नेटफ्लिक्स सीरीज ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायु सेना के हवाई अभियानों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियों को लेकर लोगों में रुचि जगा दी है। कारगिल युद्ध आधिकारिक तौर पर 26 जुलाई, 1999 को समाप्त हुआ था। इस दौरान भारतीय क्षेत्र में नियंत्रण रेखा (LoC) के पार स्थित चौकियों से पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों को खदेड़ दिया गया था।

ऑपरेशन सफेद सागर में भारतीय वायु सेना के कई स्क्वाड्रन शामिल थे। इनमें नंबर 17 ‘गोल्डन एरोज’ भी शामिल था। इन ऑपरेशन के दौरान वायुसेना ने कई अनोखे और नए तरीकों से हवाई अभियान चलाए। इनमें कारगिल की बर्फ से ढकी ऊंची और दुर्गम चोटियों पर रात में बमबारी मिशन पर शामिल थे।

भारतीय वायु सेना के पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ (सेवानिवृत्त) उस वक्त मिग-21 के 17वें स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर थे। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से इन ऑपरेशन से जुड़े मुद्दों पर बात और महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं। उन्होंने बताया कि बमबारी अभियानों के दौरान उनके स्क्वाड्रन ने पाकिस्तानी रडार से बच निकलने के लिए किस तरह रणनीति अपनाई। उन्होंने उस समय सामने आई GPS की एक तकनीकी गड़बड़ी के बारे में भी बताया, जिसका सामना वायुसेना के पायलटों को अभियान के दौरान करना पड़ा।

पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ ने बताया कि रात में चांदनी में पहाड़ चमक उठते थे। लेकिन इसमें जोखिम भी था। अगर अचानक बादल चांद को ढक लेते तो पूरा इलाका अंधेरे में डूब जता था। ऐसे हालात में मिशन को तुंरत रद्द करना पड़ता सकता था और विमान को आफ्टरबर्नर या रीहीट की मदद से घाटी से बाहर निकालना पड़ता था। रात की उड़ानों में मैं लीड करता था, इसलिए यह फैसला लेने की जिम्मेदारी भी मेरी होती थी

पाकिस्तानियों ने नियंत्रण रेखा के अपने हिस्से में एक पहाड़ी की चोटी पर रडार लगाया था। भारतीय वायुसेना के इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT) विमान ने इस रडार की सटीक लोकेशन पता लगा लिया था। उन दिनों आज की तरह जीआईएस सॉफ्टवेयर उपलब्ध नहीं था। इसलिए वेस्टर्न एयर कमांड ने हमें एक खास नक्शा दिया था, जिसमें रडार की पकड़ यानी उसकी 3D कवरेज को हर 5 डिग्री के अंतर पर चिन्हित किया गया था।

बीएस धनोआ ने बताया कि इसलिए, दुश्मन के रडार की पकड़ में आने से पहले, हम घाटी में प्रवेश करते थे और शिखर रेखा (यानी पर्वत श्रृंखला का सबसे ऊंचा निरंतर किनारा, जहां दोनों ओर भूभाग नीचे की ओर ढलान वाला होता है) के नीचे उड़ान भरते थे, और हथियार छोड़ने से पहले लक्ष्य स्तर से 1 किमी या लगभग 3,000 फीट ऊपर तक नीचे उतरते थे।

उन्होंने बताया कि हम उनके कंधे से दागी जाने वाली सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों (SAM) की घातक मारक सीमा के दायरे में उड़ रहे थे। पहली रात के हमले के मिशन में उन्होंने हमारी तरफ एक लो लेवल SAM दागी, लेकिन वह बेअसर होकर गिर गई। संभवतः मिसाइल को विमान की आवाज सुनकर हमारी सामान्य दिशा में दाग दिया गया था और उस पर हमारे विमान का सही लॉक नहीं था।

रात में कम ऊंचाई पर किए जाने वाले हमले जोखिम भरे थे, लेकिन इसके परिणाम बेहतर होते थे। क्योंकि उसकी मुख्य वजह थी कि बम गिराते वक्त हम लक्ष्य के काफी करीब होते थे। चांदनी में हम अपने विमान के पंख को थोड़ा झुकाकर बम के लक्ष्य पर गिरने के स्थान को देख तक सकते थे।

अजय आहूजा के साथ क्या हुआ?

सिर्फ लक्ष्य के ऊपर से एक बार गुजरने से विमान आम तौर पर कंधे से दागी जाने वाली मिसाइल (Shoulder-fired SAM) की चपेट में नहीं आता। 21 मई को किए गए उनके रेकी मिशन में भी वे लक्ष्य के ऊपर से केवल एक बार गुजरे थे और इससे वे मिसाइल के लिए आसानी से vulnerable नहीं हुए थे।

लेकिन अजय आहूजा की स्थिति अलग थी। वे उस समय Battle Damage Assessment (BDA) मिशन पर थे। उनका काम यह देखना था कि हमले के बाद लक्ष्य को कितना नुकसान हुआ है। इसी दौरान MiG-27 फॉर्मेशन के लीडर ने आहूजा से संपर्क किया और उन्हें उस इलाके में जाने को कहा, जहां ग्रुप कैप्टन (तब फ्लाइट लेफ्टिनेंट) के. नचिकेता को तलाशना था। नचिकेता का विमान Batalik सेक्टर में हमला करने के दौरान इंजन फ्लेम-आउट के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और वे विमान से बाहर निकल चुके थे।

