलग कर लिया था क्योंकि मैं उस समय टाटा इंडस्ट्रीज का कार्यकारी निदेशक था, हालांकि मेरी व्यक्तिगत या व्यावसायिक क्षमता में कोई वित्तीय हिस्सेदारी शामिल नहीं थी।”
TVS Capital Funds के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक गोपाल श्रीनिवासन के पास चेन्नई स्थित Agnikul Cosmos के 33 प्रेफरेंस शेयर हैं। इन प्रेफरेंस शेयर को आरडीआई फंड के तहत 200 करोड़ रुपये में खरीदा गया था।
गोपाल श्रीनिवासन ने कहा कि समिति के नियम सख्त हैं। समित के सदस्यों को न केवल अपनी संबंधित कंपनियों, बल्कि उनकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों में भी अपने हिस्सेदारी के बारे में जानकारी देनी होती है।
सुधीर मेहता की Replus Engitech में है हिस्सेदारी
Pinnacle Industries और EKA Mobility के संस्थापक और चेयरमैन सुधीर मेहता की पुणे की Replus Engitech में हिस्सेदारी है। Replus Engitech को आरडीआई के फंड से 42.75 करोड़ रुपये मिले। मेहता ने कहा कि ऐसे में हितों का टकराव की स्थिति सामान्य बात है।
मेहता ने कहा, बैंकों, कॉर्पोरेट जगत या वित्तीय संस्थानों में हमें इनका सामना अक्सर करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता महत्वपूर्ण है।
Tejas Networks को मिले 250 करोड़
Tejas Networks के सह-संस्थापक और पूर्व CEO हैं। वह Ather Energy में स्वतंत्र निदेशक भी हैं। Tejas Networks को आरडीआई के फंड से 250 करोड़ और Ather Energy को 211.89 करोड़ रुपये मिले।
आनंद देशपांडे Persistent Systems के चेयरमैन हैं। देशपांडे के पास Serigen Mediproducts के 65 प्रेफरेंस शेयर हैं। उनकी कंपनी को आरडीआई फंड से 20 करोड़ रुपये मिले हैं।
टाटा स्टील में टेक्नोलॉजी और रिसर्च एंड डेवलपमेंट के पूर्व उपाध्यक्ष देबाशीष भट्टाचार्य की हैदराबाद में स्थित NeoSeeker Metals में हिस्सेदारी है। NeoSeeker Metals को आरडीआई फंड से 10 करोड़ रुपये मिले।
द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में निवेश समिति (Investment Committee) के सात सदस्यों ने विस्तार से अपनी बात रखी।
इनमें पूर्व नासकॉम (NASSCOM) और आईवीसीए (IVCA) के चेयरमैन तथा इंडियन एंजेल नेटवर्क (Indian Angel Network) के सह-संस्थापक सौरभ श्रीवास्तव ने कहा, ”आरडीआई फंड (RDI Fund) हमारे ईकोसिस्टम के लिए एक बेहद नया, अभिनव और अनूठा विचार है। 12 सदस्यीय निवेश समिति में उद्योग जगत के ऐसे प्रोफेशनल शामिल हैं जिनका बैकग्राउंड टेक्नोलॉजी और निवेश से जुड़ा है। इसमें बेहद प्रतिष्ठित और अनुभवी सदस्य हैं। इस समिति में सरकार का कोई भी मतदान करने वाला सदस्य नहीं है।”
उन्होंने बताया कि निर्णय प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और मजबूत बनाने के लिए समिति ने एक अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी अपनाया है। उन्होंने आगे कहा, ”यह तय किया गया कि निवेश का फैसला साधारण बहुमत से नहीं बल्कि सुपर मेजॉरिटी (Super Majority) से होगा। उदाहरण के लिए, अगर किसी परियोजना का मूल्यांकन नौ सदस्य कर रहे हैं तो उसे मंजूरी देने के लिए कम से कम छह सदस्यों की सहमति जरूरी होगी सिर्फ पांच की नहीं। ये अतिरिक्त सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करते हैं कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष रहे और केवल सबसे योग्य परियोजनाओं का ही चयन हो।”
जामवाल ने क्या कहा?
