दशहरा उत्सव के बीच मथुरा के एक मंदिर में हुई रावण की आराधना, आयोजक बोले- राम को दिया था जीत का आशीर्वाद

कार्यक्रम का आयोजन लंकेश मित्र मंडल की ओर से यमुदा नदी के किनारे किया गया। यहां हर साल रावण की पूजा की जाती है।

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कृष्ण की नगरी मथुरा के शिव मंदिर में वैदिक मंत्रों और शंख की आवाज के बीच रावण की पूजा की गई। (फाइल फोटो)

दशहरा पर जब सारा देश भगवान राम की लंका पर विजय के प्रतीक के रूप में उत्सव मना रहा था, तब यूपी के मथुरा के एक मंदिर में लंकाधिपति रावण की पूजा की जा रही थी। कृष्ण की नगरी मथुरा के शिव मंदिर में वैदिक मंत्रों और शंख की आवाज के बीच रावण की पूजा की गई।

पीटीआई के मुताबिक, कार्यक्रम का आयोजन लंकेश मित्र मंडल की ओर से यमुदा नदी के किनारे किया गया। यहां हर साल रावण की पूजा की जाती है।

गौरतलब है कि दशहरा का दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन भगवान राम ने रावण वध कर धरती को अत्याचार से मुक्त किया था। सदियों से हमारे देश में दशहरे को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाते हैं।

रावण वध के तौर पर रावण का पुतला दहन किया जाता है, लेकिन मथुरा में एक अलग तरह की पूजा हुई। हालांकि, वहीं इलाके के डीएम का कहना है कि इस मौके पर कोई अप्रिय घटना नहीं हुई है।

लंकेश मित्र मंडल ने कहा कि मंदिर में रावण की पूजा से पहले भगवान शिव को दही, दूध, शहद, घी और खांडसारी से स्नान कराया जाता है। संस्था का कहना है कि रावण की भूल क्षमा की जानी चाहिए। रावण ने लक्ष्मण के अपमानजनक कृत्य का बदला लेने के लिए मां जानकी का हरण किया था। लक्ष्मण ने उनकी बहन सूर्पनखा का अपमान किया था।

मंडल ने दावा किया कि रावण ने राम के लिए पुजारी का काम किया था। रावण ने उन्हें जीत का आशीर्वाद भी दिया था।

मंडल के अध्यक्ष एडवोकेट ओमवीर सारस्वत ने कहा कि जैसे फसलों को जलाने का विरोध हो रहा है वैसे ही रावण के पुतला दहन को लेकर भी सरकार को नीति बनानी चाहिए। उनका कहना है कि वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखने जा रहे हैं। लंकापति रावण जैसे विद्वान का हर साल पुतला जलाना एक कुरीति है। हिंदू धर्म में एक बार ही व्यक्ति के अंतिम संस्कार करने की व्यवस्था है, लेकिन हमारे समाज में पुतला दहन की कुरीति प्राचीन समय से गलत आधारों पर अपनाई जा रही है। उनकी संस्था इस कुरीति का विरोध करती है।

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