गृहिणी पिंकी बुधवार दोपहर को अपने दो बच्चों को स्कूल से लेने के बाद कृषि भवन के पास स्थित अपने घर लौटीं। उनका एक बेटा क्लास 7 में और बेटी क्लास 4 में पढ़ती है। वह दोनों स्कूल की वर्दी पहने हुए थे। यह वर्दी उन्होंने पिछले साल अप्रैल में शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में 10000 रुपये में खरीदी थी।

उन्हें पूरा खर्च वहन नहीं करना था। दिल्ली सरकार की छात्रों के लिए वर्दी पर मिलने वाली सब्सिडी 2025-26 में नए सत्र की शुरुआत में उन तक पहुंच जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस साल भी, 2026-27 सत्र के लिए उन्होंने सब्सिडी के लिए आवेदन किया।

हालांकि, लड़की के लिए 1250 रुपये और लड़के के लिए 1500 रुपये की राशि दोनों शैक्षणिक सत्रों के लिए अभी तक उसके बैंक खाते में जमा नहीं की गई है। पिंकी का अनुभव इस शैक्षणिक सत्र में लगभग 1.9 लाख छात्रों को प्रभावित करने वाली देरी को दिखाता है।

शिक्षा विभाग के डेटा के अनुसार, इस साल आरटीई एक्ट के तहत दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 8वीं क्लास तक के 8,29,304 छात्रों में से 6,39,904 छात्रों को डीबीटी के जरिये यूनिफॉर्म सब्सिडी मिल चुकी है, जबकि 1,89,400 छात्र अभी भी इंतजार कर रहे हैं।

भुगतान में क्यों हो रही देरी?

विभाग ने लंबित भुगतानों का कारण खाते की अधूरी जानकारी को बताया है और कहा कि बचे हुए छात्रों को भुगतान की प्रक्रिया चल रही है। पिछले साल भी इसी तरह का अंतर था। विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में लगभग 84 लाख पात्र छात्रों में से 7,15,148 छात्रों को सब्सिडी मिली, जबकि 1,25,152 छात्रों को सब्सिडी मिलना बाकी है। इस साल लगभग 77% पात्र छात्रों को इसका लाभ मिला है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा लगभग 85% था।

पिंकी के अनुसार, स्कूल ने उन्हें बताया है कि सब्सिडी अगस्त के आखिर तक उनके खाते में पहुंच जाएगी। उन्होंने कहा, “लोधी कॉलोनी में एक दुकान है जहां स्कूल यूनिफॉर्म सिली जाती है। मैंने अपनी बेटी की यूनिफॉर्म के लिए वहां 3000 रुपये दिए।” उन्होंने आगे बताया कि लेकिन अपने बेटे के लिए यूनिफॉर्म खरीदने के बाद उनका कुल खर्च 10000 रुपये हो गया। उनके पति एक होटल में हाउसकीपिंग का काम करते हैं और हर महीने लगभग 14000 रुपये कमाते हैं।

हम अभी भी सब्सिडी का इंतजार कर रहे हैं- शिव नारायण

अभिभावकों के लिए इस देरी का मतलब यह नहीं है कि वे यूनिफॉर्म खरीदने के लिए इंतजार कर सकते हैं। शिव नारायण की बेटी लाजपत नगर के एमसीडी को-एड प्राइमरी स्कूल में नर्सरी में पढ़ती है। उन्होंने कहा कि इस साल एडमिशन के लिए समय अपनी बैंक डिटेल जमा कर दी थी, लेकिन अभी भी सब्सिडी का इंतजार कर रहे हैं।

उन्होंने मुझसे 500 रुपये देने को कहा। यह सब्सिडी मिलने पर व्यवस्थित कर दिए जाएंगे। चूंकि अभी तक राशि नहीं मिली है, इसलिए मैंने अपनी बेटी की वर्दी अपनी जेब से खरीदी है। पांडारा रोड स्थित गवर्नमेंट बॉयज सीनियर सेकेंडरी स्कूल में कक्षा 7 के एक छात्र के पिता ने बताया कि उन्होंने पिछले साल अपने बेटे की यूनिफॉर्म पर लगभग 2,500-3000 रुपये खर्च किए थे। उन्हें सब्सिडी लगभग एक साल देरी से यानी इस साल मार्च में मिली।

उन्होंने कहा, “वरिष्ठ छात्रों को थोड़ी ज्यादा राशि लगभग 1500 रुपये मिलते हैं। लेकिन महंगाई से सभी परेशान हैं। फिर भी हम किसी तरह काम चला लेते हैं। स्कूल किताबें मुहैया कराता है।”

प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले ईडब्ल्यूएस और वंचित वर्ग के छात्रों के लिए भी यह चिंता का विषय है। गैर-सरकारी मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों की कार्य समिति ने आरटीई कोटा के तहत इन छात्रों को दी जाने वाली वर्दी, किताबों और लिखने के सामान के लिए समय पर पैसे वापस मिलने को लेकर चिंता जताई है।

