जब भी जलवायु परिवर्तन की चर्चा होती है तो सबसे पहले दिमाग में तपती दोपहरें, लू और दिन में रिकॉर्ड तोड़ रहा तापमान आता है। लेकिन भारत की गेहूं की फसल के सामने खड़ा नया संकट दिन की गर्मी नहीं बल्कि रातों की बढ़ती गर्मी है। एक नई रिपोर्ट बताती है कि भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में न्यूनतम तापमान यानी रात का तापमान, दिन के तापमान की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। इसका असर सीधे गेहूं की पैदावार, गुणवत्ता और किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है और ग्लोबल प्रोडक्शन में लगभग 14 प्रतिशत हिस्सेदारी है। हर साल देश में करीब 107.59 मिलियन मीट्रिक टन गेहूं का उत्पादन होता है। ऐसे में गेहूं पर बढ़ता जलवायु दबाव केवल किसानों की समस्या नहीं बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा का भी सवाल है।
आखिर रात की गर्मी इतनी खतरनाक क्यों है?
दिन में पौधे प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) के जरिए भोजन बनाते हैं। रात के समय यही ऊर्जा पौधों की वृद्धि और दानों के विकास में खर्च होती है। लेकिन जब रात का तापमान सामान्य से ज्यादा होता है तो पौधों की श्वसन प्रक्रिया तेज हो जाती है।
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इसका मतलब है कि पौधा ज्यादा ऊर्जा खर्च करने लगता है और दानों में भरने के लिए कम ऊर्जा बचती है। रिपोर्ट से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि इसका नतीजा यह होता है कि दाने सिकुड़ जाते हैं, उनका वजन कम हो जाता है और पैदावार प्रभावित होती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में न्यूनतम तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बाल्यान कहती हैं, “यह सिर्फ गर्म मौसम नहीं, मौसम के स्वभाव में बदलाव है। भारत के गेहूं उत्पादन के सामने सबसे कम पहचाना गया और चिंताजनक खतरा रात के तापमान में लगातार वृद्धि है। हमारा विश्लेषण बताता है कि प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में न्यूनतम तापमान, अधिकतम तापमान की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है।”
वह आगे कहती हैं, “गर्म रातें पौधों की श्वसन प्रक्रिया को बढ़ा देती हैं। इससे पौधे अपने कार्बोहाइड्रेट भंडार को दानों में बदलने के बजाय ऊर्जा खर्च करने लगते हैं। फरवरी और मार्च में अचानक बढ़ती गर्मी दानों के भरने की अवधि को छोटा कर देती है। इसका परिणाम सिकुड़े हुए दाने, कम गुणवत्ता और घटती पैदावार के रूप में सामने आता है। हम सिर्फ गर्म मौसम नहीं बल्कि उन मौसमी पैटर्न के धीरे-धीरे बदलने के गवाह हैं जिन्होंने भारत की गेहूं प्रणाली को दशकों तक उत्पादक बनाए रखा।”
पंजाब और हरियाणा सबसे ज्यादा चिंता
हरित क्रांति के बाद पंजाब और हरियाणा देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ बनकर उभरे। लेकिन अब यही वो इलाके हैं जो अब सबसे तेजी से गर्म हो रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 2011 से 2025 के बीच गेहूं सीजन के दौरान हरियाणा में तापमान बढ़ने की दर 0.56 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक रही जबकि पंजाब में यह 0.53 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक दर्ज की गई।
दूसरी ओर मध्य प्रदेश में यह दर 0.24 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक रही। चिंता की बात यह है कि पंजाब और हरियाणा में केवल दिन का तापमान ही नहीं बल्कि न्यूनतम तापमान में भी सबसे अधिक बढ़ोतरी हुई है। अगर यही रुझान जारी रहा तो देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक क्षेत्रों की उत्पादकता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
| क्षेत्र (State/Region) | 2011-2025 (गेहूं सीजन) तापमान वृद्धि दर (°C प्रति दशक) |
| हरियाणा (Haryana) | 0.56 °C / दशक |
| पंजाब (Punjab) | 0.53 °C / दशक |
| मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) | 0.24 °C / दशक |
फरवरी सबसे खतरनाक महीना
रिपोर्ट के मुताबिक, गेहूं उगाने के मौसम में फरवरी सबसे तेजी से गर्म होने वाला महीना बनकर उभरा है। फरवरी में तापमान बढ़ने की दर 0.69 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक रही। इसके बाद अप्रैल (0.66 डिग्री) और मार्च (0.58 डिग्री) का स्थान है।
यह वही समय होता है जब गेहूं की फसल में फूल आते हैं और दाने भरते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस चरण में हल्की सी अतिरिक्त गर्मी भी फसल की गुणवत्ता और उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। इसी वजह से कई वैज्ञानिक भारतीय गेहूं खेती को अब ‘टेम्परेचर गैम्बल’ यानी तापमान का जुआ कहने लगे हैं।

किसान क्या महसूस कर रहे हैं?
