प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी द्वारा महिला आरक्षण लागू करने के मकसद से लोकसभा के विस्तार का प्रस्ताव गिरने के बाद विपक्ष पर करारे हमले किए। लेकिन सत्ताधारी दल के अंदर ही अपनी संगठन में महिलाओं को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का कुछ दबाव दिख रहा है।
यह दबाव ऐसे में समय में दिख रहा है जब बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन अपनी नई टीम बनाने वाले हैं, जिससे भाजपा में संगठनात्मक फेरबदल की प्रक्रिया तेजी मिलेगी।
कई पार्टियों के अधिक प्रतिनिधित्व- भाजपा
भाजपा नेताओं का दावा है कि कोई भी दूसरी पार्टी महिलाओं को उतना प्रतिनिधित्व नहीं दे रही, जितना उनकी पार्टी देती है। भाजपा के महासचिव अरुण सिंह ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “महिला मोर्चा के अलावा, केंद्र और राज्य में एक तिहाई पदाधिकारी महिलाएं ही हैं। अगर कुछ जगहों पर पद खाली भी हैं, तो उन्हें भी सिर्फ महिलाओं से ही भरा जाएगा।”
भाजपा अध्यक्ष के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने एक सात सदस्यीय समिति बनाई थी। इस समिति की अध्यक्षता दिवंगत पार्टी नेता सुषमा स्वराज ने की थी। समिति का मकसद यह पता लगाना था कि भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में महिलाओं की भागीदारी को कैसे बढ़ाया जा सकता है। जून 2007 में नई दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में अपने भाषण में राजनाथ ने कहा था, पार्टी को महिलाओं का व्यापक समर्थन हासिल है। हमारा मानना है कि विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधत्व बढ़ाया जाना चाहिए। इसके लिए पार्टी के भीतर भी महिलाओं का प्रतिनिधत्व बढ़ाया जाना जरूरी है। पार्टी में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए। सुषमा स्वराज के अलावा, इस समिति में सुमित्रा महाजन, नजमा हेपतुल्ला, किरण माहेश्वरी, बाल आप्टे, किरण रिजिजू और किशन रेड्डी सदस्य के तौर पर मौजूद थे।
इसके बाद में समिति ने एक रिपोर्ट दी जिसमें पार्टी के विभिन्न निकायों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में पर्याप्त बढ़ोतरी का सुझाव दिया गया था। साथ ही बताया गया था भाजपा का संविधान स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक हर इकाई में महिलाओं के लिए एक-तिहाई प्रतिनिधित्व अनिवार्य बनाता है, जिसके बिना वह ईकाई अवैध रहेगी। समिति ने कहा, “इसी तरह धारा 20 के तहत 89 राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्यों में से 12 महिलाओं का नामांकन अनिवार्य है। लेकिन विभिन्न स्तरों पर आरक्षण का यह अनुपात कुल मिलाकर 12 से 15 फीसदी तक आता है। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इसे बढ़ाकर 33 फीसदी तक करने की इच्छा जताई है। समिति का मानना है कि आरक्षण में यह बढ़ोतरी अत्यंत जरूरी है।”
एक भाजपा नेता ने दावा किया कि हमारी अधिकतर स्थानीय इकाइयों में बूथ स्तर से ही 33 फीसदी महिलाएं हैं।
भाजपा में कितनी महिलाओं की भागीदारी?
हालांकि अगर भाजपा की आधिकारिक वेबसाइट पर आप झांकेगे तो पाएंगे कि 396 राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्यों में से केवल 37 यानी 9 फीसदी महिलाएं हैं। 12 सदस्यीय संसदीय बोर्ड में सुधा यादव एकमात्र महिला हैं, जबकि 12 राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में से पांच महिलाएं हैं। भाजपा में कोई महिला महासचिव नहीं है। कुल सात महासचिव हैं। साथ ही 11 राष्ट्रीय सचिवों में से दो महिलाएं हैं।
स्वराज समिति ने कहा था कि राज्य अध्यक्षों, जिला अध्यक्षों और मंडल अध्यक्षों के मामलों में महिलाओं के लिए आरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए स्वयं राज्यों, जिलों और मंडलों को आरक्षित करना पड़ेगा,जो कि अव्यावहारिक है।
पार्टी नेतृत्व पर दबाव- राज्यसभा सांसद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर संविधान बिल के खिलाफ वोट देने के लिए महिला विरोधी होने का आरोप लगाया, जिसके बाद पार्टी के भीतर से ही महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की नई मांगें उठ रही हैं। राज्यसभा के एक सांसद ने कहा, “चूंकि हम इतनी जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं, इसलिए पार्टी शीर्षों पर यह दबाव होगा कि संगठन में महिलाओं की संख्या बढ़ाई जाए। हमें यह भी देखना होगा कि भाजपा महिलाओं को एक-तिहाई से अधिक सीटें दे।”
एक अन्य सासंद ने कहा, “हमने अभी भी संगठन में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया है, न तो निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में और न ही संसद और विधानसभाओं में।” दोनों नेताओं ने इस बात की ओर इशारा किया कि जब नितिन नवीन अपनी नई टीमें की घोषणा करेंगे, तो यह एक ऐसा मुद्दा होगा जो सबका ध्यान अपनी आकर्षित करेगा।
कांग्रेस में कितनी भागीदारी?
इसके उलट, कांग्रेस कार्यसमिति के 37 सदस्यों में 6 महिलाएं हैं, जिनमें सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी शामिल हैं। सीडब्ल्यूसी के 34 स्थायी आमंत्रित सदस्यों में से केवल चार महिलाएं हैं और 15 सदस्यीय विशेष आमंत्रित कैटेगरी में भी चार महिलाएं हैं।
सबसे अधिक टीएमसी में महिलाओं की भागीदारी
मौजूदा लोकसभा में टीएमसी महिला सांसदों की सूची में सबसे ऊपर है, जिसकी कुल संख्या का 39 फीसदी महिलाएं हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों में महिला सांसदों का हिस्सा लगभग बराबर है, जो क्रमश: 13 फीसदी और 13.4 फीसदी है। हालांकि भाजपा में महिला उम्मीदवारों का अनुपात कांग्रेस की तुलना (13 फीसदी) में अधिक (16 फीसदी) था। एक और बड़ी क्षेत्रीय पार्टी डीएमके का नेतृत्व लोकसभा में एक महिला के कनिमोझी कर रही है, लेकिन इसके 22 सांसदों में से केवल तीन ही महिलाएं हैं।
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भारतीय संसद और राज्यों की विधान सभा में 33 प्रतिशत सीटों पर महिला आरक्षण लागू करने का मुद्दा इस समय चर्चा में है। मगर यह मुद्दा भारत विभाजन के पहले से उठता रहा है। सरोजिनी नायडू, हंसा मेहता और बेगम एजाज रसूल जैसी नेताओं ने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत से महिलाओं को आरक्षण दिए जाने की मांग की थी। हालांकि उनकी मांग ब्रिटिश शाmसकों ने उनकी मांग नहीं मानी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
