नोएडा में फैक्ट्री कर्मचारियों ने इस साल अप्रैल के महीने में विरोध प्रदर्शन किया था। पुलिस प्रदर्शन में शामिल लोगों की तलाश कर रही थी। इसमें से दो लोगों को पुलिस ने उनके घर के पास से पकड़ा, एक को काम की तलाश करते समय और एक को पूरी सब्जी लेने के लिए घर से बाहर निकलते समय।
लेकिन जमानत, कोर्ट के चक्कर और जेल में मुलाकातों के लिए परिवारों द्वारा लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कुछ तो घर से बाहर निकलने से भी डरते हैं।
उनके मामले इस अप्रैल में नोएडा में हुए श्रम विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी सात प्रमुख एफआईआर में दर्ज 222 जमानत आदेशों की इंडियन एक्सप्रेस की जांच के निष्कर्षों का सार प्रस्तुत करते हैं। उन पर दंगा करने से लेकर हत्या के प्रयास तक के कई गंभीर आरोप हैं, लेकिन अदालतों द्वारा या तो उनके खिलाफ कोई विशिष्ट कृत्य न पाए जाने, उनके खिलाफ सबूतों पर सवाल उठाने या यह मानने के बाद कि केवल विरोध प्रदर्शन में उपस्थित होना ही पर्याप्त नहीं है, उन्हें जमानत मिल गई है।
तीनों परिवार की कहानियां
तीनों आरोपियों और उनके परिवारों ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने विरोध प्रदर्शन में भाग नहीं लिया था। अपने मामलों पर बात करने के लिए उन्होंने अपनी पहचान गुप्त रखने का अनुरोध किया। यहां पर उनकी कहानियां बताई गई हैं।
विरोध प्रदर्शनों में कथित भूमिका के आरोप में 34 साल के दिहाड़ी मजदूर को 14 अप्रैल को नोएडा के लेबर चौक से पुलिस ने हिरासत में लिया था। कासना जेल में कई हफ्ते बिताने के बाद उन्हें 40 दिन बाद जमानत पर रिहा कर दिया गया। जब उसके पिता ने फोन किया तो उसकी मां को गिरफ्तारी की खबर मिली। उसकी मां ने याद करते हुए कहा, “बाजार बंद है। तुम क्यों जा रहे हो?” बाद में एक सहकर्मी ने पुष्टि की कि उसे काम की तलाश करते समय पकड़ा गया था।
यह परिवार बिहार से आए प्रवासी मजदूर हैं, जो 20 साल पहले दिल्ली चले गए थे। हर दो दिन में उससे जेल में मिलने जाते थे, अशोक विहार से कासना जेल का सफर करते थे और जेल और कोर्ट के चक्करों में कुल मिलाकर लगभग 50000 रुपये खर्च करते थे।
माता-पिता दोनों नोएडा की एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करते हैं और छोटा भाई ब्लिंकइट स्टोर में काम करता है। परिवार ने मजदूर की पत्नी और तीन बच्चों (उम्र 8, 6 और 3 साल) को भी अपने घर में पनाह दी। उन्होंने अपना कमरा छोड़ दिया और बच्चों के लिए छत पर मच्छरदानी के नीचे सोए। मां का कहना है कि जेल से बार-बार आने-जाने के कारण नोएडा की एक कपड़ा फैक्ट्री में उनकी नौकरी चली गई, लेकिन उनके पति का मैनेजर ज्यादा समझदार था।
बच्चों को पहले बताया गया कि उनके पिता काम के लिए बाहर गए हैं। जब वे आखिरकार उनसे मिलने गए, तो उनकी छोटी बेटी फूट-फूटकर रोने लगी। जमानत मिलने के बाद, परिवार ने मजदूर को बिहार के आरा जिले में उसके घर वापस भेज दिया है। उसकी मां कहती है, “अगर पुलिस आकर उसे सड़क पर चलते हुए पकड़ ले तो क्या होगा?” बिहार में, मजदूर की छोटी बेटी हर जगह उसके पीछे-पीछे जाती है। वह उससे कहती है, “पापा, आप हमें फिर से छोड़कर चले जाएंगे।”
दिन में छह बार फोन करते हैं माता-पिता
19 साल का यह मजदूर 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद जनवरी में नोएडा आया था, ताकि वह काम करके उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में रहने वाले अपने भूमिहीन किसान परिवार को पैसे भेज सके। 14 अप्रैल को वह अपनी कंपनी से पूरी-सब्जी की एक थाली खाने के लिए बाहर निकले।
