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संपादकीय: महामारी और तैयारी

तमाम सावधानियों, फैलने से रोकने के उपायों, चिकित्सीय तत्परता के बावजूद कोरोना संक्रमितों की संख्या हमारे यहां एक करोड़ से ऊपर पहुंच गई।

Author December 21, 2020 6:57 AM
symbolicसांकेतिक फोटो।

अब भी हर रोज बीस हजार से ऊपर मामले दर्ज हो रहे हैं। रोज मरने वालों की संख्या तीन सौ से ऊपर ही रहती है। अब तक इससे करीब एक लाख पैंतालीस हजार लोगों की मौत हो चुकी है। यह ठीक है कि संक्रमितों के स्वस्थ होने की दर हमारे यहां दूसरे देशों की तुलना में काफी बेहतर है।

मगर अब भी ऐसे मरीजों की संख्या हजारों में है, जिनका इलाज चल रहा है। यानी अभी स्थिति खतरे से बाहर नहीं है। कुछ देशों ने कोरोना के टीके बना लिए हैं, कुछ जगहों पर लगाए भी जाने लगे हैं। हमारे यहां भी इसका परीक्षण अंतिम चरण में है। संभावना जताई जा रही है कि अगले महीने टीकाकरण की प्रक्रिया शायद शुरू हो सके।

पर कहीं भी इसके प्रभाव को लेकर अंतिम रूप से कोई दावा नहीं किया जा पा रहा। इसलिए हमारे यहां भी विशेषज्ञों का अनुमान है कि कोरोना पर काबू पाने में कम से कम छह महीने और लग सकते हैं। मगर हैरानी की बात है कि इससे बचाव के उपायों को लेकर लोग निहायत लापरवाही बरतते देखे जा रहे हैं।

यह ठीक है कि कोरोना की रफ्तार पहले से काफी कम हुई है। अब इसका रुख ढलान की तरफ देखा जा रहा है। मगर इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं लगाया जा सकता कि यह समाप्ति की ओर है। जर्मनी जैसे कुछ देश इसके उदाहरण हैं, जहां कोरोना की नई लहर आई और वहां फिर से कड़ाई से बंदी लागू करनी पड़ी है। हमारे यहां भी पिछले दिनों दिल्ली में चिंताजनक ढंग से इसका फैलाव शुरू हो गया था। अब भी कुछ शहर खतरे से बाहर नहीं हैं। इसलिए मामूली लापरवाही भी महामारी को फिर से पांव पसारने का मौका दे सकती है।

उद्योग-धंधों और कारोबारी गतिविधियों को खोलना इसलिए जरूरी था कि इसके बिना अर्थव्यवस्था को संभालना संभव नहीं है। यह इजाजत इस शर्त के साथ दी गई है कि लोग खुद सावधानी बरतते हुए अपने रोजमर्रा के काम निपटाएंगे। मगर कुछ लोगों ने बंदी खुलने का मतलब मान लिया है कि कोरोना का खतरा समाप्त हो गया है। इसीलिए बहुत सारे लोग बिना नाक-मुंह ढंके, उचित दूरी बनाए, जगह-जगह बाजारों, सार्वजनिक स्थानों पर भीड़भाड़ लगाते दिखने लगे हैं। सार्वजनिक वाहनों में पहले जैसे ही ठेलमठेल मचने लगी है।

यह छिपी बात नहीं है कि हमारे यहां सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की सब तक आसान पहुंच नहीं है। इसके अलावा लोग बीमारियों को लेकर आमतौर पर लापरवाह देखे जाते हैं। इसलिए पूरे देश में जांच की गति अब भी अपेक्षित नहीं हो पा रही। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रकट आंकड़ों से कहीं ज्यादा लोग इस विषाणु से संक्रमित हुए, पर प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होने की वजह से वे स्वत: ठीक हो गए।

इस तथ्य को लेकर संतोष जरूर किया जा सकता है, पर इसे खतरनाक स्थिति भी माना जाना चाहिए। क्योंकि अनुमान है कि अगर कोई व्यक्ति कोरोना संक्रमित होता है, तो वह अपने संपर्क में आने वाले कम से कम बीस लोगों को और संक्रमित कर देता है, बेशक वह खुद स्वस्थ हो जाए। इसलिए अभी किसी भी तरह की लापरवाही फिर से खतरे को बढ़ा सकती है। लोगों से खुद सावधानी बरतते हुए संक्रमण से बचने की अपेक्षा अभी लंबे समय तक बनी रहेगी।

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