जुलाई में दक्षिण-पश्चिम मानसून के फिर से सक्रिय होने से खरीफ फसलों की बुवाई में काफी तेजी आई है। यह तब हुआ है जब अल-नीनो का असर भी लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि इस साल खरीफ फसलों की बुवाई का अंतर पिछले साल की तुलना में काफी कम हो गया है।

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 6 जुलाई तक देश में खरीफ सीजन के दौरान 350.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई थी। पिछले साल इसी अवधि में 442.80 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी। यानी इस बार बुवाई का रकबा पिछले साल के मुकाबले 20.8% कम रहा।

सबसे ज्यादा कमी तिलहन फसलों की बुवाई में देखी गई जो 39.3% कम रही। इसके अलावा दलहन की बुवाई 21.8% और कपास की 23% कम रही।

गौर करने वाली बात है कि भारत ने साल 2025-26 में तिलहन, दलहन और कपास जैसी इन तीन प्रमुख कृषि वस्तुओं के आयात पर करीब 25 अरब डॉलर खर्च किए थे। अगर अल-नीनो का असर बढ़ता है तो चालू वित्त वर्ष में यह आयात और ज्यादा बढ़ सकता है।

बुवाई में यह कमी मानसून की धीमी शुरुआत की वजह से हुई। जून से सितंबर तक चलने वाले मानसून में जून महीने के दौरान पूरे देश में सामान्य औसत (एलपीए) की तुलना में 38% कम बारिश दर्ज की गई।

आमतौर पर जून में करीब तीन निम्न दबाव (लो-प्रेशर) सिस्टम बनते हैं जो लगभग 11 दिनों तक बारिश कराते हैं। लेकिन इस बार जून में एक भी लो-प्रेशर सिस्टम नहीं बना। यही वजह रही कि 1901 के बाद यह भारत का छठा सबसे सूखा जून साबित हुआ। इससे पहले 2014, 2009, 1926, 1923 और 1905 में जून में इससे भी कम बारिश हुई थी।

गौर करने वाली बात यह है कि जून में बारिश की इतनी कमी तब दर्ज की गई जब अल-नीनो केवल शुरू ही हुआ था और उसका असर कमज़ोर से मध्यम स्तर का था।

जुलाई में बेहतर रहा मानसून

जुलाई में अल-नीनो का असर बढ़कर मध्यम से मजबूत स्तर तक पहुंच गया। इसके बावजूद इस महीने मानसून ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। आमतौर पर जुलाई में तीन निम्न दबाव (लो-प्रेशर) सिस्टम बनते हैं लेकिन इस ब ार चार सिस्टम बने। ये सिस्टम धीरे-धीरे आगे बढ़े और लंबे समय तक सक्रिय रहे। इसलिए सामान्य 14 दिनों के बजाय करीब 24 दिनों तक इनका असर रहा।

इसी वजह से जुलाई में पूरे देश में सामान्य औसत (एलपीए) से 2.4 प्रतिशत ज्यादा बारिश दर्ज की गई। यह भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के उस अनुमान के विपरीत था जिसमें जुलाई में सामान्य से कम (एलपीए के 94% से कम) बारिश की संभावना जताई गई थी।

जुलाई में मानसून के इस सुधार ने खरीफ फसलों की बुवाई को तेज कर दिया। महीने के आखिर तक 894.22 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हो चुकी थी जो पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में केवल 2.9 प्रतिशत कम थी। इसके अलावा, दलहन की बुवाई में कमी घटकर 6.3 प्रतिशत और कपास में 2.4 प्रतिशत रह गई। वहीं तिलहन खासकर मूंगफली और तिल की बुवाई पिछले साल से भी ज्यादा हो गई।

महाराष्ट्र के लातूर के प्रमुख दाल कारोबार नितिन कलंत्री ने कहा, ”जुलाई के तीसरे और चौथे सप्ताह में हुई बारिश ने ना केवल नई बुवाई को बढ़ावा दिया बल्कि पहले से बोई गई फसलों के लिए भी ‘अमृत वर्षा’ साबित हुई। नमी की कमी से जूझ रही फसलों को इससे नई जान मिली। अगर यह बारिश नहीं होती तो पौधों की जड़, तना और पत्तियों का विकास प्रभावित हो सकता था।”

सोयाबीन की बुवाई और फसल की स्थिति में भी अच्छा सुधार देखने को मिला है।

इंदौर के सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक डी.एन. पाठक के अनुसार, ”कुल मिलाकर सोयाबीन की फसल की स्थिति सामान्य से अच्छी है। अधिकतर इलाकों में पौधों का विकास बेहतर हो रहा है और खेतों के निरीक्षण में अब तक किसी बड़े कीट या बीमारी का प्रकोप नहीं मिला है।”

