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आखिर राजनीति के ‘अजातशत्रु’ कैसे बन गए ‘अटल’? जानें- फर्श से अर्श तक का सफर

शांति के पक्षधर होने के बावजूद वाजपेयी ने 1998 में परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को अटल संदेश दिया था। 1999 के ठंडी के मौसम में बस लेकर लाहौर पहुंचे अटल जी ने भारत-पाक रिश्तों में नई गर्मी ला दी थी।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भले ही दुनिया को अलविदा कह दिया हो लेकिन वो भारतीय जनमानस के बीच अपने तेजस्वी, ओजस्वी और यशस्वी विचारों से ‘अमर’ और ‘अटल’ बने रहेंगे। अपने राजनीतिक विरोधियों को भी प्रशंसक बना लेने और सबको साथ लेकर चलने की बहुमुखी प्रतिभा के वो धनी थे। अपने विचारों और कार्यों की वजह से वाजपेयी न सिर्फ भारत बल्कि पड़ोसी देशों समेत दक्षिण-पूर्व एशिया और सात समंदर पार पाश्चात्य देशों में भी लोकप्रिय थे। उनकी वाकपटुता की दुनिया कायल रही है। 1977 में बतौर विदेश मंत्री युवा वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में जब हिन्दी में भाषण दिया था तब सदस्य देशों ने उनके सम्मान में तालियां बजाई थीं। 1970 के दशक में ही वाजपेयी की अंतरराष्ट्रीय पटल पर यह पहली अग्निपरीक्षा थी जिसमें वो सफल तो हुए ही विरोधियों को भी दोस्त बनाकर लौटे थे।

वाजपेयी ने करीब चार दशक तक विपक्ष की राजनीति की लेकिन कभी राजनैतिक विरोधियों ने उनके खिलाफ एक शब्द नहीं कहा। यही वाजपेयी की बतौर विपक्षी नेता अर्जित की गई कुल पूंजी थी। 1991 में जब उन्होंने राव-मनमोहन मॉडल के आर्थिक उदारीकरण का संसद में विरोध किया तब तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह नाराज हो गए और अपना इस्तीफा देने पर विचार करने लगे। जब वाजपेयी जी को यह पता चला तो उन्होंने मनमोहन सिंह से मिलकर राजनैतिक मजबूरियों और व्यक्तिगत टिप्पणियों का हवाला देते हुए उन्हें दोस्त बना लिया था। कांग्रेसी पीएम नरसिम्हा राव पहले से ही उनके दोस्त थे। संसद के गलियारों में भी पीएम और नेता विपक्ष को हंसते-मुस्कुराते देखा जाता था। वो 10 बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे।

1990 के दौर में जब देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का बोलबाला बढ़ा तब वाजपेयी जी ने सभी को साथ लेकर केंद्र में न केवल सरकार बनाई बल्कि ऐसी पहली गैर कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व किया जिसने अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। 1996 में जब 13 दिनों में उनकी सरकार लोकसभा में विश्वास मत साबित नहीं कर पाई तब उन्होंने पूरी दुनिया को लोकतंत्र में शूचिता का सफल पाठ पढ़ाते हुए कहा था कि जोड़-तोड़ से सरकार बनाना तो दूर ऐसी सत्ता को वो चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करेंगे। यह वाजपेयी का स्वस्थ लोकतंत्र में अगाध आस्था का ही परिणाम था कि जब दोबारा चुनाव हुए तो फिर से प्रधानमंत्री बने।

उन्होंने 13 दलों के साथ न केवल पहली गठबंधन सरकार पूर्ण कार्यकाल तक चलाई बल्कि देश को आर्थिक मजबूती भी दी। गांव-गांव तक प्रधानमंत्री सड़क योजना का जाल बिछाया। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के जरिए आधारभूत संरचनाओं के विकास को गति दी। दूर-देहात और गरीबों के बच्चों को भी बुनियादी शिक्षा मिले, इसके लिए उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान चलाया ताकि 14 साल तक के सभी वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा मिल सके। बदलती दुनिया के अहसास से भारत पीछे न छूट जाए इसके लिए उन्होंने एक तरफ डब्ल्यूटीओ से समझौता किया तो दूसरी तरफ नई दूरसंचार नीति का एलान भी किया और हर पंचायत को फोन सुविधा से लैस किया। हर जरूरतमंद के घर तक एलपीजी गैस पहुंचे, इसके लिए गैस कनेक्शन में वेटिंग पीरियड खत्म किया।

वाजपेयी पड़ोसी देशों के साथ मधुर संबंधों के पक्षधर थे। वो नेहरू को इस मामले में अपना आदर्श मानते थे। पाकिस्तान में भी उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि वहां के पीएम को कहना पड़ा था कि आप यहां से भी चुनाव जीत सकते हैं। अटल जी ने सैन्य तानाशाह बनने पर मुशर्ऱफ की आलोचना की थी लेकिन जब वो राष्ट्रपति बने तो सबसे पहले बधाई दी। वो बातचीत के जरिए दोनों देशों के बीच संबंध सुधारना चाहते थे लेकिन जब पाकिस्तान ने करगिल युद्ध छेड़ा तो उन्होंने दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए। संसद पर आतंकी हमला हुआ तो पाकिस्तान को चेतावनी देने में देर नहीं की। शांति के पक्षधर होने के बावजूद वाजपेयी ने 1998 में परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को अटल संदेश दिया था। 1999 के ठंडी के मौसम में बस लेकर लाहौर पहुंचे अटल जी ने भारत-पाक रिश्तों में नई गर्मी ला दी थी। उनकी इस मुहिम को पूरी दुनिया ने सलाम किया था।

1999 में जब आतंकियों ने कांधार विमान अपहरण किया तो वाजपेयी जी ने राजधर्म का निर्वाह करते हुए प्रजा की रक्षा की और मजबूरन तीन आतंकियों को छोड़ा था। कश्मीर पर वो काम करना चाहते थे। ‘इंसानियत’, ‘जम्हूरियत’ और ‘कश्मीरियत’ के मंत्र से वो कश्मीर समस्या का समाधान चाहते थे। वो घाटी के नौजवानों को मुख्य धारा में लाने की वकालत करते थे। यह वाजपेयी की अटल विचारधारा का नतीजा है कि उनके साथ जहां नेशनल कॉन्फ्रेन्स ने गठबंधन सरकार में अपनी भागीदारी निभाई वहीं घोर विरोध के बावजूद पीडीपी ने भी बीजेपी से दोस्ती की। वाजपेयी जी ने कभी अपने-पराए का भेद नहीं किया। जरूरत पड़ी तो राजीव गांधी की तारीफ की और जरूरत समझी तो अपने चहेते को राजधर्म निभाने की नसीहत भी दी। दशकों में ऐसा महानायक पैदा होता है। उन्हें अंतिम सलाम।

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