दिल्ली सरकार ने सोमवार को नई इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) पॉलिसी का ऐलान कर दिया। इस नीति में दो बातों पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है। पहली, दोपहिया, तिपहिया और हल्के मालवाहक वाहनों को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक बनाया जाएगा। दूसरी, सरकार ने स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड वाहनों की बजाय पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता दी है।

इस नीति के तहत 31 मार्च, 2030 तक दिल्ली के कुल वाहन बेड़े में कम से कम 30 फीसदी इलेक्ट्रिक वाहन शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है। जानकारी के लिए बता दें कि दिल्ली में वायु प्रदूषण के सबसे बड़े कारणों में परिवहन क्षेत्र भी शामिल है। सर्दियों में प्रदूषण बड़ा मुद्दा जरूर बनता है, लेकिन पूरे साल वाहनों से निकलने वाला धुआं हवा को खराब करता रहता है। इसलिए प्रदूषण कम करने की रणनीति के तहत जीरो-एमिशन वाहनों पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। जारी बयान में दिल्ली सरकार ने कहा है कि इस नीति के तहत पूरी तरह इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता दी जाएगी, क्योंकि शून्य उत्सर्जन वाले वाहन होने के कारण ये पर्यावरण के लिए सबसे ज्यादा लाभदायक साबित होते हैं।

दिल्ली सरकार ने कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) की ताजा रिपोर्ट ‘Identification of the Causes for Worsening AQI in Delhi-NCR’ का भी हवाला दिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, सर्दियों में राजधानी दिल्ली के PM2.5 प्रदूषण का करीब 23 फीसदी हिस्सा वाहनों से होने वाले उत्सर्जन की वजह से होता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दिल्ली के कुल वाहनों में करीब 67 फीसदी हिस्सेदारी दोपहिया वाहनों की है। ऐसे में प्रदूषण कम करने के लिए इन्हें तेजी से इलेक्ट्रिक बनाना जरूरी है।

वहीं, 2021 में गैर-लाभकारी संस्था TERI की एक ड्राफ्ट रिपोर्ट में भी कहा गया था कि प्रदूषण के मौसम में दिल्ली में PM2.5 प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत वाहन हैं। TERI की रिपोर्ट के मुताबिक, परिवहन क्षेत्र में दोपहिया वाहन PM2.5, PM10, सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड के सबसे बड़े स्रोत हैं। वहीं, तिपहिया वाहन वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करते हैं।

इससे पहले IIT कानपुर की स्टडी में भी सामने आया था कि दिल्ली में वाहनों से होने वाले PM2.5 और PM10 प्रदूषण का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेले दोपहिया वाहनों से आता है। वहीं, 2018 में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के SAFAR कार्यक्रम के तहत भी परिवहन क्षेत्र को सबसे बड़ा प्रदूषण स्रोत बताया गया था।

2025 में दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (DTU) के शोधकर्ताओं ने राजधानी के 575 पेट्रोल से चलने वाले दोपहिया वाहनों का अध्ययन किया था। इन वाहनों की जांच पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल (PUC) केंद्रों पर की गई थी। अध्ययन में पाया गया कि वाहन की उम्र के साथ-साथ उसका माइलेज भी कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन को काफी प्रभावित करता है। शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया था कि भारत की व्हीकल स्क्रैपेज पॉलिसी में सिर्फ उम्र ही नहीं, बल्कि माइलेज को भी आधार बनाया जाना चाहिए।

CAQM ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया कि वाहनों से होने वाला प्रदूषण सिर्फ एग्जॉस्ट पाइप से निकलने वाले धुएं तक सीमित नहीं है। वाहनों से निकलने वाला नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और अन्य गैसें भी प्रदूषण बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। इसलिए वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने से न सिर्फ सीधे निकलने वाले प्रदूषक कम होंगे, बल्कि उन गैसों में भी कमी आएगी जो बाद में हवा में रासायनिक प्रक्रिया के जरिए नए प्रदूषक कण बनाती हैं। आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में हर तीन में से दो वाहन दोपहिया हैं। ऐसे में अगर इन्हें बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक बनाया जाता है तो प्रदूषण में बड़ी कमी आ सकती है।

वर्तमान में राजधानी दिल्ली में दोपहिया वाहनों के कुल पंजीकरण में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी केवल 7.5 फीसदी है। 2025 में कुल 4,92,288 दोपहिया वाहनों का पंजीकरण हुआ, जिनमें 36,962 इलेक्ट्रिक थे। वहीं, 2024 में 4,15,336 पंजीकरण में केवल 31,094 इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन शामिल थे। ऐसे में दिल्ली सरकार का कहना है कि दो साल से भी कम समय में इसे 100 फीसदी तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

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