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बिहार चुनाव से पहले इलेक्टोरल बॉन्ड से पार्टियों को मिला 282 करोड़ का चंदा; तीन साल में मिल चुके हैं 6,493 करोड़ रुपए

इलेक्टोरल बॉन्ड्स की बिक्री शुरू होने के बाद पहले साल यानी 2018 में पार्टियों को इसके जरिए 1056.73 करोड़ रुपए मिले थे, 2019 में 5071.99 करोड़ रु. और 2020 में 363.96 करोड़ रुपए मिले।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र नई दिल्ली | Updated: November 21, 2020 8:23 AM
SBI, Political Partiesसूत्रों के मुताबिक, राजनीतिक दलों को गुप्त रुप से फंडिंग के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड्स सबसे बेहतर विकल्प हैं, इसलिए बड़े कॉरपोरेट हाउस इन्हीं के जरिए दान देते हैं। (फाइल फोटो)

बिहार चुनाव से ठीक पहले अक्टूबर में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने राजनीतिक पार्टियों को फंड करने वाले 282 करोड़ रुपए के इलेक्टोरल बॉन्ड्स की बिक्री की। इसी के साथ 2018 में शुरू हुई इस स्कीम के जरिए अब तक राजनीतिक दलों को 6493 करोड़ रुपए का चंदा मिल चुका है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की तरफ से दायर आरटीआई से मिली जानकारी में सामने आया है कि बैंक ने 19 अक्टूबर से 28 अक्टूबर तक जारी किए गए इलेक्टोरल बॉन्ड्स की शृंखला में 1 करोड़ रुपए कीमत के करीब 279 बॉन्ड्स की बिक्री की, साथ ही 10 लाख रुपए के 32 बॉन्ड्स बेचे।

डेटा के मुताबिक, एसबीआई की मुंबई स्थित मेन ब्रांच ने 14वीं शृंखला में 130 करोड़ रुपए के बॉन्ड्स जारी किए, वहीं नई दिल्ली ब्रांच ने सिर्फ 11.99 करोड़ के बॉन्ड्स ही जारी किए। पटना स्थित एसबीआई ब्रांच में सिर्फ 80 लाख रुपए की कीमत के बॉन्ड्स की ही बिक्री हुई, जबकि बेंगलुरु ब्रांच से बॉन्ड्स की बिक्री नहीं हुई। इसके अलावा तीन शहरों में 237 करोड़ रुपए के बॉन्ड्स का नकदीकरण कराया गया। इनमें भुवनेश्वर से 67 करोड़, चेन्नई से 80 करोड़ और हैदराबाद से 90 करोड़ के बॉन्ड्स तुड़वाए गए।

क्या हैं इलेक्टोरल बॉन्ड्स?: इलेक्टोरल बॉन्ड्स मुख्य तौर पर राजनीतिक दलों की फंडिंग के लिए ही लाए गए हैं। इन्हें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा 1000 रु, 10,000 रुपए, 1 लाख रुपए, 10 लाख रुपए और 1 करोड़ रुपए के मूल्यवर्ग में जारी किया जाता है। इसे लोग अज्ञात तौर पर खरीद सकते हैं और राजनीतिक दलों को दान कर सकते हैं। इनकी अवधि जारी होने के बाद से 15 दिन की होती है। इन बॉन्ड्स का फायदा सिर्फ एक योग्य राजनीतिक दल ही ले सकता है। इसके लिए बॉन्ड्स को अधिकृत बैंक के नामित अकाउंट में जमा कराना होता है। यानी जो बॉन्ड लोग बैंक से खरीद कर राजनीतिक पार्टियों को देते हैं, वह बॉन्ड राजनीतिक पार्टियां वापस बैंक को बेच देती हैं।

एसबीआई ने आरटीआई के जवाब में बताया कि 14वीं शृंखला के बॉन्ड्स की बिक्री पूरी होने के साथ ही पिछले तीन सालों में डोनर्स अब तक 6493 करोड़ रुपए का चंदा राजनीतिक दलों को इसी के जरिए दे चुके हैं। पहले साल यानी 2018 में पार्टियों को इसके जरिए 1056.73 करोड़ रुपए मिले थे, 2019 में 5071.99 करोड़ रुपए और 2020 में 363.96 करोड़ रुपए।

किसे मिल सकता है इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए चंदा?: इलेक्टोरल बॉन्ड्स के जरिए सिर्फ उन्हीं राजनीतिक दलों को चंदा मिल सकता है, जो रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1951 के सेक्शन 29ए के अंतर्गत रजिस्टर्ड हों और पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में एक फीसदी से कम वोट न हासिल किए हों। सिर्फ ऐसे राजनीतिक दल ही इलेक्टोरल बॉन्ड्स के नकदीकर के लिए करंट अकाउंट खुलवा सकते हैं।

कॉरपोरेट सूत्रों के मुताबिक, इलेक्टोरल बॉन्ड्स के खरीदारों में मुंबई के बड़े बिजनेस हाउस भी आते हैं, क्योंकि इनके जरिए राजनीतिक दलों को गुप्त रूप से फंडिंग मुहैया कराई जा सकती है। दरअसल, इलेक्टोरल बॉन्ड्स पर एसबीआई की गाइडलाइंस कहती हैं कि बॉन्ड्स खरीदने वालों की पहचान बैंक गुप्त रखेगा और इसका खुलासा किसी भी प्राधिकरण के सामने नहीं किया जाएगा। सिर्फ कोर्ट के आदेश और कानूनी एजेंसी द्वारा आपराधिक केस दायर करने के दौरान मांग पर ही इसका पहचान का खुलासा हो सकता है।

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