पुलिस ने उसे तीन अन्य लोगों के साथ हिरासत में ले लिया और उनसे कहा कि उन्हें पूछताछ के लिए ले जाया जा रहा है और दोपहर 2 बजे तक रिहा कर दिया जाएगा। लेकिन इसके बजाय उन्हें दंगा, आपराधिक साजिश, जानबूझकर चोट पहुंचाने, अवैध कारावास, तोड़फोड़ और लोक सेवक पर हमला करने जैसे आरोपों में जेल ले जाया गया।
19 साल के युवक ने बताया, “जिस दिन मुझे जमानत मिली, उसी दिन मेरे पिता आए थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा और मुझे देखने के बाद भी चुपचाप खड़े रहे। मैं जानता हूं कि उन्हें कैसा महसूस हुआ होगा।” 18 मई को जमानत पर रिहा होने के बाद, उन्होंने एक कॉल सेंटर में काम करना शुरू किया। उन्होंने कहा, “उस सुबह घर से बाहर निकलना मेरी गलती थी। मेरे माता-पिता अब दिन में छह बार फोन करते हैं, इस डर से कि पुलिस मुझे फिर से पकड़ लेगी। उस दिन उस पूरी-सब्जी की वजह से मुझे बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी।”
मैं अभी भी रात को सो नहीं पाती हूं- मां
15 जुलाई को सात रिश्तेदारों का एक ग्रुप बस और फिर ऑटो से 25 किलोमीटर दूर सूरजपुर जिला अदालत पहुंचा। वे परिवार के दो युवकों को घर वापस लाने की उम्मीद में आए थे, जो तीन महीने से जेल में थे। बिहार के सीतामढ़ी के रहने वाले दो लोगों को 14 अप्रैल को नोएडा के सेक्टर 58 स्थित उनके घर के बाहर की गली से हत्या के प्रयास, दंगा करने, घातक हथियारों का इस्तेमाल करके स्वेच्छा से चोट पहुंचाने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में उठाया गया था। इनमें से एक केबल बनाने वाली फैक्ट्री में और दूसरा कपड़ों की फैक्ट्री में काम करता था।
उनके परिवारों ने आरोपों से इनकार किया और कहा कि उन्होंने दोनों पर लगभग 3 लाख रुपये खर्च किए हैं और जमानत बांड के लिए रिश्तेदारों की मदद ली है। शाम 5 बजे जब अदालत खाली होने लगी, तो एक रिश्तेदार ने कहा, “आप सब जाइए, मैं इन्हें वापस ले आता हूं।” वह रात 10 बजे लौटा। एक को रिहा कर दिया गया था, डॉक्यूमेंट्स संबंधी समस्या के कारण दूसरे को तीन महीने और एक दिन जेल में बिताने के बाद बाहर निकलने के लिए दो और दिन इंतजार करना पड़ा।
सबसे पहले रिहा हुए 20 साल के युवक ने घर लौटने के बाद गद्दे को छुआ। उन्होंने कहा, “कल मैं फर्श पर बैठा था और लॉकअप की सलाखों के पास जाकर पूछ रहा था कि क्या मेरे जमानत के कागजात यहां हैं।” 18 साल के लड़के की मां ने बताया कि जेल में मुलाकात के दौरान उसका बेटा टूट गया था। पूर्व घरेलू सहायिका ने कहा, “मैं अभी भी रात को सो नहीं पाती हूं।”
यह भी पढ़ें: नोएडा मजदूर आंदोलन – प्रदर्शनकारियों को जमानत से इनकार, एनएसए के साथ किताब और लेखों का दिया हवाला
नोएडा में हुए मजदूर विरोध प्रदर्शनों के मामले में गिरफ्तार किए गए करीब हर 10 में से 8 लोगों को जमानत मिल चुकी है। हालांकि, जिन लोगों को जमानत नहीं मिली है, उन सभी के खिलाफ एक समान आरोप लगाया गया है। यानी प्रदर्शन के पीछे कथित साजिश में उनकी भूमिका। पुलिस ने इसके सबूत के तौर पर पढ़ी गई किताबों, व्हाट्सअप पर भेजे गए संदेशों और गाजा तथा एनआरसी के विरोध प्रदर्शनों में भागीदारी का भी हवाला दिया है। एक मामले में पुलिस ने ‘आंदोलनजीवी’ शब्द का भी इस्तेमाल किया। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
