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‘क्‍वाड’ बैठक में आर्थिक करार: अमेरिकी बिसात में कहां खड़ा है भारत

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में इस मंच के जरिए अमेरिका अपनी कारोबारी मौजूदगी को मजबूती देगा।

दो सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्तियों- अमेरिका और चीन में जारी शह और मात के खेल के बीच तोक्यो में नए आर्थिक मंच – इंडो-पैसिफिक इकोनामिक फ्रेमवर्क (आइपीईएफ) के गठन का एलान कर दिया गया है। वहां चार देशों के गठबंधन ‘क्वाड’ की बैठक शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री किशिदा फुमियो की मौजूदगी में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस नए आर्थिक मंच का एलान कर दिया।

इसमें अमेरिका, भारत और जापान समेत कुल 13 देश हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में इस मंच के जरिए अमेरिका अपनी कारोबारी मौजूदगी को मजबूती देगा। इस मंच के गठन को लेकर तर्क दिया जा रहा है कि कोरोना काल में चीन से कारोबारी आपूर्ति बाधित हुई है और चीन ने अपनी शर्तें थोपीं। यही वजह है कि पूरी दुनिया इसके लिए एक ठोस विकल्प तैयार करना चाहती है। भारत भी कई बार कह चुका है कि दुनिया को एक भरोसेमंद आपूर्ति शृंखला की जरूरत है।

क्यों पड़ी जरूरत

जो बाइडेन ने पहली बार अक्तूबर 2021 में आइपीईएफ की अवधारणा का जिक्र करते हुए कहा था कि अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ इस भारत-प्रशांत आर्थिक ढांचे को विकसित करने की कोशिश करेगा। इसके जरिए हम व्यापार की सहूलियतों, डिजिटल और तकनीक में मानकीकरण, आपूर्ति शृंखला की मजबूती, कार्बन उत्सर्जन में कटौती और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े कारोबार के अपने साझा लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश करेंगे। इसे हिंद प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की विश्वसनीयता दोबारा बहाल करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

2017 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को ‘ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप’ (टीपीपी) से अलग कर लिया था। इसके बाद से इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव से असंतुलन की बात उठने लगी थी। चीन टीपीपी का सदस्य है। इसके अलावा चीन, ‘रीजनल काम्प्रिहेन्सिव इकोनामिक पार्टनरशिप’ यानी आरसीईपी का भी सदस्य है। जबकि भारत और अमेरिका दोनों इसके सदस्य नहीं हैं। भारत ने खुद को आरसीईपी से अलग कर लिया था। अमेरिका का आकलन है कि आरसीईपी के जरिए चीन ने इस क्षेत्र से प्रगाढ़ आर्थिक संबंध बना लिए। उसके बाद उसने ‘कांम्प्रिहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट फार ट्रांसपैसिफिक’ (सीपीटीपीपी) में शामिल होने के लिए अर्जी दे दी। सीपीटीपीपी में 11 देश शामिल हैं। यह टीपीपी का ही नया संस्करण है।

नियम और सवाल

आइपीईएफ में शामिल होने वाले देशों को व्यापार, श्रम मानदंडों और पर्यावरण कसौटियों के बारे में नए नियम स्वीकार करने होंगे। विकासशील देशों की नजर में यह आइपीईएफ का नकारात्मक पहलू बना रहेगा। आइईपीएफ में आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाने के नियम शामिल किए गए हैं। यह एक तरह से आपूर्ति शृंखला से चीन को बाहर करने की योजना है। लेकिन ऐसा होने पर वह आपूर्ति शृंखला भंग हो जाएगी, जिसमें आसियान देश शामिल हैं। एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या बाइडेन के राष्ट्रपति न रहने के बाद भी अमेरिका इस पहल पर कायम रहेगा? अपेक्षा के मुताबिक ही चीन ने नए अमेरिकी ढांचे की आलोचना की है।

