केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को खीरे की खेती के लिए 99 लाख रुपये की सरकारी सब्सिडी मिली। भागीरथ चौधरी अजमेर से सांसद हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस की जांच में पता चला है कि केंद्रीय मंत्री को तीन महीने पहले ही उनके मंत्रालय के तहत चलने वाली एक सरकारी योजना के जरिए यह सब्सिडी मिली थी। इस योजना को जिस राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (एनएचबी) ने मंजूरी दी थी, उसमें केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री पदेन उपाध्यक्ष होते हैं।

कॉमर्शियल खेती को बढ़ावा देना है मकसद

मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) नाम की इस योजना को 2014-15 में लॉन्च किया गया था। इस योजना का मकसद बड़े पैमाने पर कॉमर्शियल खेती को बढ़ावा देना था। इस योजना का संचालन एनएचबी द्वारा किया जाता है और यह बोर्ड भागीरथ चौधरी के मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत आता है।

योजना के तहत शिमला मिर्च, खीरा, टमाटर और आठ किस्म के फूलों की खेती के लिए अधिकतम 50% तक सब्सिडी दी जाती है। इसमें हर परिवार के लिए लिमिट 1 करोड़ रुपये है।

केंद्रीय राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी की खेती का यह प्रोजेक्ट 16,592 वर्ग मीटर में है। एनएचबी की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, बोर्ड के कामकाज का प्रबंधन निदेशक मंडल द्वारा किया जाता है। केंद्रीय कृषि मंत्री इसके पदेन अध्यक्ष और कृषि राज्य मंत्री पदेन उपाध्यक्ष होते हैं।

पदेन उपाध्यक्ष के रूप में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री का नाम

वेबसाइट पर पदेन उपाध्यक्ष के रूप में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री का नाम दिया गया है और इसमें भागीरथ चौधरी का ईमेल एड्रेस भी है। बोर्ड के अन्य सदस्यों में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव; भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक और बागवानी उद्योग के अन्य अधिकारी और प्रतिनिधि शामिल हैं।

कागजों में अगर देखा जाए तो इस योजना के तहत सब्सिडी के लिए परियोजनाओं को मंजूरी देने में केंद्रीय राज्य मंत्री की सीधी कोई भूमिका नहीं होती और इस बारे में एनएचबी की प्रोजेक्ट अप्रूवल कमेटी के द्वारा ही अंतिम मंजूरी दी जाती है। इस कमेटी में बोर्ड के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष शामिल नहीं होते हैं।

Conflict of Interest के मामले को लेकर पूछा सवाल

द इंडियन एक्सप्रेस ने इस मामले को लेकर भागीरथ चौधरी को कुछ सवाल भेजे और उनसे यह पूछा गया था कि क्या मंत्रालय की योजना से सब्सिडी लेना हितों के टकराव (Conflict of Interest) का मामला है। उनके दफ्तर की ओर से इस बात की पुष्टि की गई है कि ई-मेल मिला है लेकिन मंत्री की ओर से कोई जवाब नहीं आया।

आंकड़ों को देखें, तो यह पता चलता है कि इस योजना के तहत साल 2025-26 के दौरान कुल 467 प्रोजेक्ट मंजूर किए गए। इनकी कुल लागत लगभग 144 करोड़ रुपये थी और यह 677 एकड़ के इलाके में थे। इनमें से 60 ऐसी परियोजनाएं थी जिनमें 50 लाख रुपये से ज्यादा की सब्सिडी मिली।

पीह गांव में पहुंची इंडियन एक्सप्रेस की टीम

इंडियन एक्सप्रेस की टीम ने राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के पीह गांव का दौरा किया, जहां पर भागीरथ चौधरी का फार्म है। यहां लगे साइनबोर्ड पर लिखा था कि परियोजना की कुल लागत 1,99,20,000 (1.99 करोड़ रुपये) है। साइनबोर्ड पर यह भी लिखा था कि इस परियोजना में प्रमोटर का हिस्सा 49,80,000 (49.8 लाख रुपये) था और मंत्री ने परियोजना के लिए एचडीएफसी बैंक से 1,49,40,000 (1.49 करोड़ रुपये) का लोन लिया था।

भागीरथ चौधरी ने प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने के लिए 15 अप्रैल, 2025 को अर्जी दी और 29 अप्रैल 2025 को इसे मंजूरी मिल गई थी। 11 मार्च, 2026 को इस प्रोजेक्ट को बोर्ड से अंतिम मंजूरी मिल गई थी और 30 मार्च को 99.03 लाख रुपए की सब्सिडी चौधरी के एचडीएफसी लोन बैंक अकाउंट में जमा कर दी गई।

फार्म में जो साइनबोर्ड लगा है, उसमें सब्सिडी की रकम 99.60 लाख रुपये लिखी है और इस तरह इसके बीच 57,000 रुपये का फर्क दिखाई देता है।

