55 साल की सुक्ला हाज़रा का नाम 2002 कि वोटर लिस्ट में है। आखिरी बार पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) 2022 में किया था। सुक्ला हाज़रा के पास दिसंबर 2028 तक वैलिड पासपोर्ट है। इसी तरह 56 साल की अमीरन बेगम अली और उनकी 35 वर्षीय बहू आरिफ़ा बेगम शेख और 29 वर्षीय शाहिदा खातून का नाम भी 2002 के वोटर लिस्ट में है। इसके अलावा 39 साल की सुबर्णा मंडल ने 2002 का वोटर लिस्ट जमा किया जिसमें उनके माता-पिता और दादा-दादी दोनों के नाम थे। बाद में उन्होंने बर्थ सर्टिफ़िकेट और क्लास 10 का एडमिट कार्ड भी जमा किया था।
लाखों लोग वोटर लिस्ट से बाहर
इतना करने के बावजूद फिर भी सुक्ला, अमीरन, आरिफ़ा, शाहिदा और सुबर्णा को पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है क्योंकि चुनाव आयोग ने उन्हें ऐसी एंट्री के तौर पर कैटेगरी में डाला है जिनमें ‘तार्किक विसंगति’ है। यह क्राइटेरिया पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं किया गया था। यह तब हो रहा जब इन सभी पांचों को 2002 के इलेक्टोरल रोल से जोड़ा जा सकता है, जो चुनाव आयोग की खुद तय की गई एक ज़रूरी शर्त है। जैसे-जैसे 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोटिंग के दिन पास आ रहे हैं, ये उन लाखों लोगों में से कुछ उदाहरण हैं जिन्हें राज्य की वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया निर्देश
बंगाल के लंबे चले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रोसेस पर अपने नए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि 27.10 लाख लोगों को एक आखिरी मौका दिया जाए। साथ ही चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया कि जिन लोगों के नाम ट्रिब्यूनल 21 अप्रैल (23 अप्रैल को वोटिंग वाली सीटों के लिए) और 27 अप्रैल (29 अप्रैल के फेज़ के लिए) तक क्लियर कर देते हैं, उनके साथ सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी की जाए।
चुनाव आयोग ने हटाए गए नामों की पहचान एक सेंट्रली कंट्रोल्ड एल्गोरिदम के आधार पर की थी। एल्गोरिदम ने कुल 1.36 करोड़ नामों को कम किया, जिनमें से 60.06 लाख को एडज्यूडिकेशन के तहत रखा गया और बाकी को नोटिस पीरियड में निपटा दिया गया। इन 60.06 लाख में से 27.10 लाख को एडज्यूडिकेशन के बाद हटा दिया गया।
इसकी खास बात वह है जिसे चुनाव आयोग ‘तार्किक विसंगति’ कहता है। कुछ पूर्व चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) और पूर्व चुनाव आयुक्त ने कहा कि यह अभूतपूर्व है। असल में चुनाव आयोग खुद इस पर चुप रहा है। जब चुनाव आयोग ने जून 2024 में बिहार से शुरू करते हुए पूरे देश के लिए SIR पर अपना पहला आदेश जारी किया और तीन महीने बाद अक्टूबर 2025 में अपना निर्देश दिया कि यह बंगाल सहित 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में आयोजित किया जाएगा, तो उसने क्राइटेरिया के तौर पर ‘तार्किक विसंगति’ का कोई ज़िक्र नहीं किया।