मध्य प्रदेश का उज्जैन इस समय बड़े स्तर पर शहरी विकास देख रहा है। नई सड़कें बन रही हैं, हाईवे आ रहे हैं, जमीन के उपयोग में बदलाव हो रहे हैं और रिहायशी परियोजनाओं की वजह से रियल एस्टेट के लिए उज्जैन एक मुफीद जगह साबित हो रहा है। अब इंडियन एक्सप्रेस को अपनी पड़ताल में पता चला है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव, उनके परिजन, भाई-बहन और चचेरे भाइयों ने इसी उज्जैन में बड़ी मात्रा में जमीन खरीदी है।

इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, 13 दिसंबर 2023 को मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनते ही उनके परिजन और उनकी रियल एस्टेट कंपनियों ने कम से कम 137 प्लॉट अपने नाम खरीदे। इनकी कुल जमीन करीब 168 एकड़ की है और इन पर लगभग 45 करोड़ रुपये खर्च किए गए। हालांकि कुछ प्लॉट बाद में बेच भी दिए गए। 2026 के सौदों का रिकॉर्ड अभी तक सरकारी दस्तावेजों में पूरी तरह अपडेट नहीं दिखाई देता है।

खतौनी रिकॉर्ड पर नजर डालें तो पता चलता है कि खरीदारी मुख्यमंत्री की पत्नी सीमा यादव, बेटे वैभव की पत्नी शालिनी यादव, भाइयों नंदलाल और नारायण यादव, नारायण की पत्नी रेखा यादव, उनके बेटे अभय यादव, चचेरे भाई गोविंद यादव और निलेश यादव ने की है। एक ट्रेंड यह भी बताता है कि कई सौदे परिजन की चार रियल एस्टेट कंपनियों के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल मुख्य रूप से दो सवाल उठाती है। पहला, खरीदी गई ज्यादातर जमीनें उन इलाकों में हैं जहां नई सड़कें और हाईवे बन रहे हैं। दूसरा, मुख्यमंत्री बनने से पहले भी मोहन यादव के परिजन के पास बड़ी मात्रा में जमीन थी, लेकिन मुख्यमंत्री बनते ही इस प्रक्रिया में अचानक तेजी देखने को मिली।

उज्जैन मास्टर प्लान 2035 मई 2023 में जारी हो गया था। उस समय मोहन यादव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं थे। लेकिन उज्जैन के साथ उनका राजनीतिक जुड़ाव काफी लंबा रहा है। 2004 से 2010 तक वह उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे। 2011 से 2013 तक मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम के प्रमुख रहे और 2013 से उज्जैन दक्षिण सीट से विधायक हैं।

जनवरी 2024 में मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद राज्य सरकार ने उज्जैन और उसके आसपास नई सड़क तथा हाईवे परियोजनाओं की घोषणा की। स्थानीय रियल एस्टेट कारोबारी बताते हैं कि इन परियोजनाओं से आसपास की जमीनों की कीमत बढ़ना पहले से तय था। इसी वजह से मुनाफा कमाने के लिए यहां निवेश को फायदेमंद माना गया।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, मुख्यमंत्री बनने से पहले भी यादव परिजन के पास कम से कम 108 प्लॉट और 179 एकड़ जमीन मौजूद थी। इनमें 85 एकड़ जमीन 2021 से 2023 के बीच खरीदी गई थी, जब मोहन यादव राज्य के शिक्षा मंत्री थे।

लेकिन 13 दिसंबर 2023 से दिसंबर 2025 के बीच मोहन यादव के परिजन ने 168 एकड़ से ज्यादा जमीन अपने नाम की। इसमें 12 एकड़ जमीन परिजन के भीतर ही ट्रांसफर की गई। 2025 में ही परिजन और उनकी कंपनियों ने 92 एकड़ में फैले 62 प्लॉट और खरीदे थे।

वर्तमान में मोहन यादव के पास सीधे तौर पर कम से कम 17 एकड़ जमीन है। उनके 2023 के शपथपत्र के मुताबिक, इसमें 4 एकड़ पैतृक संपत्ति और 13 एकड़ जमीन 1998 में खरीदी गई थी। उनकी पत्नी सीमा यादव के पास कम से कम 10.6 एकड़ जमीन मौजूद है, जिसे 2008 से 2010 के बीच खरीदा गया था।

