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पीएम मोदी की चमक फीकी पड़ रही है? विदेशी निवेशकों ने भारत से निकाले 3300 करोड़ रुपये

निवेशकों का कहना है कि उन्हें आवश्यक सुधारों की एक लंबी सूची पर काम करना है। हालांकि इन सुधारों की रफ्तार काफी धीमी है। इन सुधारों में राज्य के स्वामित्व वाली कंपनियों में हिस्सेदारी को बेचना के साथ ही देश के श्रम कानूनों में सुधार को लागू करना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

मोदी सरकार के पिछले 6 साल के कार्यकाल के दौरान विदेशी निवेशकों का भारत में निवेश करने को लेकर रवैये में बदलाव आया है। वैश्विक निवेशकों में भारतीय शेयर बाजार से पिछले छह महीने के दौरान लगभग 3300 करोड़ रुपये (45 अरब डॉलर) निकाले हैं। पिछले साल जून से लेकर छह महीने के दौरान वैश्विक निवेशकों ने 4.5 अरब डॉलर मूल्य के शेयरों बेच दिए हैं।

खबर के अनुसार साल 1999 के बाद से एक तिमाही में यह सबसे बड़ी बिकवाली मानी जा रही है। द प्रिंट में छपी खबर के अनुसार लंदन के लोम्बार्ड ओडियर इन्वेस्टमेंट मैनेजर के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट सलमान अहमद का कहना है कि 2014 में मोदी को लेकर जो लहर थी वह अब कम हो रही है। भारत के आर्थिक विकास में लगातार पिछली पांच तिमाही से गिरावट देखने को मिल रही है।

यह मोदी के प्रधानमंत्री बनने से एक साल पहले 2013 के न्यूनतम स्तर तक पहुंच गया है। देश में कारों के साथ ही अन्य वाहनों की बिक्री में तेजी से गिरावट देखने को मिल रही है। देश में बेरोजगारी का स्तर पिछले 45 साल में सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इस बीच कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। MSCI इंडिया इंडेक्स में अगस्त 2018 के इसके सर्वकालिक उच्च स्तर से 9% की कमी हुई है। यह इंडेक्स भारतीय बाजार के लार्ज और मिडकैप सेगमेंट के प्रदर्शन को आंकता है।

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी तरह से अर्थव्यवस्था के कमजोर होने का कारण नही हैं। इसके बावजूद निवेशकों का कहना है कि उन्हें आवश्यक सुधारों की एक लंबी सूची पर काम करना है। हालांकि इन सुधारों की रफ्तार काफी धीमी है। इन सुधारों में राज्य के स्वामित्व वाली कंपनियों में हिस्सेदारी को बेचना के साथ ही देश के श्रम कानूनों में सुधार को लागू करना है।

इन सब के बीच देश के बढ़ते बजट घाटे और राज्यों के स्वामित्व वाली कंपनियों पर ऋण के अधिक देनदारी के कारण मोदी सरकार की राजकोषीय शक्तियां भी सीमित हैं। पीएम मोदी के खुद के सलाहकारों ने चेतावनी दी है कि प्रमुख सुधारों के बिना, भारत एक संरचनात्मक मंदी का सामना कर सकता है। इससे 8% की विकास दर के बनाए नहीं रखा जा सकता है। कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत में रोजगार के पर्याप्त मौके बनाए जाने की आवश्यकता है।

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