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राजपाट: नेताओं की नैतिकता और सियासी सवाल

सत्ता के लिए समझौते तो करने ही पड़ते हैं। नीतीश कुमार को ही अपवाद कैसे कह सकते हैं। उनके पास भाजपा की शर्तों को मानने के सिवा और कोई विकल्प भी तो नहीं था।

राजकाजएमपी के पूर्व सीएम कमलनाथ और बिहार के वर्तमान सीएम नीतीश कुमार।

बेशर्मी की इंतहा
राजनीति में अब नैतिकता का निर्वाह विरले ही करते हैं। इमरती देवी को आप भूले नहीं होंगे। मध्यप्रदेश विधानसभा की 28 सीटों के पिछले दिनों हुए उपचुनाव में इमरती देवी के बारे में अभद्र टिप्पणी कर कमलनाथ ने अपनी किरकिरी कराई थी। इमरती देवी पहले कांग्रेस में थीं। विधानसभा और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में आईं। उपचुनाव का भी इंतजार नहीं किया। दूसरे दल बदलुओं की तरह सदन की सदस्य नहीं होने के बावजूद शिवराज सरकार में दो जुलाई को मंत्री बन गईं। पर उपचुनाव के नतीजे आए तो न केवल इमरती बल्कि ऐसे दो और मंत्री गिरिराज दंडोतिया व एंदल सिंह भी चुनाव हार गए। इस नाते तत्काल मंत्रिपद छोड़ने की नैतिकता अकेले एंदल सिंह ने दिखाई।

इमरती देवी और गिरिराज दंडोतिया ने न खुद मंत्री पद छोड़ने की पहल की और न मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने उनका इस्तीफा मांगा। उल्टे दुहाई दी गई कि सदन का सदस्य हुए बिना छह महीने तक कोई भी रह सकता है मंत्रिपद पर। यह मियाद तो अगले साल एक जनवरी को होगी पूरी। नैतिकता की दुहाई देने वाले सिंधिया भी इस पर चुप्पी साध गए। लोकतंत्र का इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है।

कायदे से तो शिवराज चौहान को चुनाव परिणाम के साथ ही कर देनी चाहिए थी तीनों मंत्रियों की छुट्टी। पद के लालची ऐसे नेताओं की और भी अनेक मिसालें हैं। बिहार में राबड़ी देवी ने तो नाबालिग सम्राट चौधरी को ही बना दिया था मंत्री। तबके राज्यपाल सूरजभान ने कार्रवाई कर बाद में बर्खास्त किया था सम्राट को। उत्तर प्रदेश में अनुराधा चौधरी के खाते में भी दर्ज है यही आचरण। वे सूबे की सरकार में मंत्री थी कि 2004 में लोकसभा चुनाव जीत गई। विधानसभा की सदस्यता छोड़ना तो मजबूरी थी पर सूबे की सरकार का मंत्रिपद सांसद रहते हुए भी अगले छह महीने तक भोगती रही। तमिलनाडु में भ्रष्टाचार में अदालत से दोषी साबित होने पर जयललिता विधानसभा चुनाव नहीं लड़ पाई थी।

सदन की सदस्यता के अयोग्य थी फिर भी उनकी पार्टी के विधायकों ने उन्हीं को नेता चुन लिया। तब की राज्यपाल फातिमा बीबी को विरोधियों ने आगाह भी कराया पर सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज होने का गौरव पा चुकी राज्यपाल फातिमा ने जयललिता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। यह बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के इस मखौल पर चाबुक चलाया और देश के इतिहास में पहली बार बहुमत वाली एक निर्वाचित सरकार को खुद बर्खास्त किया। संविधान की खूबियों के बजाए अपने नेता इसकी धज्जियां उड़ाने के इच्छुक रहते हैं। पंजाब में तो कमाल ही हो गया था जब बेअंत सिंह के बेटे तेजप्रताप सिंह को कांग्रेस ने सदन का सदस्य नहीं होने पर भी छह महीने के लिए मंत्री बनाया था। यह मियाद पूरी हुई तो एक दिन का फासला रख दोबारा मंत्रिपद की शपथ दिला दी थी। संविधान के इस मखौल पर भी सुप्रीम कोर्ट को ही चाबुक चलाना पड़ा था।

बेमिसाल मेहमानवाजी
बद्रीनाथ-केदारनाथ के कपाट बंद होने के मौके पर दर्शन के लिए आए थे योगी आदित्यनाथ। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जमकर मेजबानी की। आम जनता में भी जिज्ञासा अपने मुख्यमंत्री के बजाए यूपी के मुख्यमंत्री को लेकर ही ज्यादा नजर आई। योगी ने उत्तराखंड के आखिरी गांव माणा का भी दौरा किया। बीच में एक दिन भारी हिमपात के कारण दोनों बदरीनाथ-केदारनाथ के बीच फंस भी गए थे। बदरीनाथ में उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटक आवास गृह का भी लगे हाथ लोकार्पण कर दिया योगी ने। योगी और रावत की इस अनूठी कैमिस्ट्री से सूबे के तमाम मंत्री भी दांतों तले उंगली दबाकर रह गए।

कांटों भरा ताज
सत्ता के लिए समझौते तो करने ही पड़ते हैं। नीतीश कुमार को ही अपवाद कैसे कह सकते हैं। उनके पास भाजपा की शर्तों को मानने के सिवा और कोई विकल्प भी तो नहीं था। मुख्यमंत्री की कुर्सी जद (एकी) के भाजपा से कम सीटें जीतने पर भी नीतीश को ही सौंपने का वादा भाजपा ने पूरा कर दिया। लेकिन बदले में उसकी अपनी शर्तें भी रहनी ही थी। तभी तो न भाजपा के दो उप मुख्यमंत्री बनाने के फैसले पर नीतीश चूं कर पाए और न विधानसभा अध्यक्ष का गठबंधन सरकार में अहम समझा जाने वाला पद देने से इनकार कर पाए। अगर केंद्र में मंत्री मंडल विस्तार में पिता की जगह चिराग पासवान को जगह मिल गई तो नीतीश आहत जरूर होंगे। अब सुशील मोदी उनके लिए कवच की भूमिका नहीं निभा पाएंगे।

नई भाजपा को बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने की उतावली जरूर रहेगी। ऊपर से मेवालाल चौधरी को पहले मंत्री बना और तीन दिन के भीतर किरकिरी कराने के बाद उनसे इस्तीफा ले नीतीश ने विपक्ष को बेवजह मुद्दा थमा दिया। भाजपाई तो अभी से कहने लगे हैं कि वेंकैया नायडू का कार्यकाल पूरा होते ही नीतीश के लिए उपराष्ट्रपति का पद बेहतर होगा। नीतीश की असली दुविधा तो यह है कि भाजपा जैसा न उनकी पार्टी का ढांचा है और न उन्होंने पार्टी के किसी नेता को उनका सियासी उत्तराधिकारी होने का दावा कर पाने की हैसियत दी है। (प्रस्तुति: अनिल बंसल)

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