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने लिखित जवाब में ही चुनाव आयोग ने कहा कि उसके इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स ने अलग-अलग तरह की ‘पहचानी गई गड़बड़ियों’ के वेरिफिकेशन के लिए नोटिस जारी किए थे। उसने इनके नाम ये बताए- मौजूदा रोल्स में किसी वोटर के नाम का पिछले इंटेंसिव रिवीजन (2002, बंगाल के मामले में) के बाद तैयार किए गए रोल्स से मेल न खाना, किसी वोटर और उसके माता-पिता के बीच उम्र का 15 साल से कम या 50 साल से ज़्यादा का अंतर या किसी वोटर और उसके दादा-दादी के बीच उम्र का 40 साल से कम का अंतर और छह या उससे ज़्यादा इलेक्टर्स को एक ही व्यक्ति की संतान के तौर पर मैप किया जाना।
एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस क्राइटेरिया पर हैरानी जताते हुए कहा कि इनका कोई आधार नहीं है। नाम न बताने की शर्त पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा, “SIR प्रोसेस में इसका कोई इंतज़ाम नहीं है। यह अतर्किक है। शुरू से ही आइडिया यह रहा है कि जितना हो सके सबको शामिल किया जाए।”
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने कहा, “ECI ने पहले भी एक डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर (वोटर लिस्ट चेक करने के लिए) इस्तेमाल किया है, लेकिन उसके ज़रिए पहचाने गए संदिग्ध डुप्लीकेट नामों को संबंधित ERO को फ़्लैग किया गया, वोटर को नोटिस दिया गया, सुनवाई हुई और अपील करने का समय दिया गया। प्रभावित व्यक्ति के लिए समय पर समाधान का सिस्टम था।”
लेकिन बंगाल के मामले में अशोक लवासा ने कहा, “जिन वोटरों के नाम हटाए गए, उन्हें चुनाव से पहले समय पर अपील करने का मौका नहीं दिया गया। यह यह वोटरों अधिकारों को गलत तरीके से छीनने जैसा है।”
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने कहा कि अगर गलत तरीके से पहचानी गई लॉजिकल कमियों की वजह से एक व्यक्ति भी छूट जाता है, तो यह बहुत गंभीर है। उन्होंने कहा, “यह SIR के पूरे आइडिया को खत्म कर देता है। हमें याद रखना चाहिए कि ECI का मोटो रहा है ‘कोई भी वोटर पीछे न छूटे’।”
बिहार में भी ऐसा ही हुआ था
वैसे बिहार में भी कुछ नाम ECI के सेंट्रली कंट्रोल्ड सॉफ्टवेयर ने फ्लैग किए थे, जिससे 9,968 वोटर्स के नाम बिना कोई वजह बताए डिलीट हो गए। ज़्यादातर नाम मौत, गैरहाज़िर होने या दूसरी जगहों पर शिफ्ट होने के थे। चुनाव आयोग ने खुद इन 9,968 डिलीट हुए नामों के बारे में कोई जानकारी या डेटा जारी नहीं किया। अब बंगाल के मामले में भी चुनाव आयोग चुप है।
इंडियन एक्सप्रेस ने ऐसे वोटर्स को ट्रैक किया जिनके पास वैध सरकारी डॉक्यूमेंट्स हैं, जो 2002 कि वोटर लिस्ट से जुड़े हैं, और फिर भी उनके नाम डिलीट हो गए हैं।
जब इन मामलों के बारे में पूछा गया, तो बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकरी मनोज अग्रवाल ने कोई कमेंट नहीं किया। ECI के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, “सभी एडज्यूडिकेशन केस ज्यूडिशियल ऑफिसर्स ने देखे थे। उनके फैसले के बारे में हमारा कोई कहना नहीं है। कुछ मामलों में जिन लोगों ने सुनवाई के दौरान दस्तावेज लिए, चाहे उन्होंने दस्तावेजों को ठीक से हैंडल किया हो या नहीं, उनकी जांच की जाएगी।”
