लोकसभा में सोमवार को विपक्ष के नेता राहुल गांधी के बयान पर रक्षामंत्री और गृह मंत्री ने कड़ी आपत्ति जताई, जिसके बाद सदन में हंगामा मच गया। राहुल गांधी ने अपने बयान में पूर्व सेना प्रमुख रिटायर जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित किताब का जिक्र किया।

जिस पर राजनाथ सिंह, अमित शाह और किरेन रिजिजू समेत कई नेताओं ने राहुल गांधी के बयान पर आपत्ति जताई और कहा कि सदन में किसी भी अप्रकाशित किताब या न्यूजपेपर या पत्रिका के अंश के हवाले से कुछ दावा नहीं किया सकता।

नरवणे की किताब क्यों नहीं पब्लिश हो पा रही?

जिस किताब को लेकर इतना हंगामा मचा हुआ है, वह पिछले दो साल से रक्षा मंत्रालय से अनुमति के लिए रुकी हुई है। ऐसे में यह जानना बेहद अहम है कि आखिर यह किताब क्यों नहीं पब्लिश हो पा रही है, और रक्षा अधिकारियों के किताब लिखने पर कौन से नियम है?

क्या है नरवणे की किताब का नाम?

पूर्व सेनाध्यक्ष एमएम नरवणे ने सेवानिवृत्त होने के बाद अपनी एक किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ लिखी, जिसे पेंगुइन पब्लिशर को पब्लिश करना था। यह किताब जनवरी 2024 में आनी थी, दिसंबर 2023 में न्यूज एजेंसी पीटीआई ने इसके कुछ अंश पब्लिश किए, जिसके बाद सेना ने किताब की समीक्षा शुरू की।

इस किताब में साल 2020 में पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना और चीनी सैनिकों के बीच झड़प और 2023 में अग्निवीर स्कीम के तहत भर्ती के नियमों पर भी चर्चा की गई है।

क्यों की जा रही किताब की समीक्षा?

भारतीय सेना, 1954 की धारा 21 के तहत सेवारत कर्मियों को किसी भी रूप में राजनीतिक प्रश्न या सेवा विषय से संबंधित किसी भी मामले को पब्लिश या अप्रत्यक्ष रूप से संप्रेषित करने या उसमें कोई सेवा संबंधी जानकारी शामिल करने की अनुमति नहीं हैं।

इसके अलावा, केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना ऐसे सवाल या विषय पर या ऐसी जानकारी युक्त कोई किताब, पत्र, लेख या अन्य दस्तावेज पब्लिश करना या प्रकाशित करवाने पर पूरी तरह रोक है।

सेवारत अधिकारी पूर्व अनुमति के बिना राजनीतिक प्रश्न से संबंधित मामले पर या सेवा विषय पर या किसी सेवा विशेष पर कोई जानकारी या विचार रखने वाले विषय किसी भी तरह लेक्चर (व्याख्यान) नहीं दे सकते।

नियमों में साफ कहा गया है कि “सेवा सूचना और सेवा विषय में देश की सेनाओं, रक्षा या बाहरी संबंधों से संबंधित सूचना या विषय शामिल हैं”।

अधिकारियों ने कहा कि यह नियम तब लागू नहीं हो सकता है जब सशस्त्र बलों का कोई कर्मचारी ऐसी किताब लिखता है जो उसके काम से संबंधित नहीं है, या साहित्यिक या कलात्मक प्रकृति की है।

क्या ये नियम जनरल नरवणे जैसे रिटायर अधिकारी पर भी लागू होते हैं?

नियमों में स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया है कि रिटायर रक्षा सेवा अधिकारियों को किताब प्रकाशित करते समय किस प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

कुछ अधिकारियों ने इससे पहले इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि सुरक्षा बलों द्वारा पब्लिश की जाने वाली किताबों की समीक्षा प्रक्रिया केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 से संदर्भ ले सकती है, जिसे डीओपीटी द्वारा जून 2021 में संशोधित किया गया था।

हालांकि सशस्त्र बल इन नियमों के दायरे में नहीं आते हैं।

संशोधित नियमों के मुताबिक, खुफिया या सुरक्षा संबंधी संगठनों में सेवा दे चुके रिटायर सरकारी कर्मियों को संगठन के बिना अनुमति से संबंधित कोई भी जानकारी पब्लिश करने से रोक दिया गया।

अधिकारियों ने बताया कि इस कैटेगरी में न आने वाले रिटायर सरकारी कर्मचारी को किताब पब्लिश करने के लिए सरकार की मंजूरी की जरूरत नहीं होती।

क्या इससे पहले किसी पूर्व सेना प्रमुख ने किताब लिखी हैं?

जी बिल्कुल, इससे पहले कई सेवारत और रिटायर सैन्य अधिकारियों ने विभिन्न सैन्य-संबंधी विषयों पर किताबें लिखी हैं। पूर्व सेना प्रमुख रिटायर जनरल वीपी मलिक ने कारगिल: फ्रॉम सरप्राइट टू विक्ट्री और रिटायर जनरल वीके सिंह ने करेज एंड कंविक्शन: एन ऑटोबायोग्राफी लिखी है। आगे पढ़िए जनसत्ता विशेष: राहुल गांधी एम.एम. नरवणे की किस किताब का जिक्र कर रहे थे? न छपने पर पूर्व सेनाध्यक्ष ने कही थी ये बात