टाटा इंडस्ट्रीज के पूर्व कार्यकारी निदेशक के. आर. एस. जामवाल ने कहा, ”इंडस्ट्री एक्सपर्ट से बनी किसी भी निवेश समिति (Investment Committee) के सदस्यों का उस उद्योग से किसी ना किसी रूप में जुड़ाव होना स्वाभाविक है। वास्तव में, उन्हें इसी विशेषज्ञता के कारण चुना गया है। सभी 11 मतदान करने वाले सदस्य अनुभवी प्रोफेशनल हैं जो या तो स्वयं सफल कारोबार खड़े कर चुके हैं या सही उद्यमियों और स्टार्टअप्स की पहचान कर उनमें निवेश करने का अनुभव रखते हैं।”
उन्होंने कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से 100 से ज्यादा स्टार्टअप्स में छोटे स्तर पर एंजेल निवेश (Angel Investment) किए हैं। उन्होंने आगे बताया, ”मेरी हमेशा से यह नीति रही है और पूरी निवेश समिति भी इसी का पालन करती है कि जिस किसी कंपनी में मेरा थोड़ा-सा भी एंजेल निवेश हो। उससे जुड़े फंडिंग फैसले की प्रक्रिया से मैं पूरी तरह खुद को अलग कर लेता हूं। टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड (TDB) की निवेश समिति की ‘हितों के टकराव’ नीति इस मामले में पूरी तरह स्पष्ट है और संभवतः आरडीआई (RDI) दिशानिर्देशों से भी अधिक सख्त है। इसका कड़ाई से पालन किया जाता है।”
उन्होंने आगे कहा, ”यह फंड एक साहसिक पहल है और भारतीय डीप-टेक सेक्टर के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अब देखना यह होगा कि यह प्रयोग कितना सफल होता है और समय के साथ किस तरह विकसित होता है।”
जामवाल ने यह भी बताया कि उन्होंने संभावित सवालों की आशंका को देखते हुए एक मामले में अतिरिक्त सावधानी बरती थी। उन्होंने कहा, ”दिलचस्प बात यह है कि मुझे पहले से ही अंदाजा था कि किसी समय इस तरह के सवाल उठ सकते हैं। इसलिए मैंने तेजस नेटवर्क्स (Tejas Networks) से जुड़ी वैल्यूएशन और निर्णय की बैठक से भी खुद को अलग कर लिया था। उस समय मैं टाटा इंडस्ट्रीज में कार्यकारी निदेशक था जबकि उस मामले में मेरी पर्सनल या प्रोफेशनल किसी भी स्तर पर कोई वित्तीय हिस्सेदारी नहीं थी।”
गोपाल श्रीनिवासन ने क्या कहा?