अहुजा उस क्षेत्र के ऊपर चक्कर लगा रहे थे जहां दूसरे मिग-27 का मलबा पड़ा था। इसे आसानी से पहचाना जा सकता था, क्योंकि यह सफेद बर्फ पर एक काले धब्बे जैसा दिख रहा होगा। मलबे वाले क्षेत्र के चारों ओर चक्कर लगाते हुए वह लगातार एक अन्य हेलीकॉप्टर पायलट के संपर्क में थे, जिसने बचाव अभियान के लिए अपना मार्ग बदल लिया था।

लगातार घटनास्थल के ऊपर चक्कर लगाते रहने और दुर्घटनास्थल से संपर्क बनाए रखने की उनकी बेचैनी के कारण शायद उनका विमान धीरे-धीरे नीचे आ गया। जिससे वे स्टिंगर मिसाइल की मारक सीमा में आ गए और उन्हें निशाना बना लिया गया। लेकिन मिसाइल लगने के बाद उन्होंने सही तरीके से कदम उठाया। ऐसी परिस्थितियों के लिए तय किए गए नियम के अनुसार, वे विमान को ग्लाइड करते हुए धीरे-धीरे नीचे लाए और सिंधु नदी में उतार दिया और इजेक्ट करने से पहले अपने निर्देशांक भी प्रसारित किए। लेकिन इसके बाद फिर पाकिस्तानी सैनिकों सशस्त्र स्थानीय लड़ाकों ने उन्हें घेर लिया और पकड़ लिया। उनकी मृत्यु छोटे हथियारों से लगी चोट के कारण हुई, जिसका अर्थ है कि वे युद्धबंदी के रूप में मारे गए।

नेटफ्लिक्स सीरीज में दावा किया गया है कि अमेरिकियों द्वारा जीपीएस में छेड़छाड़ करने से शुरुआती दौर में बमबारी अभियान प्रभावित हुए थे। इस मामले पर आपकी राय क्या है?

कुछ लोगों का मानना ​​है GPS के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ की गई थी, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं लगता कि यह सही है।

सबसे पहले 2 मई, 2000 से पहले जीपीएस संकेतों में सिविलियन कोर्स/एक्विजिशन (सी/ए कोड) में एक अंतर्निहित त्रुटि शामिल थी, जिसे सेलेक्टिव अवेलेबिलिटी कहा जाता था। यह त्रुटि GPS के नागरिकों के लिए इस्तेमाल होने वाले Coarse/Acquisition (C/A) Code में शामिल की जाती थी। इससे इसकी सटीकता लगभग 100 मीटर तक सीमित रहती है। यह सीमा पूरी दुनिया में लागू थी, सिर्फ भारत में नहीं।

विमान ऑपरेशन में एक और तकनीकी प्रॉब्लम WGS 84 और Everest Spheroid के बीच अंतर की वजह से आती थी। भारतीय नक्शे Everest Spheroid पर आधारित थे, जबकि हाथ में इस्तेमाल होने वाले GPS उपकरण WGS 84 के निर्देशांक दिखाते थे। इसलिए जीपीएस पर दिखाई देने वाली स्थिति और भारतीय नक्शे पर मौजूद वास्तविक लक्ष्य के बीच मामूली अंतर आ सकता था।

भारतीय मानचित्र एवरेस्ट स्फेरोइड पर आधारित थे। हैंडहेल्ड जीपीएस सेटों में इस त्रुटि को ठीक करना आवश्यक था, क्योंकि वे केवल डब्ल्यूजीएस 84 निर्देशांकों में ही जानकारी प्रदर्शित करते थे।

हालांकि, मिग 21 और मिग 23 बटालियन के विमानों में लगे टाइम आर्क-6 जीपीएस सेट की मदद से भारतीय एवरेस्ट निर्देशांकों पर उड़ान भरने का विकल्प मिलता था। सेना हमें मिल ग्रिड (भारतीय एवरेस्ट निर्देशांक) में लक्ष्य देती थी, तो पायलट उसे 1:50,000 स्केल के नक्शे पर चिन्हित करते थे। इसके बाद नक्शे से अक्षांश-देशांतर निकाले जाते थे।

इसके बाद हमें हर कंटूर को गिनकर सटीक ऊंचाई निर्धारित करनी पड़ती थी और ठीक उसी ऊंचाई पर उड़ान भरनी होती थी, ताकि लक्ष्य से 4 किलोमीटर ऊपर से बम गिराए जा सकें। सीरीज में जैसा दिखाया गया है, जमीन पर किसी सर्वे किए गए बिंदु, जिसके निर्देशांक भारतीय Everest Coordinate System में दिए गए थे, के मुकाबले हैंडहेल्ड GPS पर कुछ त्रुटि दिखाई देती थी। इसलिए उस त्रुटि को सुधारना पड़ता था। मुझे नहीं लगता कि अमेरिकियों ने जानबूझकर ऐसा किया था।

‘अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा और इस सच्चाई को कोई बदल नहीं सकता’, भारत की चीन को दो टूक

सोशल मीडिया पर कई दिनों से नॉर्थ ईस्ट राज्य अरुणाचल प्रदेश पर धीरे-धीरे चीन के कब्जे के दावे खूब वायरल हो रहे थे। इसको लेकर भारतीय विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को स्पष्टीकरण जारी किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए कहा कि सोशल मीडिया पर जैसे भ्रामक दावे किए जा रहे हैं वह पूरी तरह से गलत हैं। उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश में चीन का कोई दखल नहीं है। अरुणाचल प्रदेश “भारत का अविभाज्य और अभिन्न अंग” है। पढ़ें पूरी खबर।