ये सभी 10 मामले उन इलाकों के आवेदकों और उनके परिवार के सदस्यों के हैं, जहां 29 अप्रैल को बंगाल चुनाव के दूसरे चरण में वोटिंग होनी है। इसका मतलब है कि इन सभी के पास वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने के लिए 27 अप्रैल तक का समय है।

55 वर्षीय सुक्ला हाज़रा, बेहाला पश्चिम विधासनभा क्षेत्र
नोटिस में बताई गई तार्किक विसंगति: वोटर और माता-पिता की उम्र में 50 साल से ज़्यादा का अंतर
दस्तावेज: सुक्ला हाज़रा का कहना है कि SIR के दौरान, उन्होंने 2002 का इलेक्टोरल रोल जमा किया था जिसमें उनका नाम था और सुनवाई में अपने पासपोर्ट की एक कॉपी दी जो दिसंबर 2028 तक वैलिड है।
क्या हुआ होगा: हाज़रा का कहना है कि उन्होंने लगभग पांच साल पहले अपने वोटर ID को ठीक करवाने के लिए अप्लाई किया था, क्योंकि अगस्त 2007 में जारी उनके पुराने ID में उनका नाम शुक्ला लिखा था। लेकिन मार्च 2020 में उन्हें जो नया आईडी मिला, उसमें उनके नाम की स्पेलिंग सही थी, लेकिन उनकी जन्मतिथि गलत थी। इसमें 1970 के बजाय, इसमें 1 जनवरी, 1994 लिखा था।
वह हज़रा कहती हैं, “इसके साथ ही ज़ाहिर है कि मेरे पिता की उम्र मुझसे 50 साल ज़्यादा हो गई। यह उनकी गलती है, लेकिन मैं दर-दर भटक रही हूं। जब मुझे (इस मुद्दे के बारे में) नोटिस मिला, तो मैंने अपने पास मौजूद हर चीज जमा कर दी, नए और पुराने दोनों वोटर आईडी, सही जन्मतिथि वाला मेरा पासपोर्ट, फिर से 2002 की मतदाता सूची, मेरे पति का पीपीओ (रक्षा मंत्रालय के सेवानिवृत्त कर्मचारी के तौर पर पेंशन भुगतान आदेश), और यहां तक कि 1993 में मेरी शादी का निमंत्रण कार्ड भी। मैं 1994 में कैसे पैदा हो सकती थी जब मेरी शादी 1993 में हुई थी?”

36 वर्षीय मनुयारा बीबी, बिष्णुपुर विधासनभा क्षेत्र
नोटिस में बताई गई तार्किक विसंगति: किसी ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है जिसे छह दूसरे लोगों ने अभिभावक के तौर पर दर्शाया है।
दस्तावेज: मनुयारा का कहना है कि उन्होंने 2002 का इलेक्टोरल रोल जमा किया था जिसमें उसके माता-पिता दोनों के नाम थे।
क्या हुआ होगा: मनुयारा का कहना है कि उन्होंने SIR फॉर्म में अपने पिता की पूरी जानकारी, 2002 के इलेक्टोरल रोल में उनके सीरियल नंबर के साथ भरी थीं। लेकिन उन्हें एक हियरिंग के लिए पेश होने का नोटिस मिला, जहां उन्हें बताया गया कि 6 और लोगों ने उनके पिता को अपना अभिभावक बताया है। वह कहती है, “मैंने 2002 का इलेक्टोरल रोल फिर से जमा किया, साथ में अपना आधार कार्ड और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए राज्य सरकार की एक स्कीम के तहत उसे जारी किया गया एक आइडेंटिटी कार्ड भी दिया। मैंने सुनवाई में अपने माता-पिता और भाई-बहनों के दस्तावेजों के साथ 2002 का इलेक्टोरल रोल दिया। उन्होंने कुछ नहीं कहा, उन्होंने बस डॉक्यूमेंट्स ले लिए। मैं छह भाई-बहनों में से एक हूं तो क्या?”