रिपोर्ट में गुजरात के एक सीमांत किसान राम सिंह का बयान इस संकट की साफ तस्वीर पेश करता है। राम सिंह बताते हैं, “पहले की तुलना में गेहूं की खेती बहुत कठिन हो गई है। सर्दियां अब उतनी ठंडी नहीं रहीं। अक्टूबर की गर्मी में बीज ठीक से अंकुरित नहीं होते। फिर फरवरी या मार्च की अचानक गर्मी दानों को समय से पहले सुखा देती है जिससे पैदावार और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।”
वह आगे कहते हैं, “इसके अलावा कटाई के समय अचानक होने वाली बारिश खेत में खड़ी पूरी फसल को बर्बाद कर देती है। कीटों का हमला बढ़ गया है। फसल को स्टोर करना मुश्किल हो गया है। पहले गेहूं को सालों तक सुरक्षित रखा जा सकता था, अब कुछ महीनों में खराब हो जाता है। बढ़ती लागत और अनिश्चितता के बीच खेती लगातार जोखिम भरा काम बनती जा रही है।”
राम सिंह बताते हैं कि उनके गांव के कुछ परिवार खेती छोड़कर दूसरे रोजगार की तलाश में निकल चुके हैं। सिर्फ गर्मी नहीं, गलत समय की बारिश भी संकट है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि बारिश का पैटर्न बदल रहा है।
पहले सर्दियों के महीनों में होने वाली बारिश अब कटाई के समय मार्च से मई के बीच अधिक देखने को मिल रही है। इस बदलाव के पीछे पश्चिमी विक्षोभों के देर से आने और अधिक तेज होने को एक प्रमुख वजह माना गया है।
इसका असर कई रूपों में दिखता है:
-खड़ी फसल को नुकसान
-दानों का रंग बदलना
-फंगल संक्रमण
-नमी बढ़ने से भंडारण क्षमता में कमी
-कटाई के बाद होने वाले नुकसान में वृद्धि
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार ढाका कहते हैं, “हम पिछले कुछ दशकों में जलवायु पैटर्न में स्पष्ट बदलाव देख रहे हैं। सर्दियां छोटी और गर्म होती जा रही हैं जबकि कटाई के समय बेमौसम बारिश बढ़ रही है। गर्म सर्दियां, गलत समय पर बारिश और बढ़ती नमी मिलकर गेहूं की गुणवत्ता और किसानों की आय को प्रभावित कर रही हैं।”
क्या यह सिर्फ जलवायु संकट है?
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल मौसम की नहीं है। खेती विरासत मिशन के कार्यकारी निदेशक उमेंद्र दत्त कहते हैं, “पंजाब और हरियाणा में गेहूं पर जलवायु परिवर्तन का असर अब अनुमान नहीं बल्कि जमीन पर दिखने वाली हकीकत है। लेकिन यह सिर्फ जलवायु संकट नहीं बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य और पारिस्थितिक असंतुलन का भी संकट है।”
उनके मुताबिक, दशकों से चली आ रही रसायन आधारित खेती ने मिट्टी की प्राकृतिक क्षमता को कमजोर किया है। उनका कहना है कि हमें उत्पादन-केंद्रित मॉडल से निकलकर मिट्टी-केंद्रित और जलवायु अनुकूल खेती की ओर बढ़ना होगा।”
समस्या का समाधान क्या हैं?
रिपोर्ट केवल संकट की तस्वीर नहीं दिखाती बल्कि समाधान भी सुझाती है।
कम समय में तैयार होने वाली फसल
गुजरात के किसान अब ऐसी गेहूं की किस्में अपना रहे हैं जो कम समय में तैयार हो जाती हैं और ज्यादा गर्मी का असर भी बेहतर तरीके से सहन कर लेती हैं। इनमें GW-499, GW-11 और भालिया-13 जैसी किस्में शामिल हैं। इनका इस्तेमाल बढ़ते तापमान के बीच फसल को बचाने और पैदावार बनाए रखने के लिए किया जा रहा है।
बुवाई के समय में बदलाव
अक्टूबर की गर्मी से बचने के लिए बुवाई कैलेंडर बदले जा रहे हैं।
मौसम आधारित सलाह
भारतीय मौसम विभाग स्थानीय भाषाओं में मौसम संबंधी चेतावनियां जारी करता है जिससे किसान सिंचाई और कटाई के फैसले बेहतर ढंग से ले सकें।
मल्चिंग तकनीक
पंजाब में धान के अवशेषों का इस्तेमाल कर मल्चिंग की जा रही है जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है और गर्मी का असर कम होता है।
पैरामीट्रिक बीमा
बहुत ज्यादा गर्मी या असामान्य बारिश जैसी परिस्थितियों में किसानों को स्वतः मुआवजा देने वाली बीमा योजनाएं जोखिम कम कर सकती हैं।
आखिर इसका मतलब क्या है?
भारत की खाद्य सुरक्षा लंबे समय से गेहूं पर आधारित रही है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली से लेकर खुले बाजार तक करोड़ों लोगों की थाली में गेहूं अहम भूमिका निभाता है।
अगर पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य जलवायु दबाव की वजह से कमजोर पड़ते हैं तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। सरकारी खरीद, खाद्य भंडारण, कीमतों और आम उपभोक्ताओं तक इसकी गूंज सुनाई दे सकती है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला कहती हैं, “जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं है। यह पहले से हमारे खाद्य तंत्र और ग्रामीण आजीविका को बदल रहा है। केवल छोटे-मोटे उपाय काफी नहीं होंगे। जलवायु अनुकूल कृषि, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और वित्तीय सुरक्षा जैसे उपायों के जरिए लॉन्गटर्म फ्लेक्सिबिलिटी विकसित करनी होगी।”
भारत की गेहूं की लड़ाई अब सिर्फ दिन की तपिश से नहीं है। असली चुनौती उन गर्म होती रातों से है जो चुपचाप खेतों में खड़ी फसल की ताकत को कमजोर कर रही हैं। अगर इस अदृश्य संकट को अभी नहीं समझा गया तो आने वाले सालों में इसका असर देश की थाली तक पहुंच सकता है।