इंडियन एक्सप्रेस को अपनी पड़ताल में पता चला है कि मोहन यादव और सीमा यादव की पारिवारिक कंपनी सिद्धि विनायक देवकॉन प्राइवेट लिमिटेड के जरिए भी 39.5 एकड़ जमीन खरीदी गई थी। इस कंपनी में मोहन और सीमा यादव की संयुक्त हिस्सेदारी 73 प्रतिशत बताई जाती है। इनमें से 12 एकड़ जमीन सितंबर 2024 में चचेरे भाई निलेश यादव को बेच दी गई थी। वहीं कंपनी ने 2024-25 के दौरान 2.6 एकड़ अतिरिक्त जमीन भी खरीदी थी।

इन खुलासों को लेकर इंडियन एक्सप्रेस ने स्थानीय अधिकारियों से बात की। बातचीत में पता चला कि मुख्यमंत्री बनने के बाद खरीदी गई 168 एकड़ जमीन में से करीब 111 एकड़ जमीन ऐसी परियोजनाओं के आसपास है, जिनकी घोषणा मोहन यादव सरकार ने ही की है।

उज्जैन के कलेक्टर रोशन सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “गरोठ, झालावाड़, नागदा, बदनावर, इंदौर और भोपाल से कनेक्टिविटी बेहतर बनाने के लिए आधा दर्जन से ज्यादा हाईवे परियोजनाएं चल रही हैं। इसके अलावा 15 से 20 सड़क चौड़ीकरण परियोजनाएं भी प्रस्तावित हैं।”

हालांकि रोशन सिंह ने इन परियोजनाओं के सटीक स्थान नहीं बताए।

वैसे प्रमुख खरीदारी वाले इलाकों की एक सूची इंडियन एक्सप्रेस ने तैयार की है। इसके मुताबिक, मोहन यादव और उनके परिजन ने गांगेड़ी में अप्रैल 2024 के बाद 38 प्लॉट में 51 एकड़ जमीन खरीदी है। इसी तरह कराड़िया-नवाखेड़ा क्षेत्र में अक्टूबर 2024 में करीब 9 एकड़ जमीन खरीदी गई। करोंदिया में जुलाई 2025 में करीब 8 एकड़ जमीन खरीदी गई। जयवंतपुरा में 2024-25 के दौरान 12 प्लॉटों में 6 एकड़ जमीन खरीदी गई। चंदेसरा में फरवरी 2025 में करीब 9 एकड़ जमीन खरीदी गई। वहीं उन्हेल में 16 प्लॉटों में 29 एकड़ जमीन खरीदी गई।

हैरानी की बात यह है कि उज्जैन मास्टर प्लान 2035 में जिन क्षेत्रों का उपयोग कृषि से बदलकर आवासीय या व्यावसायिक किया गया, वहां लगभग हर क्षेत्र में मोहन यादव परिजन की मौजूदगी देखने को मिलती है।

इंडियन एक्सप्रेस को अपनी पड़ताल में पता चला है कि जैसे ही उज्जैन मास्टर प्लान 2035 जारी हुआ, उससे कुछ हफ्ते पहले ही मोहन यादव के परिजनों ने मार्च-अप्रैल 2023 में सावराखेड़ी में करीब 30 एकड़ जमीन खरीद ली थी। वहीं मुख्यमंत्री बनने के बाद परिवार ने ऐसे इलाकों में कम से कम 37 एकड़ जमीन और खरीदी, जहां 2023 में लैंड यूज बदला गया था।

इसी तरह मध्य उज्जैन के पांड्याखेड़ी में भी परिजनों ने 18 एकड़ जमीन खरीदी। इस क्षेत्र को मास्टर प्लान में “कॉमर्शियल” घोषित किया जा चुका था।

पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता सज्जन सिंह वर्मा ने बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि मोहन यादव ने कथित तौर पर नगर निगम पर प्रभाव डालकर उन इलाकों को लैंड यूज परिवर्तन के लिए चुना, जहां पहले से ही उनके परिजनों के पास बड़ी मात्रा में जमीन मौजूद थी।

वैसे इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी जांच के निष्कर्षों के आधार पर मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके कार्यालय को कई सवाल भेजे थे, लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं आया।

नाम न बताने की शर्त पर राज्य सरकार के अधिकारियों ने इतना जरूर कहा कि मुख्यमंत्री के परिजनों के व्यापारिक सौदों को मुख्यमंत्री के पद से जोड़ना गलत है।

एक अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “मुख्यमंत्री का विस्तारित परिवार लंबे समय से रियल एस्टेट कारोबार में सक्रिय है। उनके कारोबार को मुख्यमंत्री की राजनीतिक उन्नति से जोड़ना उचित नहीं होगा।”