39 वर्षीय हिदायतुल्ला एसके, कटवा विधानसभा क्षेत्र
नोटिस में तार्किक विसंगति बताई गई: माता-पिता का नाम छह दूसरे आवेदकों से भी मिल रहा।
दस्तावेज: हिदायतुल्ला का कहना है कि उन्होंने 2002 का इलेक्टोरल रोल अपनी मां के नाम के साथ जमा किया था।
क्या हुआ होगा: हिदायतुल्ला मुंबई में पेंटर का काम करते हैं। वह कहते हैं कि जब उन्हें पता चला कि उनका नाम SIR से हटा दिया गया है, तो वह घर आए। वह सात भाई-बहनों में से एक हैं, और कहते हैं कि उनके कुछ भाई-बहनों ने सबूत के तौर पर वही 2002 का इलेक्टोरल रोल जमा किया था और उनका नाम नहीं हटाया गया, जबकि उनका नाम हटा दिया गया था।
हिदायतुल्ला कहते हैं कि वह बहुत टेंशन में हैं। उन्होंने कहा, “मैं एक महीने से ज़्यादा समय से ठीक से सोया या खाया नहीं हूं। मेरी इनकम भी कम हो रही है। जब मेरे पास 2002 की लिस्ट, PAN कार्ड, आधार कार्ड, मेरे पिता का 1995 का वोटर ID और लगभग 100 साल पुराने ज़मीन के दस्तावेज हैं, तो मेरा नाम क्यों हटाया गया? मेरे परिवार के पांच लोगों के नाम वोटर लिस्ट में हैं। लेकिन इस बार उनका भी वोट देने का मन नहीं है।”

39 वर्षीय सुबर्णा मंडल, बेहाला पुरबा विधानसभा क्षेत्र
नोटिस में बताई गई तार्किक विसंगति: पता नहीं।
दस्तावेज: सुबर्णा का कहना है कि उन्होंने 2002 का इलेक्टोरल रोल जमा किया था जिसमें उनके माता-पिता और दादा-दादी दोनों के नाम थे। इसमें उनका बर्थ सर्टिफिकेट, उनका क्लास 10 का एडमिट कार्ड और मार्कशीट भी था।
क्या हुआ होगा: सुबर्णा का कहना है कि SIR के बाद उनका नाम फाइनल वोटर लिस्ट में था, लेकिन 7 अप्रैल को फैसले के बाद जब सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी हुई तो उनका नाम हटा दिया गया है। जब उन्हें सुनवाई के लिए नोटिस मिला, तो उन्होंने कहा कि अतिरिक्त दस्तावेज दिए थे।
सुबर्णा ने नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील फाइल की है। वह कोलकाता के पास जोका में उस इंस्टीट्यूट भी गईं, जहां सभी ट्रिब्यूनल बैठते हैं। लेकिन उन्हें अपने केस पर कोई अपडेट नहीं मिला है।
सुबर्णा कहती हैं, “मेरे माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची, सभी 2002 की लिस्ट में थे। मेरे पास अपना माध्यमिक एडमिट कार्ड और मार्कशीट है और मेरे पिता का CGHS (सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम) कार्ड भी है, जिस पर मेरे माता-पिता, मेरे भाई-बहन और मेरा नाम है।” इन सब के कारण वह अपने बेटे के लिए वोटर ID कार्ड के लिए अप्लाई नहीं कर पाईं, जो अभी 20 साल का हुआ है। सुबर्णा कहती हैं, “मैंने सोचा कि अगर मेरा नाम डिलीट हो गया, तो वह कैसे रजिस्टर कर पाएगा? मैं एक नागरिक हूं। मैं अपना टैक्स भरती हूं। अगर ज़रूरत पड़ी तो मैं हाई कोर्ट में केस करूंगी।”

43 वर्षीय असदुल शेख और 30 वर्षीय उनकी बहन जमीला, उलुबेरिया उत्तर (SC) विधानसभा क्षेत्र
नोटिस में बताई गई तार्किक विसंगति: एक पिता की छह से ज़्यादा संतान
