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ई कचरा : अब पर्यावरण को क्षति नहीं

एनआइटी-मिजोरम, सीएसआइआर-खनिज और पदार्थ प्रौद्योगिकी संस्थान (आइएमएमटी), भुवनेश्वर और एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, मोदीनगर के वैज्ञानिकों ने ई-कचरे से सोने और चांदी जैसी कीमती धातुओं को निकालने की नई विधि विकसित की

Author February 26, 2019 8:48 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो सोर्स ; C R Sasikumar)

पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ी समस्या बन चुके ई-कचरे का निपटान का तरीका भारतीय शोधकर्ताओं ने खोज निकाला है। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बगैर ई-कचरे का पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) का तरीका राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी), मिजोरम समेत कई संस्थानों के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। इस तरीके में ई-कचरे में इस्तेमाल किए जाने वाले सोना, चांदी, तांबे जैसी कई धातुओं को अलग से निकाला जा सकता है। औद्योगिक स्तर पर ई-कचरे के रीसाइक्लिंग से करोड़ों के कारोबार की संभावना जताई जा रही है।

अब तक पुराने हो चुके फोन, कंप्यूटर, प्रिंटर आदि का गलत तरीके से निपटारा पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ी समस्या माना जा रहा था। कई देशों में ई-कचरे को जमीन में दबा दिए जाने की परिपाटी रही है। या फिर ऐसे कचरे को तोड़कर धातुओं को अलग-अलग निकाला जाता है। ऐसे उपकरणों में सोना, चांदी और तांबे जैसी कई कीमती धातुओं को इलेक्ट्रॉनिक कचरे से अलग करने के लिए असंगठित क्षेत्र में हानिकारक तरीके अपनाए जाते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों के द्वारा विकसित की गई विधि की मदद से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना ई-कचरे का पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) हो सकता है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआइटी), मिजोरम, सीएसआइआर- खनिज और पदार्थ प्रौद्योगिकी संस्थान (आइएमएमटी), भुवनेश्वर और एसआरएम इंस्टीट्यूट आॅफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, मोदीनगर के वैज्ञानिकों ने मिलकर ई-कचरे से सोने और चांदी जैसी कीमती धातुओं को निकालने के लिए माइक्रोवेव ऊष्मायन (इंक्यूबेशन) और अम्ल निक्षालन (एसिड नाइट्रोजन) जैसी प्रक्रियाओं को मिलाकर नई विधि विकसित की है।

यह नई विधि सात चरणों में काम करती है। सबसे पहले माइक्रोवेव भट्टी में 1450-1600 डिग्री सेंटीग्रेड ताप पर 45 मिनट तक ई-कचरे को गरम किया जाता है। गरम करने के बाद पिघले हुए प्लास्टिक और धातु के लावा को अलग किया जाता है। इसके बाद सामान्य धातुओं का नाइट्रिक अम्ल और कीमती धातुओं का रेजिया की मदद से रसायनिक पृथक्करण किया जाता है। सांद्र नाइट्रिक अम्ल लारा जमा हुई धातुओं को शुद्ध करके निकाल लिया जाता है। माइक्रोवेव भट्टी में ई-कचरे को गर्म करते हुए इस अध्ययन में उपयोग किए गए ई-कचरे में पुराने कंप्यूटर और मोबाइलों के स्क्रैप प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी) से निकाली गई एकीकृत चिप (आइसी), पोगो पिन, धातु के तार, एपॉक्सी बेस प्लेट, इलेक्ट्रोलाइट कैपेसिटर, बैटरी, छोटे ट्रांसफार्मर और प्लास्टिक जैसी इलेक्ट्रॉनिक सामग्री शामिल थी।

अध्ययन के दौरान 20 किलोग्राम ई-कचरे को पहले माइक्रोवेव में गरम किया गया और फिर अम्ल शोधन किया गया। इससे लगभग तीन किलोग्राम धातु उत्पाद प्राप्त किए गए हैं। इस प्रक्रिया में बिजली की खपत भी बहुत कम होती है। इस विधि के बारे में अध्ययनकर्ताओं में राजेंद्र प्रसाद महापात्रा, डॉ. सत्य साईं श्रीकांत, डॉ. बिजयानंद मोहंती और रघुपत्रुनी भीम राव शामिल थे। यह अध्ययन शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित किया गया है। डॉ. सत्य साईं श्रीकांत और डॉ. बिजयानंद मोहंती और प्रमुख शोधकर्ता राजेंद्र प्रसाद महापात्रा ने बताया कि ई-कचरा रासायनिक या भौतिक गुणों में घरेलू या औद्योगिक कचरों से काफी अलग होता है। जीवों के लिए खतरनाक होने के साथ-साथ ई-कचरे का रखरखाव चुनौतीपूर्ण है।

आमतौर पर ई-कचरे से कीमती धातुएं प्राप्त करने के लिए मैफल भट्टी अथवा प्लाज्मा विधि के साथ रसायनिक पृथक्करण प्रक्रिया का उपयोग होता है।
इन वैज्ञानिकों के अनुसार, ‘पारंपरिक विधियों की तुलना में माइक्रोवेव ऊर्जा वाली यह नई विकसित की गई विधि कम समय, कम बिजली की खपत और अपेक्षाकृत कम तापमान पर ई-कचरे से कीमती धातुओं को दोबारा प्राप्त करने वाली एक पर्यावरण अनुकूल, स्वच्छ और किफायती प्रक्रिया के रूप में उभरी है।’

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