टीवीएस कैपिटल्स फंड के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक गोपाल श्रीनिवासन ने कहा, ”मुझे लगता है कि यह बिल्कुल उचित सवाल है और अच्छा है कि इस पर सार्वजनिक रूप से चर्चा हो रही है। आरडीआई फंड का मुख्य उद्देश्य उन कंपनियों को लॉन्ग-टर्म रिस्क कैपिटल उपलब्ध कराना है जो नई और संभावनाशील तकनीकों का विकास कर रही हैं। खासकर ऐसी तकनीकें जो देश की रणनीतिक आत्मनिर्भरता (Sovereign Ownership) के लिए महत्वपूर्ण हों। इस पूरी प्रक्रिया में निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी है। वास्तव में फंडिंग की कुछ कमियों को दूर करने के लिए आरडीआई फंड बनाने का सुझाव भी निजी क्षेत्र की ओर से ही आया था।”
उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड (TDB) की निवेश समिति जो दूसरे स्तर की पहली फंड मैनेजर है, पूरी तरह निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों और पेशेवरों से बनी है। उनका कहना है, ”यह एक सोचा-समझा फैसला था। उद्देश्य यह था कि जिन वरिष्ठ पेशेवरों के पास विकसित हो रही तकनीकों का डायरेक्ट अनभव है, वे शुरुआती चरण (Nascent Stage) की संभावनाशील परियोजनाओं की बेहतर पहचान कर सकें और उन्हें जरूरी फंडिंग उपलब्ध करा सकें। इस फंडिंग के साथ अन्य स्रोतों से भी पूंजी मिलती है जिससे निवेश का प्रभाव दोगुना हो सकता है।”
गोपाल श्रीनिवासन ने कहा कि सरकार की किसी अन्य व्यवस्था में निजी क्षेत्र की इतनी सक्रिय भूमिका शायद ही देखने को मिलती है। उन्होंने कहा, ”इसी वजह से हमें पहले से ही यह स्पष्ट था कि हितों के टकराव जैसी स्थितियां सामने आएंगी। इसका कारण यह है कि यह अभी भी अपेक्षाकृत छोटा ईकोसिस्टम है और समिति के कई सदस्य दशकों से इन क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।”
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं। उनके मुताबिक, ”इसलिए जरूरत थी कि हितों के टकराव से निपटने के लिए बेहद कड़े नियम हों। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि इस संबंध में बनाए गए नियम काफी विस्तृत और सख्त हैं। सदस्यों को सिर्फ उन कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी का खुलासा नहीं करना होता जिन्होंने फंडिंग के लिए आवेदन किया है बल्कि उन कंपनियों के प्रतिद्वंद्वियों में भी अपनी हिस्सेदारी बतानी होती है। यह स्टैंडर्ड, इंडस्ट्री की सामान्य निवेश समितियों से कहीं ज्यादा कठोर हैं।”
उन्होंने आगे कहा, ”यदि किसी कंपनी में स्वयं सदस्य, उनके निकट परिवार या उनके फंड की किसी भी प्रकार की हिस्सेदारी या हित हो तो उस सदस्य के लिए उस कंपनी के मूल्यांकन और निर्णय प्रक्रिया से पूरी तरह खुद को अलग करना अनिवार्य है। इस नियम का हर मामले में केवल औपचारिक रूप से ही नहीं बल्कि उसकी मूल भावना के अनुरूप भी सख्ती से पालन किया गया है।”
हितों का टकराव होना असामान्य बात नहीं: सुधीर मेहता
Pinnacle Industries और EKA Mobility के संस्थापक एवं चेयरमैन सुधीर मेहता ने कहा, ”हितों के टकराव जैसी स्थितियां कोई असामान्य बात नहीं हैं। बैंकों, कॉरपोरेट जगत और वित्तीय संस्थानों में हम ऐसी परिस्थितियों का लगातार सामना करते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी बैंक के गवर्निंग बोर्ड का कोई सदस्य ऐसी कंपनी में निवेशक है जो उसी बैंक से ऋण के लिए आवेदन करती है तो ऐसी स्थिति बन सकती है। ऐसे मामलों में मानक प्रक्रिया पूरी जानकारी का खुलासा करना और संबंधित निर्णय प्रक्रिया से खुद को अलग (Mandatory Recusal) कर लेना है। आरडीआई फंड के मामले में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई है। पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है।”