दस्तावेज: असदुल और जमीला का कहना है कि उन्होंने अपने पिता के नाम के साथ 2002 का इलेक्टोरल रोल जमा किया था।
क्या हुआ होगा: असदुल कहते हैं कि वे 13 भाई-बहन हैं और सिर्फ़ उनके और जमीला के नाम हटाए गए हैं।
जमीला कहती हैं, “हम सभी को सुनवाई के लिए बुलाया गया था क्योंकि तार्किक विसंगति में छह से ज़्यादा मेरे पिता के बच्चे थे। मैं सुनवाई के लिए गई और असदुल को भी रिप्रेजेंट किया, क्योंकि वह गुजरात में था। मैंने 2002 के इलेक्टोरल रोल और मेरे पिता के डेथ सर्टिफ़िकेट समेत सभी डॉक्यूमेंट्स दिए। अब, जबकि मेरे सभी भाई-बहन वोटर हैं, हममें से दो के नाम हटा दिए गए हैं।
गुजरात में विग बनाने की इंडस्ट्री में काम करने वाले असदुल कहते हैं, “सिर्फ़ दो के नाम क्यों हटाए? मुझे काम पर वापस जाना है, मेरी कंपनी बार-बार कॉल कर रही है। मेरी नौकरी चली जाएगी।”
56 वर्षीय अमीरन बेगम अली, 35 वर्षीय बहू आरिफा बेगम शेख और 29 वर्षीय शाहिदा खातून, उलुबेरिया उत्तर (SC) विधानसभा क्षेत्र
नोटिस में बताई गई तार्किक विसंगति: तीनों के नाम मैच नहीं करते
दस्तावेज: अमीरन का कहना है कि उन्होंने 2002 का इलेक्टोरल रोल अपने नाम के साथ जमा किया था। आरिफा का कहना है कि उनके माता-पिता दोनों 2002 के वोटर रोल में हैं। शाहिदा ने अपना नाम अपने दादा से मैप कर लिया, जो 2002 के रोल में थे।
क्या हुआ होगा: उन तीनों के अलावा परिवार के बाकी लोगों के नाम वोटर लिस्ट में होने के कारण अमीरन (एक होममेकर हैं) को शक है कि नाम की स्पेलिंग में बदलाव की वजह से उनका नाम हटाया गया। उनके पुराने वोटर कार्ड में उनका नाम अमीरन बेगम अली लिखा था। कुछ साल पहले उन्हें एक नया वोटर कार्ड मिला जिसमें सिर्फ अमीरन बेगम लिखा था। लेकिन अमीरन पूछती हैं कि यह बात कैसे बदल जाती है कि वह 2002 की वोटर लिस्ट में थीं।
आरिफा कहती हैं कि उनके मामले में जो समस्या बताई गई थी, वह यह थी कि कुछ डॉक्यूमेंट्स में वह आरिफा बेगम शेख थीं और कुछ में आरिफा बेगम। आरिफा ने कहा कि हमें नहीं पता कि क्या करें।
शाहिदा ने कहा कि उनके माता-पिता माइग्रेंट वर्कर थे और उनके दादा (जिन्होंने उन्हें पाला-पोसा) अकेले हैं। दादा से ही उन्होंने 2002 की वोटर लिस्ट में मैप किया।

48 वर्षीय एसके फरीदुल, 41 वर्षीय उनके भाई एसके अलिफ और 34 वर्षीय एसके सरीफुल और फरीदुल का बेटा और पत्नी एसके आलम, उलुबेरिया उत्तर (SC) विधानसभा क्षेत्र
नोटिस में बताई गई तार्किक विसंगति: पता नहीं।
दस्तावेज: फरीदुल का कहना है कि उनके पिता ने 2002 से पहले भी वोट दिया था, लेकिन उन्हें उस समय के वोटर लिस्ट में अपना नाम नहीं मिला, इसलिए उन्होंने और उनके भाइयों ने अपने बड़े भाई एसके गुलज़ार से अपना लिंक मैप किया, जो 2002 के रोल में थे।
इसके साथ ही फरीदुल का कहना है कि उन्होंने अपना बिजली का बिल, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और आधार जमा किया। उनके बेटे आलम का कहना है कि उन्होंने अपना स्कूल-लीविंग सर्टिफिकेट, आधार, पैन और बर्थ सर्टिफिकेट दिया।