लेकिन अभी खतरा टला नहीं है

खरीफ फसलों के लिए सिर्फ जुलाई की अच्छी बारिश ही काफी नहीं है। अगस्त और सितंबर की शुरुआत में भी अच्छी बारिश जरूरी होती है क्योंकि इसी दौरान फसलों में फूल आने और दाने/फलियां बनने की प्रक्रिया होती है। यही आखिर में उत्पादन (उपज) तय करती है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अनुमान लगाया है कि 13 अगस्त के आसपास उत्तर बंगाल की खाड़ी और पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश तट के पास एक नया लो-प्रेशर सिस्टम (निम्न दबाव क्षेत्र) बनेगा। इससे अगस्त के तीसरे सप्ताह तक मानसून के सक्रिय बने रहने की संभावना है। हालांकि इसके बाद मौसम के मिजाज़ को लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है।

दुनिया की अधिकतर मौसम एजेंसियों का मानना है कि प्रशांत महासागर (पेरू और इक्वाडोर के तट के पास) का समुद्री तापमान लगातार बढ़ेगा और अक्टूबर से दिसंबर के बीच अल-नीनो बहुत मजबूत रूप ले सकता है। इतना ही नहीं, इसके मार्च 2027 तक बने रहने की भी संभावना है।

इसका क्या असर होगा?

इस स्थिति के दो बड़े असर हो सकते हैं। पहला- अल-नीनो का बारिश और तापमान पर पूरा प्रभाव तुरंत नहीं दिखता। इसका असर 1-2 महीने की देरी से शुरू होता है और 5-6 महीने या उससे अधिक समय तक रह सकता है यानी बारिश में कमी का सबसे बड़ा असर अभी आना बाकी हो सकता है।

दूसरा, अगर अल-नीनो और मजबूत होता है तो तापमान भी बढ़ेगा। इसका सबसे ज्यादा नुकसान रबी (सर्दियों) की फसलों को हो सकता है। गेहूं, सरसों और आलू जैसी फसलों के लिए ठंडी और लंबी सर्दी बेहतर मानी जाती है। अगर सर्दी छोटी और गर्म रही तो इनकी पैदावार प्रभावित हो सकती है।

कुल मिलाकर कहें तो जून में बेहद कम बारिश के बावजूद खरीफ फसलों की स्थित अब पहले जितनी खरा नहीं दिख रही है। लेकिन रबी सीजन पर अल-नीनो का खतरा अभी भी बना हुआ है।

वैश्विक खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी

इस बीच संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक जुलाई में साढ़े तीन साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। यह सूचकांक जुलाई में 131.1 अंक पर पहुंच गया, जो जुलाई 2025 की तुलना में 1% अधिक है। यह जनवरी 2023 (131.4 अंक) के बाद सबसे ऊंचा स्तर है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी मुख्य वजह एल नीनो, यूरोप में हाल की भीषण गर्मी से फसल उत्पादन में कमी और पश्चिम एशिया व यूक्रेन में जारी संघर्षों के कारण सप्लाई में रुकावट है। हालांकि FAO के आंकड़ों को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि सबसे ज्यादा बढ़ोतरी वनस्पति तेल की कीमतों में हुई है।

वनस्पति तेल सूचकांक जुलाई में 195.7 अंक पर पहुंच गया जो पिछले साल की तुलना में 17.3% अधिक है और जून 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है। अनाज का सूचकांक 6.9% बढ़ा जबकि डेयरी उत्पादों का सूचकांक 24.8% और चीनी का 8% घट गया। मांस की कीमतों में केवल 0.8% की मामूली बढ़ोतरी हुई।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या है?

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतें हैं। इसकी एक बड़ी वजह ह है कि पाम, रेपसीड (सरसों) और सोयाबीन तेल का इस्तेमाल अब खाद्य पदार्थों के बजाय बायोफ्यूल बनााने में ज्यादा होने लगा है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (पेट्रोलियम) की कीमतें बढ़ती हैं तो इन खाद्य तेलों से बायोडीजल बनाना ज्यादा फायदेमंद हो जाता है। इससे खाने के तेल की वैश्विक आपूर्ति घटती है और कीमतें बढ़ जाती हैं।

भारत के लिए राहत की बात

अच्छी बात यह है कि सरकार के पास फिलहाल चावल, गेहूं और दालों का पर्याप्त भंडार मौजूद है। 1 जुलाई तक सरकार के गोदामों में 9.26 करोड़ टन (92.6 मिलियन टन) चावल और गेहूं का स्टॉक था जबकि न्यूनतम जरूरत 4.11 करोड़ टन की ही थी। इसके अलावा 40 लाख टन (4 मिलियन टन) से ज्यादा दालों का भी सरकारी भंडार मौजूद है।

जरूरत पड़ने पर सरकार इन भंडारों को खुले बाजार में जारी कर खाद्य महंगाई को नियंत्रित कर सकती है।

भारत में अचानक आने वाली बाढ़ के मामले क्यों बढ़ रहे हैं? 

हिमाचल प्रदेश में व्यास नदी का उफान, 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2023 में सिक्किम की ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), असम में कई दशकों में आई विनाशकारी बाढ़ या फिर दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में कुछ घंटों की बारिश के बाद सड़कों का दरिया बन जाना- पिछले कुछ सालों में भारत में ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। इन सभी घटनाओं में एक समान बात है कि बहुत कम समय में इतनी अधिक बारिश हुई कि नदियां, नाले और ड्रेनेज सिस्टम उसका दबाव नहीं झेल सके। पढ़ें पूरी खबर…