सीपीटीपीपी और आरसीईपी से कितना अलग

कहा जा रहा है कि एशिया के दो कारोबारी मंच सीपीटीपीपी और आरसीईपी के उलट आइपीईएफ में लागत की दरें कम होंगी। इस मंच के तहत अमेरिका आपूर्ति शृंखला की मजबूती और डिजिटल आर्थिकी पर रणनीतिक सहयोग चाहता है। दरअसल, यह एक ऐसा तंत्र है, जिसके तहत अमेरिका सदस्य देशों के साथ कारोबार तो चाहता है, लेकिन खुले व्यापार के नकारात्मक पहलुओं से खुद को बचाना भी चाहता है।

खुले व्यापार के नकारात्मक पहलू का एक उदाहरण अमेरिका में नौकरियों की कटौतियों से जुड़ा है। 2001 में चीन के डब्ल्यूटीओ में शामिल होने के बाद से अमेरिका के निर्माण उद्योग की नौकरियों में भारी कटौती हुई। ज्यादातर अमेरिकी कंपनियों ने चीन में अपने संयंत्र लगाने शुरू कर दिए थे। इस सेक्टर में बढ़ी बेरोजगारी की वजह से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप उभरे। ट्रंप ऐसे कारोबारी गठबंधन के खिलाफ थे, इसलिए 2017 में सत्ता में आते ही उन्होंने अमेरिका को टीपीपी से अलग कर लिया था। अब नए मंच को अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलीवन ने 21वीं सदी की आर्थिक व्यवस्था बताया था।भारत को कितना फायदा

आइपीईएफ के जरिए अमेरिका पूर्वी एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया के साथ नए सिरे से कारोबारी समझौते करना चाहता है। तोक्यो में इस मंच की घोषणा के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समर्थन किया और कहा कि भारत सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करेगा। कई अन्य सदस्य देशों ने इसे लेकर फिलहाल सकारात्मक रुख जताया है। जानकारों के मुताबिक हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सभी देशों को इससे एक जैसा फायदा नहीं होगा।

इसमें कारोबार को लेकर ऐसे नियम होंगे, जिन्हें मानना जरूरी होगा, लेकिन इसमें बाजार तक पहुंच को लेकर गारंटी नहीं होगी। जापान, थाईलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड ने इसका स्वागत किया है लेकिन दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, सिंगापुर ने सतर्क प्रतिक्रिया दी है। जानकारों के मुताबिक, भारत को कारोबार के ऊंचे अमेरिका मानकों से दिक्कत हो सकती है। इसलिए भारत इसके जोखिमों से बचना चाहेगा।

क्या कहते हैं जानकार

आइपीईएफ में कुछ ऐसे बिंदु हैं, जो भारत के अनुकूल नहीं लगते। मसलन, डिजिटल गवर्नेंस की बात की गई है, लेकिन इसके फार्मूले में कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनका भारत सरकार की नीतियों से सीधे टकराव है। डाटा लोकलाइजेशन और क्रास-बार्डर डाटा फ्लो पर सरकार का अमेरिकी कंपनियों से लगातार टकराव होता रहा है।

  • प्रबीर डे, प्रोफेसर, रिसर्च एंड इंफारमेशन सिस्टम फार डेवलपिंग कंट्रीज
    (विदेश मंत्रालय का थिंक टैंक)

आइपीईएफ अमेरिका का एशिया प्रशांत क्षेत्र से आर्थिक संबंध बनाने का माध्यम होगा। इस पहल से वह खाई भर जाएगी, जो अमेरिका के ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) से खुद को अलग करने से पैदा हुई थी। शामिल होने वाले देशों को व्यापार, श्रम मानदंडों और पर्यावरण कसौटियों के बारे में नए नियम स्वीकार करने होंगे।

  • जयंत मेनन, सीनियर फेलो, सिंगापुर स्थित थिंक टैंक आइएसईएएस

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