रिकॉर्ड्स के मुताबिक, कृषि राज्य मंत्री चौधरी के पास खाता संख्या 315 (खसरा संख्या 508, 509, 610, 611, 621) के तहत 9.7 हेक्टेयर कृषि जमीन और खाता संख्या 991 (खसरा संख्या 2315/510) के तहत 1.1332 हेक्टेयर जमीन है।

4.41 करोड़ रुपये थी अचल और चल संपत्ति

भागीरथ चौधरी के द्वारा 31 मार्च, 2025 तक प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को दी गई जानकारी के मुताबिक उनकी अचल और चल संपत्ति 4.41 करोड़ रुपये थी। इस सूची में पीह गांव की कृषि वाली जमीन भी शामिल है और इसकी कीमत 5.85 लाख रुपए है। इसमें एनएचबी के इस प्रोजेक्ट का कोई जिक्र नहीं है। 

भागीरथ चौधरी के कार्यालय के सहयोगी ने बताया है कि प्रोजेक्ट के बारे में सरकार को जानकारी दी जाएगी।

सब्सिडी लेने के लिए पहले भी किया था आवेदन

द इंडियन एक्सप्रेस को अपनी पड़ताल में पता चला है कि भागीरथ चौधरी ने इस योजना के तहत सब्सिडी लेने के लिए इससे पहले भी आवेदन किया था। उन्होंने सितंबर, 2018 में एक आवेदन दिया था लेकिन जरूरी दस्तावेज समय पर जमा नहीं हो सके थे और इसलिए आवेदन को खारिज कर दिया गया था।

इसी साल उनके बेटे सुभाष चौधरी ने पीह गांव में मिश्रित सब्जी और खीरे की खेती के प्रोजेक्ट के लिए आवेदन किया था लेकिन तब इसे इसलिए खारिज कर दिया गया था कि प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होने वाली एक संरचना योजना के नियमों के अनुसार नहीं थी।

क्या है योजना का मकसद?

MIDH योजना का मकसद बड़े पैमाने पर कॉमर्शियल खेती को बढ़ावा देना है। इस योजना में शामिल फसलों में तीन सब्जियां- शिमला मिर्च, खीरा और टमाटर और फूलों की आठ किस्में हैं। फूलों की किस्मों में अनथुरियम, ऑर्किड, गुलाब, लिली, क्राइसैंथेमम, कार्नेशन, जाइसोफिला और जरबेरा शामिल हैं।

कौन होगा लाभार्थी?

इस योजना से सब्सिडी हासिल करने के लिए व्यक्ति, स्वयं सहायता समूह, उत्पादकों के संघ या समूह, ट्रस्ट, सहकारी समितियां, कंपनियां, किसान उत्पादक संगठन, सहकारी विपणन संघ, कृषि उपज विपणन समितियां, विपणन बोर्ड, नगर निगम, कृषि-उद्योग निगम, राज्य कृषि विश्वविद्यालय और अनुसंधान एवं विकास संगठन आवेदन कर सकते हैं।

सब्सिडी लेने के लिए क्या शर्तें हैं?

आवेदक के पास कम से कम 4,000 वर्गमीटर जमीन होनी चाहिए या फिर उस जमीन की कम से कम 10 साल की रजिस्टर्ड लीज़ होनी चाहिए। पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह सीमा 1,000 वर्गमीटर है।

सब्सिडी के लिए टर्म लोन लेना जरूरी है। टर्म लोन एकमुश्त दिया जाता है।

योजना के दिशानिर्देशों के मुताबिक, परियोजना को लोन की पहली किस्त की तारीख से अधिकतम 18 महीने में पूरा करना होगा।

सब्सिडी कैसे प्राप्त करें?

प्रोजेक्ट के लिए In-Principle Approval cum Letter of Comfort हासिल करना होता है। इसके लिए एनएचबी के पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना होता है। आवेदन के साथ सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने होते हैं, जिनमें पैन और जमीन रिकॉर्ड, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, साइट लेआउट प्लान, बैंक की ओर से जारी अंतिम लोन स्वीकृति पत्र और लोन देने वाले बैंक से विस्तृत अप्रैसल नोट सहित सभी अन्य जरूरी दस्तावेज शामिल हैं।

इन-प्रिंसिपल मंजूरी मिलने के बाद संयुक्त निरीक्षण टीम परियोजना स्थल का निरीक्षण करती है। इसमें एनएचबी और बैंक के प्रतिनिधि, राज्य बागवानी अधिकारियों और विशेषज्ञ शामिल होते हैं।

एनएचबी की प्रोजेक्ट अप्रूवल कमेटी द्वारा अंतिम मंजूरी दी जाती है लेकिन इसमें एनएचबी के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष शामिल नहीं होते हैं।

परियोजना पूरी होने के तीन महीने के अंदर सब्सिडी की राशि सीधे आवेदक के लोन खाते में जमा कर दी जाती है।

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