तेजस नेटवर्क्स के सह-संस्थापक और पूर्व सीईओ संजय नायक ने कहा, ”मुझे लगता है कि हितों के टकराव से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए जो व्यवस्था बनाई गई है, वह पर्याप्त है। केवल इसलिए कि किसी व्यक्ति का कुछ विशेष कंपनियों में निवेश है, उसे चयन समिति से बाहर रखने का आधार नहीं बनना चाहिए। डीप-टेक ईकोसिस्टम के सबसे योग्य लोग स्वाभाविक रूप से इसी इकोसिस्टम से जुड़े होंगे और यही अनुभव उन्हें निवेश समिति के लिए उपयुक्त बनाता है।”
उन्होंने कहा कि आरडीआई फंड सरकार की ओर से पिछले 25 वर्षों की सबसे साहसिक पहलों में से एक है। उन्होंने कहा, ”आरडीआई फंड सरकार का एक बड़ा और साहसिक कदम है। यह पिछले 25 वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण पहल है। कंपनियों के चयन के लिए इसमें लचीला दृष्टिकोण अपनाया गया है। सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय (Safeguards) मौजूद हैं और साथ ही इसका उद्देश्य भारत में एक मजबूत डीप-टेक इकोसिस्टम तैयार करना है।”
संजय नायक ने कहा कि तकनीकी क्षेत्र में तेज निर्णय लेना बेहद जरूरी है। उनका कहना है, ”फैसले जितनी तेजी से होंगे, देश को उतना ही लाभ होगा। अगर हम फैसला लेने में देर करेंगे तो तकनीक के क्षेत्र में दूसरे देशों से और पीछे छूट जाएंगे। हम नहीं चाहते कि केवल पूंजी की कमी के कारण हमारी कंपनियां वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएं।”
Persistent Systems के चेयरमैन आनंद देशपांडे ने क्या कहा?
Persistent Systems के चेयरमैन आनंद देशपांडे ने कहा, ”भारत का डीप-टेक ईकोसिस्टम अभी काफी छोटा है। अगर हम चयन समिति के लिए इसी क्षेत्र के अनुभवी लोगों को चाहते हैं तो ऐसे लोगों को ढूंढना बेहद मुश्किल होगा जो इस ईकोसिस्टम में किसी ना किसी रूप में निवेश न कर रहे हों। मेरा मानना है कि हितों के टकराव जैसी स्थितियों से निपटने के लिए मौजूदा व्यवस्था में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। जिन कंपनियों के हम मालिक हैं या जिनमें हमारी कोई ऑपरेशनल भूमिका है, वे इस फंड के लिए आवेदन करने की पात्र ही नहीं हैं। यह फैसला शुरुआत में ही कर लिया गया था।”
उन्होंने कहा कि निवेश समिति का कोई भी सदस्य व्यक्तिगत लाभ के लिए इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। मुझे नहीं लगता कि चयन समिति में शामिल कोई भी व्यक्ति यहां अपने निजी हित के लिए आया है। इस तरह की प्रक्रिया में भाग लेना अपने आप में काफी समय और प्रतिबद्धता की मांग करता है। आरडीआई फंड एक बेहद खास उद्देश्य के लिए बनाया गया है और यह डीप-टेक क्षेत्र की वास्तविक जरूरत को पूरा करने की कोशिश करता है। इसी उद्देश्य से निवेश समिति का गठन इस तरह किया गया है।
