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हार भी जीत से कम नहीं

अवसाद से बचना है तो हर हाल में हारकर भी जीतना होगा।

हार भी जीत से कम नहीं

अपने जीवन में कई बार हार का सामना करना पड़ता है। शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसे इस स्थिति से न गुजरना पड़ा हो।आम हो या खास सभी को हार का मुंह देखना पड़ता है। कई बार तो हार ही स्थायी सफलता का कारण बन जाती है। सवाल यह है कि हार को किस दृष्टिकोण से देखा जाए।

अगर हार के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक है तो हार कर भी जीत होती है। इसी तरह अगर हार के प्रति दृष्टिकोण नकारात्मक है तो जिंदगी में बहुत कुछ खो पड़ता हैं। कुछ लोग हार को पचा नहीं पाते हैं और उग्र हो जाते हैं। उग्र होना एक नकारात्मक स्थिति है। उग्र होने का अर्थ यही है कि हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। जो इंसान धैर्य के साथ हार स्वीकार कर लेता है, वह एक दिन जीतता जरूर है। जीतना एक दिन की छोटी प्रक्रिया नहीं है।

जीतने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है लोग हारने या जीतने को बहुत छोटी प्रक्रिया मान लेते हैं। जिस तरह एकदम जीत नहीं मिलती है उसी तरह एकदम से हार भी नहीं। हारने या जीतने से पहले हमें एक तय रास्ते पर चलना होता है। इस रास्ते पर चलते हुए हमें अनेक समस्याओं से भी जूझना पड़ता है।

इस तरह मुख्य हार-जीत से पहले भी कई तरह की छोटी-छोटी हार-जीत का सामना करना पड़ता है। लोग इन छोटी-छोटी विफलताओं को स्वीकार करते ही हैं। इसके बावजूद बड़ी हार को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। हर किसा को अच्छी तरह यह पता होता है कि हार-जीत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं लेकिन इसके बावजूद इस वास्तविकता को या तो भूल जाते हैं या फिर नकार देते हैं।

इसलिए जरूरी यह है कि सबसे पहले हार को स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया जाए। ऐसा होने पर विनम्रता बनी रहती है। हारकर शांत और विनम्र बने रहना जीतकर अहंकारी बनने से बेहतर है। जो इंसान जीतकर अंहकारी बन जाता है, उसके लिए आगे का रास्ता कठिन हो जाता है। ऐसे इंसान के लिए एक बार जीतने के बाद भविष्य में जीतने की संभावना कम हो जाती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह अहंकार में आकर स्वयं को जानने की कोशिश बंद कर देता है। इसके विपरीत जो इंसान हारकर शांत और विनम्र बना रहता है, उसके लिए भविष्य में जीतने की संभावना बढ़ जाती है।

ऐसा इंसान शांत रहकर स्वयं को जानने की कोशिश करता है और अपनी कमियों पर गंभीरता से विचार करता है। इसलिए हारना महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण यह है कि हारने के बाद कोई व्यक्ति मानसिक रूप से कितना मजबूत रहता है और उसका व्यवहार कितना संतुलित रहता है। यह सही है कि कोई भी इंसान हारना नहीं चाहता। इसकी वजह हार प्रतिष्ठा कम करती है। हालांकि हार को स्वीकार न करने के चक्कर में कुछ ऐसे गलत काम भी लोग कर बैठते हैं जो किसी भी तरह से उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं होते हैं।

इसलिए हार से प्रतिष्ठा कम नहीं होती बल्कि हार को न पचाने के कारण होने वाले गलत काम की वजह से प्रतिष्ठा कम होती है। हार मानसिक स्तर पर भी हानि पहुंचाती है लेकिन यह हार का एक पहलू है। हार का दूसरा पहलू यह है कि पराजय मजबूत भी बनाती है। पराजय उस सच्चाई से परिचय कराती है जिसे घमंड में चूर होकर लोग लगातार नजरअंदाज करते रहते हैं।

अपनी वास्तविक सच्चाई को जान कर ही लोग कुछ और बेहतर करने के लिए प्रेरित होते हैं। इस तरह हार स्वयं से आत्मसाक्षात्कार कराती है। इसलिए जीतना तो महत्त्वपूर्ण है ही, हारना भी कम अहम नहीं है। ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो हारकर टूट जाते हैं और अन्तत: अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं। अवसाद से बचना है तो हर हाल में हारकर भी जीतना होगा।

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