देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठ रहे हैं। इस बीच चुनाव आयोग ने उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘विशेष अभियान’ चलाने का निर्देश दिया है जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसका मकसद मतदाता सूची में छूट गए लोगों के नाम जोड़ना है।
द इंडियन एक्सप्रेस को मिली जानकारी के मुताबिक, चुनाव आयोग ने यह निर्देश 29 सितंबर को लिखित रूप में दिया था। गुरुवार को सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) के साथ हुई वीडियो कॉन्फ्रेंस में भी इसे दोहराया गया। जांच में यह भी सामने आया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में 14 बार आयोग के नाम पर लिए गए कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी। दोनों ने कहा था कि इन फैसलों की जानकारी उन्हें नहीं थी।
इन फैसलों में Form 6 में बदलाव भी शामिल था। Form 6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में जोड़ने के लिए किया जाता है। इसके अलावा, ECINet के केंद्रीकृत नियंत्रण को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई थी। ECINet वह सॉफ्टवेयर है जिस पर SIR के दौरान मतदाता सूचियां तैयार की गईं और अब सभी मतदाता सूचियां इसी सिस्टम पर मौजूद हैं।
नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान
चुनाव आयोग के 29 सितंबर के पत्र के मुताबिक, जिन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां छूटे हुए और नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा।
सभी मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि इस अभियान के तहत लगातार मतदाता सूची अपडेट करने की प्रक्रिया के जरिए छूटे हुए लोगों और 18 साल की उम्र पूरी कर चुके नए मतदाताओं के नाम जोड़े जाएंगे।
इस अभियान में Form 6 के पुराने और सामान्य फॉर्म का इस्तेमाल होगा। जुलाई में Form 6 में एक नया सवाल जोड़ा गया था। इसमें आवेदकों से पूछा जाता था कि क्या वे या उनके माता-पिता पिछली SIR के बाद की मतदाता सूची में शामिल थे। इस सवाल का जवाब देना जरूरी था। इससे ऐसी स्थिति बन गई थी कि अगर किसी 18 साल के व्यक्ति के माता-पिता का नाम मतदाता सूची से हट गया हो, तो उसके पास सही जवाब देने का रास्ता नहीं बचता था।
नियमों में बदलाव करके ही Form 6 में ऐसा बदलाव किया जा सकता है। चुनाव आयोग के दोनों आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मई में इस पर आपत्ति जताई थी। संधू ने अगस्त में इस बदलाव को ‘अनधिकृत/गैरकानूनी’ भी बताया था।
अब 29 सितंबर के पत्र में स्पष्ट किया गया है कि यह नया घोषणा वाला हिस्सा सिर्फ SIR के दौरान ही लागू होगा। इसका मतलब है कि जिन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR पूरी हो चुकी है, वहां पहली बार वोट देने वाले और मतदाता सूची में छूट गए लोग सामान्य Form 6 भरकर अपना नाम जुड़वा सकेंगे।
चुनाव आयोग की बैठक में लिए गए फैसले
गुरुवार को सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) के साथ हुई वीडियो कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग ने इस अभियान को लेकर कुछ और निर्देश दिए। बैठक में मौजूद अधिकारियों के मुताबिक, उप चुनाव आयुक्त ने CEOs से कहा कि SIR से पहले और SIR के बाद की मतदाता सूचियों की तुलना की जाए।
इसके बाद जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनकी सूची तैयार करने और यह पता लगाने को कहा गया है कि इनमें से कोई व्यक्ति गलती से तो नहीं छूट गया।
एक अधिकारी के मुताबिक, अधिकारियों से कहा गया है कि ऐसे मतदाताओं के घर जाकर जानकारी ली जाए खासकर उन मामलों में जहां उनका नाम किसी दूसरी जगह दर्ज नहीं है, वे डुप्लीकेट मतदाता नहीं हैं और उनकी मृत्यु भी नहीं हुई है। ऐसे लोगों से Form 6 भरवाने को कहा गया है।
इस काम में राजनीतिक दलों और उनके बूथ लेवल एजेंटों की मदद लेने के लिए भी CEOs को कहा गया है। चुनाव आयोग ने सभी CEOs से कहा है कि अगर किसी व्यक्ति का नाम गलती से मतदाता सूची से हट गया है तो उसे Form 6 के जरिए दोबारा जोड़ा जाए। यही प्रक्रिया गोवा में भी अपनाई जानी है।
गोवा की अंतिम मतदाता सूची में 21 फरवरी को 97 ऐसे लोगों के नाम शामिल नहीं थे जिन्हें राज्य के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) ने पात्र पाया था। इन लोगों के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए थे। बाद में उन्होंने जरूरी दस्तावेज दिए और EROs ने उन्हें दोबारा शामिल करने की मंजूरी दे दी।
लेकिन EROs ने पाया कि ECINet में हटाए गए नाम को वापस जोड़ने का कोई विकल्प ही नहीं था। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इस समस्या को लेकर सात दिनों में आयोग को आठ बार पत्र भेजे थे। इन पत्रों की कॉपी DG (IT) सीमा खन्ना को भी भेजी गई थी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद 97 लोगों के नाम शामिल किए बिना ही अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी गई।