अलमारा का कहना है कि उनके माता-पिता दोनों का नाम 2002 के SIR में था और उन्होंने वह जमा किया। अलमारा ने कहा कि इसके साथ ही मैंने अपना स्कूल सर्टिफिकेट, फैमिली ट्री पेपर्स, पैन और आधार जमा किया।
अलिफ का दावा है कि उनके पास गुलज़ार से लिंक दिखाने वाले दस्तावेज थे, लेकिन अधिकारियों ने सिर्फ मेरा आधार लिया।
सरीफुल का कहना है कि उन्होंने अपना नाम गुलज़ार से मैप किया, साथ ही अपना आधार, पैन भी दिया।
क्या हुआ होगा: परिवार वालों का कहना है कि उन्हें कोई आइडिया नहीं है। अलमारा ने कहा, “मज़ेदार बात यह है कि मेरे सभी भाई-बहनों और मैंने 2002 के SIR को एक ही लिंक दिया था। मुझे छोड़कर बाकी छह वोटर लिस्ट में शामिल हैं।”
67 वर्षीय मोहम्मद मोसियर रहमान, सोनारपुर उत्तर चुनाव विधानसभा क्षेत्र
नोटिस में बताई गई तार्किक विसंगति: मोहम्मद मोसियर रहमान और उनके पिता का नाम मैच नहीं करता।
दस्तावेज: मोहम्मद मोसियर रहमान का कहना है कि उनका नाम 2002 के रोल में है और उनके पास वैलिड पासपोर्ट है, जिसकी डिटेल्स उन्होंने जमा की हैं।
क्या हुआ होगा: फिजिक्स के रिटायर्ड प्रोफेसर और पूर्व स्कूल टीचर रहमान ने कहा, “मुझे सुनवाई के लिए बुलाया गया था क्योंकि 2002 की वोटर लिस्ट में मेरा नाम मोहम्मद मोसियर रहमान गायेन, मोहम्मद इशाक गायेन के बेटे था, लेकिन मैंने 2025 में तैयार वोटर लिस्ट में अपना नाम बदलकर मोहम्मद मोसियर रहमान कर लिया था, जो मेरे पासपोर्ट और दूसरे डॉक्यूमेंट्स में नाम के हिसाब से था।” उन्होंने आगे कहा कि वह सुनवाई के लिए आधार, अपने सरकारी पेंशन ऑर्डर, पासपोर्ट और हायर सेकेंडरी सर्टिफिकेट जैसे डॉक्यूमेंट्स के साथ गए थे। AERO (असिस्टेंट इलेक्टोरल रोल ऑफिसर) ने मुझे भरोसा दिलाया कि मेरा पेंशन ऑर्डर इलेक्टोरल रोल में मेरा नाम बनाए रखने के लिए काफी है। बाद में मैंने देखा कि मेरा नाम एडज्यूडिकेशन के लिए भेजा गया था और फिर हटा दिया गया।”
रहमान ने ट्रिब्यूनल में ऑनलाइन अपील की है और फिजिकली भी दस्तावेज जमा किए हैं। वह कहते हैं, “अब मैं क्या कर सकता हूं?”

63 वर्षीय सजेदा बीबी, सोनारपुर उत्तर विधानसभा क्षेत्र
नोटिस में बताई गई तार्किक विसंगति: नाम मिसमैच है
दस्तावेज: सजेदा ने 2002 का इलेक्टोरल रोल और 2025 की वोटर लिस्ट अपने नाम के साथ जमा की। उनके पास पासपोर्ट भी है जिससे वह हज के लिए सऊदी अरब गई थीं।
क्या हुआ होगा: उनके भतीजे सैफुल जमादार कहते हैं, “मेरी चाची को सुनवाई के लिए बुलाया गया था क्योंकि 2002 के इलेक्टोरल रोल में उनका नाम सजेदा जमादार के तौर पर लिखा था, लेकिन बाद में उनके बाकी सभी डॉक्यूमेंट्स में इसे ठीक करके सजेदा बीबी कर दिया गया।”
सैफुल कहते हैं कि सजेदा के पति के पेंशन ऑर्डर में भी, उनका नाम नॉमिनी के तौर पर सजेदा बीबी लिखा है। उन्होंने कहा, “उन्होंने सजेदा जमादार से सजेदा बीबी में ऑफिशियली नाम बदलने का एफिडेविट भी जमा किया। सुनवाई के दौरान हमें और क्या जानकारी देनी चाहिए थी? हमने ट्रिब्यूनल में अपील की है।”
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