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दावा: पूर्व पीएम चंद्रशेखर ने सुलझा लिया था राम मंदिर विवाद, पीएमओ में ही कराई थी दोनों पक्षों में सुलह, शरद पवार, भैरो सिंह शेखावत थे मौजूद

पूर्व पीएम चंद्रशेखर की आत्मकथा में कहा गया है कि राजीव गांधी ने हिंदू-मुस्लिम पक्ष के बीच हुए समझौते के फाइनल होने से पहले ही चंद्रशेखर की सरकार गिरा दी थी।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | Updated: August 7, 2020 3:29 PM
Ayodhya Dispute, Hindu, Muslim, Ram Mandir, Babri Masjidभारत के पूर्व पीएम चंद्रशेखर। (फोटो – PTI)

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल अयोध्या मामले पर फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन को हिंदू पक्ष के हवाले कर दिया था। कोर्ट ने सरकार को ट्रस्ट बनाकर राम मंदिर का निर्माण शुरू कराने के निर्देश दिए थे। अदालत ने फैसले में सरकार से मस्जिद के लिए अयोध्या में ही जमीन देने का निर्देश भी दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कई सालों से चले आ रहे राम मंदिर जन्मभूमि विवाद का आखिरकार अंत हो गया। अब भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की आत्मकथा में दावा किया गया है कि चंद्रशेखर ने राम मंदिर विवाद को सुलझा लिया था। लेकिन राजीव गांधी ने उनकी सरकार को ही गिरा दिया, जिससे यह मुद्दा कभी सुलझ ही नहीं पाया।

चंद्रशेखर की आत्मकथा को लिखने वाले रोडिरेक मैथ्यूज के मुताबिक, चंद्रशेखर ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए राम जन्मभूमि न्यास, वीएचपी द्वारा अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए बनाए गए ट्रस्ट और ऑल इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेताओं की गुप्त मीटिंग भी बुलाई थीं। इसमें शरद पवार को हिंदुओं और भैरो सिंह शेखावत को मुस्लिमों से बात करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

‘मैं वीपी सिंह नहीं, मस्जिद को छूने वालों को तुरंत गोली मारने का आदेश दे दूंगा’: वीएचपी नेताओं से बोले थे चंद्रशेखर
बताया जाता है कि चंद्रशेखर ने जब वीएचपी के लोगों को अयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए बुलाया, तब कमल मोरारका बैठक में मौजूद थे। तो संगठन ने उन्हें सीधे शब्दों में विवादित क्षेत्र को राम मंदिर करार दे दिया। हालांकि, चंद्रशेखर ने गंभीरता से कहा कि मेरे प्रधानमंत्री रहते कोई उस ढांचे को छू नहीं सकता। मैं वीपी सिंह नहीं हूं, जो राज्य के मुख्यमंत्रियों पर निर्भर रहूंगा। मैं मस्जिद को छूने वालों को सीधे गोली मारने के आदेश दे दूंगा।

इसके बाद चंद्रशेखर मुस्लिम डेलिगेशन से भी मिले। उन्होंने मुस्लिमों से विवादित ढांचे के सुरक्षित रहने की बात कही। हालांकि, चंद्रशेखर का साफ कहना था कि अगर कल देश में दंगे होते हैं, तो उनके पास इसे रोकने के लिए जरूरी पुलिसबल नहीं है। उन्होंने मुस्लिमों को सोच-समझकर विवाद निपटाने की भी सलाह दी।

आत्मकथा में कहा गया है कि दो दिन में ही दोनों पक्ष घबराते हुए समझौते के लिए तैयार हो गए। चंद्रशेखर ने उनसे कहा कि दोनों पक्ष जिस चीज पर सहमत होंगे उनकी सरकार उसे लागू करती जाएगी। पूर्व पीएम ने यह भी शर्त रखी थी कि जो भी समझौता होगा, उस पर प्रेस को कुछ भी नहीं बताया जाना चाहिए। अंतिम समझौते तक बातचीत का कोई भी अंश प्रेस को लीक नहीं होना चाहिए। इसके बाद सभी पक्षों के बीच करीब 25 दिन तक बातचीत हुई।

आत्मकथा में यह भी दावा किया गया है कि दोनों पक्ष एक समझौते पर तैयार हो गए थे। इसके तहत मुस्लिमों का कहना था कि वे हिंदुओं की भावनाओं को देखते हुए विवादित ढांचे को उन्हें देने के लिए तैयार हैं। लेकिन मुस्लिमों ने मस्जिद के लिए अलग जमीन की भी मांग की। इसके अलावा एक कानून पास करने की मांग रखी, जिससे इस विवाद के खत्म होने के बाद कोई दूसरा मंदिर-मस्जिद विवाद न शुरू हो सके और 15 अगस्त 1947 के बाद जो मस्जिद है मस्जिद रहेगा और जो मंदिर है मंदिर रहेगा का फॉर्मूला प्रस्तावित किया गया। इस पर दोनों ही पक्षों में सहमति थी।

समझौते की बात पीएमओ से लीक होने के बाद राजीव गांधी ने गिरा दी थी सरकार
बताया जाता है कि जैसे ही मंदिर पर समझौते की बात पीएमओ के बाहर गई, वैसे ही पूरा मामला बिगड़ने लगा। आत्मकथा के मुताबिक, शरद पवार ने उस वक्त दोनों पक्षों की बातचीत की जानकारी राजीव गांधी को दे दी थी। राजीव गांधी ने चंद्र शेखर को फोन कर बातचीत कराने पर बधाई दी और समझौते को पढ़ने के लिए दो दिन का समय मांगा। हालांकि, दो दिन बाद ही उन्होंने चंद्रशेखर की सरकार को गिरा दिया। ऐसा दावा किया गया है कि राजीव गांधी नहीं चाहते थे कि अयोध्या विवाद को सुलझाने का श्रेय चंद्रशेखर को जाए। उन्हें इससे चंद्रशेखर के लोकप्रिय होने का भी डर था।

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