यह वही मुद्दा था जिस पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने 14 अगस्त को लिखित आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि कानून के मुताबिक मतदाता सूची से जुड़े सभी काम की जिम्मेदारी EROs, DEOs और CEOs की होती है। इसके बावजूद ECINet का एक्सेस कंट्रोल DG (IT) के पास केंद्रीकृत कर दिया गया है।
संधू ने कहा था कि DG (IT) को कानून के तहत काम करने वाले इन अधिकारियों की जरूरी पहुंच और स्वतंत्रता को सीमित करने का अधिकार नहीं है।
इससे पहले मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने भी मतदाता सूची के डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकृत होने पर सवाल उठाया था। उन्होंने इसके ऑडिट की मांग की थी। इन दोनों आपत्तियों पर 26 सितंबर की आयोग की बैठक तक कोई जवाब नहीं दिया गया था। 29 सितंबर का पत्र इसी बैठक के तीन दिन बाद जारी किया गया। 26 सितंबर की बैठक अप्रैल के बाद चुनाव आयोग की दूसरी पूर्ण बैठक थी।
बैठक में आयोग ने फैसला किया था कि जिन मतदाताओं को ‘अनमैप्ड’ या ‘लॉजिकल गड़बड़ी’ के कारण नोटिस दिया गया है, उन्हें सुनवाई के लिए खुद उपस्थित होने की जरूरत नहीं होगी।
आयोग ने यह भी तय किया कि ECINet की समीक्षा एक कमेटी करेगी जिसमें IIT या IIIT का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल होगा। इसके अलावा, फील्ड अधिकारियों को सॉफ्टवेयर में जिस भी अतिरिक्त सुविधा की जरूरत होगी, उसे उपलब्ध कराया जाएगा।
29 सितंबर के पत्र में राज्यों को सुनवाई से जुड़े इस बदलाव की जानकारी दी गई है। पत्र की एक कॉपी DG (IT) को भी भेजी गई है ताकि ECINet में जरूरी बदलाव किए जा सकें।
पत्र में Form 6 को लेकर भी स्थिति साफ कर दी गई है। इसमें कहा गया है कि Form 6 के साथ जो अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी, वह केवल SIR के दौरान ही इस्तेमाल होगी। SIR खत्म होने के बाद 1960 के Registration of Electors Rules के तहत लागू सामान्य फॉर्म का इस्तेमाल किया जाएगा।
महाराष्ट्र में जल्दबाजी में नाम नहीं हटेंगे
गुरुवार को चुनाव आयोग की सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के साथ हुई बैठक के बाद महाराष्ट्र में मतदाता सूची को लेकर अधिकारियों को खास निर्देश दिए गए हैं। महाराष्ट्र फिलहाल सबसे बड़ा राज्य है जहां SIR की प्रक्रिया अभी जारी है।
महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने गुरुवार को मुंबई शहर और मुंबई उपनगर के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) को निर्देश दिया कि किसी भी मतदाता का नाम जल्दबाजी में सूची से न हटाया जाए।
निर्देश में कहा गया है कि किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे जरूरी दस्तावेज जमा करने का पूरा मौका दिया जाए। इसके बाद उसकी सुनवाई की जाए और सभी जानकारी की जांच करने के बाद ही फैसला लिया जाए। अधिकारियों से कहा गया है कि कोई भी पात्र मतदाता मतदाता सूची से बाहर नहीं रहना चाहिए और उसके वोट देने के अधिकार में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए।
EROs को यह भी निर्देश दिया गया है कि जल्दबाजी में किसी के खिलाफ फैसला ना लें और अपने स्तर पर सभी दस्तावेज और जानकारी की पूरी जांच करने के बाद ही नाम हटाने का फैसला करें।
महाराष्ट्र में SIR: नोटिस वाले मतदाताओं को घर पर दस्तावेज देने की सुविधा
महाराष्ट्र सरकार का यह निर्देश चुनाव आयोग के 26 सितंबर के फैसले के बाद जारी किया गया है। इसके तहत जिन मतदाताओं को ‘अनमैप्ड’ या ‘लॉजिकल गड़बड़ी’ के कारण नोटिस मिला है, उन्हें सुनवाई के लिए खुद अधिकारी के सामने जाने की जरूरत नहीं होगी।
बूथ लेवल अधिकारी (BLO) ऐसे मतदाताओं के घर जाकर जरूरी दस्तावेज लेंगे और उन्हें ऑनलाइन अपलोड करेंगे। इसके बाद निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) दस्तावेजों की जांच कर फैसला लेंगे।
जिन मतदाताओं को पहले ही सुनवाई के लिए बुलाया जा चुका है, उन्हें फोन या WhatsApp के जरिए बताया जाएगा कि उन्हें सुनवाई के लिए आने की जरूरत नहीं है। दस्तावेज जमा करने के लिए 3, 4, 10 और 11 अक्टूबर को विशेष कैंप भी लगाए जाएंगे।
अगर BLO की जांच के बाद भी किसी मामले में स्थिति साफ नहीं होती है तो मतदाता को दस्तावेज जमा करने का एक और मौका दिया जाएगा। इसके बाद ही सुनवाई होगी और आदेश जारी किया जाएगा। इसके बाद ही किसी मतदाता का नाम सूची से हटाया जा सकेगा।
महाराष्ट्र की ड्राफ्ट मतदाता सूची में 1.22 करोड़ रिकॉर्ड को जांच के लिए चिन्हित किया गया था। इनमें करीब 62.48 लाख मामले रिश्तेदारों की जानकारी में गड़बड़ी से जुड़े हैं जबकि 59.75 लाख मतदाताओं का नाम पिछली मतदाता सूची में किसी रिश्तेदार से मैप नहीं हो पाया। नोट में कहा गया है कि ECINet और BLO App में जरूरी बदलाव अभी चुनाव आयोग के स्तर पर किए जा रहे हैं।