देशपांडे ने कहा कि डीप-टेक क्षेत्र देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन इसमें जोखिम भी काफी अधिक होता है। उनके मुताबिक, ”डीप-टेक ईकोसिस्टम भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन यह एक उच्च जोखिम वाला क्षेत्र भी है। ये सामान्य कारोबारी मॉडल नहीं हैं। इस क्षेत्र की प्रतिष्ठित कंपनियों के लिए भी बाजार से पूंजी जुटाना आसान नहीं होता। आरडीआई फंड से मिलने वाली फंडिंग उनके लिए राह कुछ आसान बना सकती है लेकिन इसके बाद भी उनके सामने लंबा और चुनौतीपूर्ण सफर रहेगा।”
उन्होंने कहा कि यदि कोई तकनीक अंततः व्यावसायिक रूप से सफल नहीं भी होती तब भी उसका एक बड़ा सकारात्मक प्रभाव रहेगा। उनका कहना है, ”अगर चयनित तकनीक अंत में सफल नहीं भी होती तब भी इस पूरी प्रक्रिया के दौरान जो डीप-टेक इकोसिस्टम तैयार होगा। वह भारतीय इंडस्ट्री और इनोवेशन के लिए अमूल्य साबित होगा।”
आनंद देशपांडे ने अंत में कहा, ”कोई भी व्यवस्था पूरी तरह परिपूर्ण नहीं होती। लेकिन इस फंड के लिए बेहद साफ और पारदर्शी प्रक्रियाएं पहले से लागू की जा चुकी हैं। हम सभी हितों के टकराव की संवेदनशीलता को अच्छी तरह समझते हैं और इस मुद्दे को लेकर पूरी तरह सजग हैं।”
टाटा स्टील के पूर्व उपाध्यक्ष (प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान एवं विकास) और लायनस्टेड वेंचर्स के मैनेजिंग पार्टनर देबाशीष भट्टाचार्जी ने कहा, ”आरडीआई फंड का उद्देश्य प्रोपल्शन, इंजन, बैटरी, रोबोट, ड्रोन, नए मटेरियल, बायोटेक्नोलॉजी जैसी उभरती हुई डीप-टेक तकनीकों की पहचान करना और उन्हें समर्थन देना है। ऐसे क्षेत्रों को धैर्यपूर्ण पूंजी पेशेंट कैपिटल और विषय विशेषज्ञता (Domain Knowledge) की जरूरत होती है। ये तकनीकें ना केवल व्यावसायिक रूप से सफल हो सकती हैं बल्कि भारत को उसकी औद्योगिक और तकनीकी क्षमता हासिल करने में भी मदद कर सकती हैं।”
उन्होंने कहा कि इन तकनीकों का चयन करने की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को दी गई है जिन्हें इस क्षेत्र का दशकों का अनुभव है। उनका कहना है कि जिन लोगों को इन तकनीकों के चयन की जिम्मेदारी दी गई है, वे तकनीकी या व्यावसायिक या दोनों क्षेत्रों में दशकों से काम कर रहे हैं। कई बार उन्हें असफलता भी मिली है लेकिन वही असफलताएं उनके अनुभव और निर्णय क्षमता (Instincts) को और बेहतर बनाती हैं।
देबाशीष भट्टाचार्जी के अनुसार, ”ऐसे अनुभवी लोगों को चयन प्रक्रिया में शामिल करने से सही परियोजनाओं के चुने जाने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे विशेषज्ञों के चयन समिति में होने से यह संभावना ज्यादा हो जाती है कि आरडीआई फंड का पैसा सही कंपनियों तक पहुंचे। इसमें कुछ असफलताएं भी हो सकती हैं लेकिन यही इस तरह के निवेश का स्वाभाविक जोखिम है। फिर भी सफलता की संभावना कहीं अधिक रहती है। आरडीआई फंड अपनी फंडिंग व्यवस्था के जरिए भारत में एक अनूठा इनोवेशन ईकोसिस्टम तैयार कर रहा है जो उच्च जोखिम वाली नई तकनीकों में निजी निवेश को भी प्रोत्साहित करेगा।”
उन्होंने हितों के टकराव के मुद्दे पर कहा, ”जहां तक हितों के टकराव का सवाल है, मेरा मानना है कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि पूरी प्रक्रिया सिर्फ निष्पक्ष ही ना हो बल्कि लोगों को निष्पक्ष दिखाई भी दे। मेरा मानना है कि इसके लिए जो विस्तृत दिशा-निर्देश बनाए गए हैं और जिनका अक्षरशः (Letter) और भावना (Spirit) दोनों के अनुरूप सख्ती से पालन किया जाता है वे इस चिंता का पर्याप्त समाधान करते हैं।”
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