Election Commission Meeting Decision: भारतीय चुनाव आयोग के भीतर कामकाज की शैली और निर्णयों को लेकर छिड़ा आंतरिक विवाद अब एक बड़े प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक बदलाव के संकेत दे रहा है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की इनवेस्टिगेशन रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए चार पन्नों का दिशा-निर्देश जारी किया है, जिसमें नौ महत्वपूर्ण संगठनात्मक और तकनीकी फैसले शामिल हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, दो अन्य चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू के तीन सदस्यीय आयोग के भीतर उत्पन्न हुई इस असहज स्थिति ने न केवल देश की सर्वोच्च चुनावी संस्था की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि चुनावी शुचिता को लेकर जारी राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है।

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद

पूरे विवाद की जड़ में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा दर्ज कराई गई कम से कम 14 लिखित आपत्तियां हैं। दोनों आयुक्तों ने मतदाता सूची के रखरखाव, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नामों को हटाने व बहाल करने तथा आईटी सिस्टम के नियंत्रण जैसे अति-संवेदनशील विषयों पर सवाल उठाए थे।

हालांकि, शुरुआत में चुनाव आयोग ने इन आपत्तियों को केवल सामान्य बातचीत के तहत मिले सुझाव और इनपुट का नाम दिया था और दावा किया था कि पिछले एक साल के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

चार पन्नों का नोट और 9 बड़े फैसले

शनिवार को हुई चुनाव आयोग की उच्चस्तरीय बैठक के बाद जारी चार पन्नों का नोट इस बात का प्रमाण है कि आंतरिक चिंताओं को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आयोग द्वारा घोषित नौ नए नियमों के अनुसार, अब प्रत्येक बैठक से पहले औपचारिक एजेंडा प्रसारित किया जाएगा और बैठक समाप्त होने पर मिनट्स जारी किए जाएंगे।

इसके अलावा, अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए पूरी पीठ की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है तथा नए आईटी मॉड्यूल व पोर्टल लॉन्च करने से पहले अधिकारियों की विशेष समिति से जांच कराना तय किया गया है।

निष्पक्ष समीक्षा के लिए IIT की मदद

तकनीकी पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से ECINet की समीक्षा के लिए वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अगुवाई में एक समिति गठित की जाएगी, जिसमें आईआईटी (IIT) या आईआईआईटी (IIIT) के एक स्वतंत्र विशेषज्ञ को शामिल किया जाएगा।

यह कदम दोनों आयुक्तों द्वारा 10 महीनों में जताई गई उन शिकायतों से सीधे तौर पर मेल खाता है, जिनमें बिना जानकारी के नए आईटी मॉड्यूल बनाने, डेटाबेस के ऑडिट की जरूरत, और मैदानी अधिकारियों को ERONet तक पूर्ण पहुंच न मिलने की बात कही गई थी। साथ ही, अब आयुक्तों के निर्देशों का अधिकारियों द्वारा कड़ाई से अनुपालन किया जाना अनिवार्य कर दिया गया है।

गोवा और पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची का विवाद

यह प्रशासनिक खींचतान केवल कागजी नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर जमीनी स्तर पर मतदाताओं की स्थिति पर पड़ रहा है। गोवा में स्थानीय अधिकारियों द्वारा स्वीकृत 97 मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची से गायब पाए गए थे, जिनमें से 81 से अब फॉर्म 6 भरवाकर मुख्य निर्वाचन अधिकारी को प्रक्रिया सुगम बनाने का निर्देश दिया गया है।

वहीं, पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए मतदाताओं के खिलाफ अपीलों के अधिकार को लेकर विवाद बना हुआ है। विपक्षी दलों द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) सूचियों पर सवाल उठाते हुए चुनाव रद्द करने की मांग ने मामले को और गंभीर बना दिया है।

ऑनलाइन फॉर्म 6 और विवादित सवाल पर बरकरार सस्पेंस

आयोग द्वारा दी गई रियायतों के बावजूद फॉर्म 6 का मुद्दा पूरी तरह सुलझता नजर नहीं आ रहा है। नए नोट में कहा गया है कि पंजीकरण नियमों के तहत तय फॉर्म एसआईआर अवधि के बाहर लागू होगा, लेकिन यह ECINet पर मौजूद उस ऑनलाइन फॉर्म पर खामोश है जिसमें माता-पिता से जुड़ा एक अनिवार्य सवाल जोड़ दिया गया था।

चुनाव आयुक्त संधू द्वारा 13 अगस्त को “अवैध” ठहराए जाने के बावजूद यह सवाल जुलाई से ऑनलाइन सिस्टम में क्यों बना रहा और इसे किसने जोड़ा, इसका जवाब अब भी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही और अनुत्तरित सवाल

आयोग के ताजा स्पष्टीकरण से कई प्रशासनिक सवाल भी अनसुलझे रह गए हैं। उदाहरण के तौर पर, गोवा में मतदाताओं के नाम तुरंत बहाल करने वाली सॉफ्टवेयर सुविधा को कभी चालू क्यों नहीं किया गया, इसका कोई उल्लेख नहीं है। इसके अलावा जिन अधिकारियों के कामकाज पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताते हुए कार्रवाई की मांग की थी, उनमें महानिदेशक (आईटी) सीमा खन्ना और वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग का नाम है। उनकी भूमिका और पद पर बने रहने को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के लिए नेतृत्व की परीक्षा

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुवाई में तीन सदस्यीय आयोग के लिए यह स्थिति एक बड़ी संगठनात्मक और नैतिक परीक्षा जैसी है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी बहु-सदस्यीय आयोग पर होती है, जहां सर्वसम्मति और पारदर्शिता ही संस्था की साख को बनाए रखती है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नए नियमों के लागू होने के बाद दोनों आयुक्तों को नीतिगत फैसलों में कितनी वास्तविक भागीदारी मिलती है।

चुनावी पारदर्शिता और भारतीय लोकतंत्र पर इसका प्रभाव

भारतीय चुनाव आयोग में आया यह अभूतपूर्व मोड़ देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही स्थापित करने की दिशा में एक अहम पड़ाव है। मतदाताओं के डेटाबेस का स्वतंत्र ऑडिट, तकनीकी प्रणालियों पर आयोग का सीधा नियंत्रण, और फैसलों का लिखित रिकॉर्ड रखना लोकतंत्र के प्रति आम जनता के विश्वास को मजबूत करता है। आने वाले समय में ये नौ सुधार आयोग के भीतर संतुलन कायम करने के साथ-साथ आगामी चुनावों की निष्पक्षता सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।

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स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों पर चुनाव आयोग के चुनाव आयुक्तों ने शनिवार को एक बैठक की। दोपहर तीन बजे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त डॉ. एस. एस. संधू और डॉ. विवेक जोशी ने नई दिल्ली के निर्वाचन सदन में बैठक की। पढ़िए पूरी खबर…