DUSU Elections: दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव को लेकर गुरुवार को नामांकन दाखिल किए जाएंगे। लेकिन इस साल दाखिला लेने वाले प्रथम वर्ष के कई छात्रों के कालेज पहचान पत्र (आइडी कार्ड) अभी तक नहीं बन पाए हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय ने बुधवार को स्पष्ट किया कि डीयू के प्रथम सत्र के जिन छात्रों को अभी तक आइडी कार्ड नहीं मिला है, वे दाखिला पर्ची दिखाकर चुनाव लड़ने के लिए नामांकन दाखिल कर सकते हैं।

डूसू के मुख्य चुनाव अधिकारी ने कहा कि जिन छात्रों को अभी तक पहचान पत्र नहीं मिले हैं, वे फीस रसीद, पासपोर्ट साइज फोटो लगा प्रमाणित पत्र और कोई भी सरकारी पहचान पत्र दिखाकर नामांकन कर सकते हैं। बता दें कि डूसू चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए छात्र पहचान पत्र जरूरी होता है। किसी भी दल या संगठन की ओर से नामित पर्चा नहीं भरा जाता।

डूसू में केवल नियमित छात्र ही उम्मीदवार

छात्र संगठनों के डूसू उम्मीदवार भी बतौर छात्र और अपने संस्थान का उल्लेख करते हुए प्रशासन के सामने अपनी दावेदारी रखते हैं। यह अलग बात है कि पर्चा दाखिल होते ही वे अपने-अपने खेमे से मैदान में उतरकर प्रचार में जुट जाते हैं। डूसू में केवल नियमित छात्र ही उम्मीदवारी कर सकता है।

पत्राचार वाले छात्रों को चुनाव लड़ने की मनाही है। स्रातक छात्रों के लिए उम्र सीमा 17 से 22 साल, जबकि स्रातकोत्तर छात्रों के लिए यह सीमा 25 साल तक है। नामांकन पत्र 500 रुपए के हलफनामों के साथ गुरुवार को दोपहर तीन बजे तक ही जमा किया जा सकेगा।

वाहनों की आवाजाही पर रोक

विश्वविद्यालय के कुलसचिव की ओर से जारी निशा निर्देश के तहत गुरुवार और शुक्रवार को परिसर के छात्र मार्ग, प्रोबिन रोड, यूनिवर्सिटी रोड और जीसी नारंग मार्ग पर गाड़ियों की आवाजाही पर रोक रहेगी। 11 सितंबर को परिसर का गेट नंबर चार भी 10 बंद रहेगा। सभी संकाय सदस्य, अधिकारी और छात्र को निर्देश दिया गया है कि वे गेट नंबर एक का प्रयोग करें। विवि प्रशासन का कहना है कि इससे लिंगदोह की अवधारणा को लागू करने में बल मिलेगा।

सुरक्षित आवास बना सबसे बड़ा मुद्दा

छात्र संघ चुनाव के प्रचार के दौरान शुरुआत में महिला सुरक्षा और नीट आंदोलन की उपलब्धियों को वाम संगठनों और एनएसयूआइ ने प्रमुख मुद्दा बनाया था। वहीं, हाल ही में शुरू हुई यू-स्पेशल बसों की सुविधा को एबीवीपी छात्रों के बीच भुना रही थी।

लेकिन अब सत्य निकेतन इमारत मामले ने इन सभी मुद्दों को पीछे छोड़ दिया है। परिसर में इस समय सुरक्षित आवास सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है। छात्र संगठनों के बीच छात्रावास की कमी, महंगे पीजी जैसे मुद्दों पर चर्चा तेज हो गई है। इन मुद्दों का असर खासकर नए और प्रथम वर्ष के छात्रों पर पड़ रहा है।

एबीवीपी ने बदली रणनीति

सत्य निकेतन प्रकरण में भी एनएसयूआइ ने सक्रियता दिखाई, जिसका छात्रों के बीच सकारात्मक संदेश गया। छात्रों के बीच बढ़ती नाराजगी को एबीवीपी ने भांप लिया। इसके बाद संगठन ने अपनी रणनीति में बदलाव किया। सत्य निकेतन प्रकरण में एबीवीपी ने न केवल विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ विरोध जताया, बल्कि दिल्ली सरकार और निगम सरकार का भी खुलकर विरोध किया।

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