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खुद को मुख्यमंत्री के बराबर मानते हैं खड़से

मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए राजस्व मंत्री एकनाथ खड़से अक्सर अपनी मर्जी से घोषणाएं कर मुख्यमंत्री के लिए परेशानियां खड़ी करते रहे हैं। खड़से मुख्यमंत्री नहीं हैं, मगर खुद को मुख्यमंत्री से कम नहीं समझते हैं। सोमवार को विधान परिषद में चर्चा के दौरान वे यह कहने से नहीं चूके कि मुख्यमंत्री नहीं बना तो क्या […]

मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए राजस्व मंत्री एकनाथ खड़से अक्सर अपनी मर्जी से घोषणाएं कर मुख्यमंत्री के लिए परेशानियां खड़ी करते रहे हैं। खड़से मुख्यमंत्री नहीं हैं, मगर खुद को मुख्यमंत्री से कम नहीं समझते हैं। सोमवार को विधान परिषद में चर्चा के दौरान वे यह कहने से नहीं चूके कि मुख्यमंत्री नहीं बना तो क्या हुआ, मुख्यमंत्री के बराबर होना कम बात नहीं है।

कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष माणिकराव ठाकरे के सवाल का जवाब देते हुए उबल पड़े खड़से के दिल की बात जुबान पर आ ही गई और उन्होंने ठाकरे को ताना मारते हुए कहा, ‘मैं विधान परिषद का नेता हूं। मेरे पास 12 मंत्रालय हैं। मुख्यमंत्री नहीं बना तो क्या हुआ, मुख्यमंत्री के बराबर होना कम बात नहीं है। आपको तो जनता ने नकार दिया है।’

फडणवीस सरकार के अनुभवी मंत्रियों में खड़से का शुमार होता है। सरकार में मुख्यमंत्री समेत दो दर्जन मंत्रियों को पहली बार मंत्री बनने का मौका मिला है। मंत्रिमंडल के जिन आधा दर्जन मंत्रियों को कामकाज का अनुभव है उनमें खड़से भी एक हैं। खड़से 1995 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना की सरकार में वित्त और योजना विभाग संभाल चुके हैं। हालिया संपन्न विधानसभा चुनाव के बाद खड़से को मुख्यमंत्री बनने की पूरी उम्मीद थी। इसलिए जब देवेंद्र फडणवीस का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर घोषित किया गया था, तो खड़से रूठकर कमरे में जाकर बैठ गए। बड़ी मुश्किल से उन्हें मना कर लाया गया था।

खड़से अनुभवी हैं जबकि देवेंद्र फडणवीस को पहले से मंत्री पद का कोई अनुभव नहीं है। यही वजह है कि खड़से जब-तब फडणवीस पर हावी होने की कोशिशें करते रहे हैं। शीतकालीन सत्र की पूर्व संध्या पर खड़से ने बिना मुख्यमंत्री से विचार-विमर्श किए राज्य की विकास योजनाओं में 40 फीसद कटौती की घोषणा कर दी। इससे फडणवीस नाराज हो गए थे और उन्होंने दिल्ली में इसकी शिकायत भी की थी। फडणवीस का कहना था कि खड़से खुद फैसले लेकर उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। किस विभाग ने कितनी रकम खर्च की, सरकार इसका अनुमान लगा ही रही थी कि खड़से ने झटपट योजनाओं में 40 फीसद कटौती की घोषणा कर डाली जबकि न तो उनका योजना विभाग से कोई संबंध था, न वित्त विभाग से।

शिकायत होने के बावजूद खड़से की घोषणाएं बंद होने का नाम नहीं ले रही हैं। सोमवार को उन्होंने विधान परिषद में घोषणा कर डाली कि पुणे, ठाणे, पिंपरी चिंचवड जैसे शहरों में जो अनाधिकृत निर्माण हुए हैं उन्हें दंड लगाकर कानूनी बनाया जाएगा। वन जमीन पर 2005 से पहले हुए अतिक्रमणों को पट्टे दिए जाएंगे। खड़से ने बिना विचार-विमर्श किए खुद गैरकानूनी निर्माणों को कानूनी करने के नीतिगत मामले में घोषणा कर दी। जबकि अदालत ने अक्तूबर 2013 के अपने फैसले में मुंबई महानगरपालिका को निर्देश दिया था कि वह गैरकानूनी निर्माण पर कठोर कार्रवाई करे।

ऐसा ही फैसला अभी हाल ही में आया है जिसमें अवैध झोपड़पट्टियों को रोकने का निर्देश हाई कोर्ट ने दिया है। यही नहीं पूर्ववर्ती कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की आघाड़ी सरकार के मुख्यमंत्री ने 29 नवंबर 2011 की बैठक में स्पष्ट किया था कि गैरकानूनी निर्माण को आगे संरक्षण नहीं दिया जाएगा। लेकिन खड़से ने इन फैसलों को हाशिए पर रखते हुए सोमवार को गैरकानूनी निर्माण को दंड लगाकार कानूनी करने की घोषणा कर डाली। खड़से शायद भूल गए कि राज्य और खासकर मुंबई जैसे शहर में गैरकानूनी निर्माण किस तरह से आम आदमी और प्रशासन के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं। बिना मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह के खड़से का इस तरह से घोषणा करना फडणवीस के लिए कभी भी मुसीबत का कारण बन सकता है। यही कारण था कि फडणवीस ने खड़से को वक्त पर संभालने के लिए केंद्रीय नेतृत्व से उनकी शिकायत की थी। लेकिन खड़से अपनी राह चल रहे हैं।

सरकार में सिर्फ अनुभवी खड़से ही नहीं बल्कि नए-नए मंत्री भी मुख्यमंत्री के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं। सोमवार को प्रश्नोत्तर के दौरान उल्लास नदी के पानी की कटौती को लेकर एक सवाल का जवाब देने में जल आपूर्ति मंत्री बबनराव लोणीकर गड़बड़ी कर गए। मंत्री महोदय की हालत देखकर खुद मुख्यमंत्री को खड़े होकर सवाल का जवाब देना पड़ा।

 

 

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