पटपड़गंज के राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय में एक शिक्षक ने बताया कि स्कूल ने हाल ही में उन छात्रों की पहचान करने के लिए अभिभावकों की बैठक बुलाई थी जिनकी बैंक डिटेल्स जमा नहीं हुई थीं। शिक्षक ने आगे कहा, “शिक्षा निदेशालय ने हमसे इन जानकारी को इकट्ठा करने का काम तेजी से करने को कहा है। हर दिन इस प्रक्रिया को पूरा करने और लंबित मामलों को निपटाने के लिए एंट्री और दूसरे तकनीकी काम किए जा रहे हैं।”

लोधी रोड स्थित अटल आदर्श विद्यालय की प्रिंसिपल सबीना सूद ने बताया कि देरी की वजह आम तौर पर केवाईसी या बैंक अकाउंट की जानकारी से जुड़ी होती है। उन्होंने कहा, “कभी-कभी केवाईसी नहीं हो पाती और विभाग डीबीटी के लिए बैंक अकाउंट की जानकारी प्रोसेस नहीं कर पाता।” उन्होंने यह भी बताया कि उनके स्कूल में लगभग 2% छात्रों के मामले ऐसे ही थे।

कई माता-पिता को पहले पूरा खर्च खुदा उठाना पड़ता है- मोहन पासवान

प्रेम नगर के सामाजिक कार्यकर्ता मोहन पासवान ने कहा कि देरी से सहायता का उद्देश्य ही विफल हो गया। उन्होंने कहा, “इस सब्सिडी का मकसद परिवारों के लिए यूनिफॉर्म का खर्च कम करना है, लेकिन कई माता-पिता को पहले पूरा खर्च खुद उठाना पड़ता है और फिर पैसे वापस मिलने का इंतजार करना पड़ता है।”

डीबीटी का लगातार इस्तेमाल अहम है क्योंकि दिल्ली सरकार ने पहले 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से सरकारी स्कूलों में नर्सरी से 8वीं क्लास तक के छात्रों को यूनिफॉर्म सामान के तौर पर देने का प्रस्ताव दिया था।

यह प्रस्ताव आरटीई एक्ट के तहत बच्चों को मुफ्त यूनिफॉर्म, किताबें और लिखने का सामान देने को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में चल रहे एक लंबे मामले के बीच आया था। सरकार ने 2025 में अदालत को बताया था कि वह परिचालन संबंधी कठिनाइयों के कारण वर्दी उपलब्ध नहीं करा सकती और इसके बजाय सब्सिडी दरों में संशोधन का प्रस्ताव रखा था।

जून 2025 में संशोधित दरों के मुताबिक, 1-5 क्लास के लिए 1,250, 6-8 क्लास के लिए 1,500 और 9-12 क्लास के लिए 1,700 तय किए गए हैं। ये दरें 2017-18 से बदली नहीं थीं। यह सब्सिडी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के छात्रों के साथ-साथ आरटीई कोटे के तहत प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले ईडब्ल्यूएस-डीजी छात्रों पर भी लागू होती है।

जनवरी में हाई कोर्ट ने सरकार की बदली हुई पॉलिसी को सही ठहराया और उसे यह पक्का करने का निर्देश दिया कि उसकी पॉलिसी के मुताबिक पर्याप्त राशि समय रहते और जल्द से जल्द दी जाए। इस मामले से संबंधित अवमानना ​​कार्यवाही में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की गई। इसमें दर्ज किया गया है कि विभाग ने ज्यादातर पात्र छात्रों को डीबीटी भुगतान कर दिया है, लेकिन शेष मामलों पर कार्रवाई जारी है।

भुगतान में देरी का मुद्दा नया नहीं

भुगतान में देरी का मुद्दा नया नहीं है। 2017 में आरटीई एक्ट को लागू करने पर दिल्ली सरकार की एक बैठक में यूनिफॉर्म, किताबों और लिखने के सामान के लिए पैसे से जुड़े दो लाख से ज़्यादा पेंडिंग मामलों का जिक्र था। उस समय, विभाग ने देरी की वजह बैंक अकाउंट के साथ आधार लिंकिंग न होना बताया था।

तब सरकार ने विभाग को निर्देश दिया था कि लंबित भुगतानों के लिए आधार सीडिंग पर जोर न दिया जाए और उन्हें तुरंत जारी किया जाए। लगभग एक दशक बाद भी अकाउंट की अधूरी जानकारी ही यूनिफॉर्म सब्सिडी पेमेंट के पेंडिंग रहने की विभाग द्वारा बताई गई वजह बनी हुई है, जबकि पिंकी जैसे परिवार पहले ही अपनी जेब से पैसे चुका रहे हैं।

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