इस अधिकारी ने यह भी कहा, “जब आप परिवार की बात करते हैं, तो केवल पत्नी, बेटा और बहू को शामिल करना चाहिए। वहां आपको कोई बड़ी बात नहीं मिलेगी।”

एक अन्य अधिकारी ने कहा, “जो जमीनें खरीदी जाती हैं, वे हमेशा रखी नहीं जातीं। व्यापार के हिस्से के रूप में उन्हें बेचा भी जाता है।”

वहीं गोविंद यादव और निलेश यादव की ओर से गोविंद यादव के बेटे अनंत यादव ने कहा, “हमारा परिवार 2010 से रियल एस्टेट कारोबार में सक्रिय है। मेरे पिता ने तब 100 बीघा की परियोजना विकसित की थी। मेरे चाचा के कई हाउसिंग प्रोजेक्ट चल रहे हैं। निजी नागरिक होने के नाते हमें जमीन खरीदने, विकसित करने और बेचने का पूरा अधिकार है। क्या सिर्फ इसलिए कारोबार बंद कर दें क्योंकि मुख्यमंत्री हमारे परिवार से हैं?”

वहीं गांगेड़ी परियोजना पर अनंत यादव ने कहा, “मेरे पिता अकेले मालिक नहीं हैं। उनके 6-7 बिजनेस पार्टनर भी हैं। जमीन के सौदे 2020 से ही चल रहे हैं। उस समय मोहन यादव मंत्री भी नहीं थे। जिस हाईवे की बात हो रही है, उसे 2019 में मंजूरी मिल चुकी थी।”

वैसे इंडियन एक्सप्रेस को अपनी पड़ताल में यह भी पता चला कि मोहन यादव के परिजनों ने सिर्फ जमीन खरीदने का काम नहीं किया, बल्कि कुछ जगहों पर बिल्डरों के साथ विकास समझौते भी किए हैं।

अप्रैल 2024 से जुलाई 2025 के बीच गोविंद यादव और उनके सहयोगियों ने गांगेड़ी में 41 एकड़ जमीन खरीद ली थी। इसके कुछ महीनों बाद, जुलाई 2024 से सितंबर 2025 के बीच, यही जमीन पांच चरणों में इंदौर की कंपनी शांति महालोक बिल्डर्स को विकसित करने के लिए सौंप दी गई।

समझौते की शर्तों के मुताबिक, बिल्डर अपनी लागत पर परियोजना विकसित करेगा। विकसित संपत्ति का 67.8 प्रतिशत हिस्सा गोविंद यादव और उनके साझेदारों को मिलेगा।

दूसरे समझौते के तहत विकसित परियोजना का बंटवारा 60:40 के अनुपात में होना था। बड़ा हिस्सा जमीन मालिकों के पास ही रहना था।

इस बारे में इंडियन एक्सप्रेस ने जब बिल्डर से बात करने की कोशिश की तो सामने से कोई जवाब नहीं आया।

वैसे इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल में निलेश यादव को लेकर भी कई खुलासे हुए हैं। निलेश यादव ने “सांवरिया” ब्रांड के तहत कई रियल एस्टेट प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। अक्टूबर 2024 से नवंबर 2025 के बीच उन्होंने मध्य प्रदेश रेरा में चार नई हाउसिंग योजनाएं पंजीकृत कराई थीं।

ये चार योजनाएं इस प्रकार हैं:

अक्टूबर 2024 — सांवरिया धाम (कराड़िया)

दिसंबर 2024 — सांवरिया ड्रीम्स (चंदेसरा)

सितंबर 2025 — सांवरिया ग्रीन (ढेड़िया)

नवंबर 2025 — सांवरिया रेजिडेंसी (नानाखेड़ा)

जब इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में अनंत यादव से सवाल किया तो उन्होंने कहा, “हमारा परिवार 2010 से रियल एस्टेट कारोबार में सक्रिय है। मेरे चाचा के कई सांवरिया प्रोजेक्ट मौजूद हैं। निजी नागरिक होने के नाते हमें जमीन खरीदने और बेचने का पूरा अधिकार है। क्या सिर्फ इसलिए कारोबार बंद कर देना चाहिए क्योंकि मुख्यमंत्री हमारे परिवार से ताल्लुक रखते हैं?”

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि मुख्यमंत्री के परिजनों द्वारा उन इलाकों में बड़े पैमाने पर जमीन खरीदी गई, जहां बाद में सड़कें और विकास परियोजनाएं आईं।

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