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तालीम: सीख और स्क्रीन

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र विशु कार्तिक की राय में अहम यह नहीं कि कोई आदमी स्क्रीन देखने में कितना वक्त बिता रहा है। इसके बजाए किसी व्यक्ति की कुशलता पर इस बात का असर ज्यादा पड़ता है कि वह देख क्या रहा है और उसका संदर्भ क्या है। साफ है कि उत्पादक और अनुत्पादक स्क्रीन समय का अंतर करना मौजूदा दौर की एक बड़ी दरकार है।

COVID-19, Coronavirus, Online Education, Corona Warriorऑनलाइन पढ़ाई करते बच्चे (फाइल फोटो)

कोरोना संकट का अंत अभी नहीं हुआ है पर इसके कारण हमारे जीवन और परिवेश में में कई बदलावों ने आकार लेना शुरू कर दिया है। यह बात अब लोग समझने लगे हैं कि कोरोना बाद की दुनिया बिल्कुल वैसी ही नहीं रहेगी जैसी वह इस महामारी से पहले थी। कोरोना के कारण सबसे ज्यादा परिवर्तन जहां अभी से साफ-साफ दिख रहा है, वह है बच्चों की दुनिया। शिक्षण संस्थाओं के लगातार बंद होने से उनकी शिक्षा एक ऐसी राह पर मुड़ चुकी है, जो आभासी तकनीक की राह है।

यह एक बड़ा परिवर्तन है और यह परिवर्तन सिर्फ जीवन और तकनीक का नया साझा ही नहीं बुन रहा, बल्कि इस कारण सूचना तकनीक के साथ जुड़कर कार्य करने, सीखने-सिखाने के नए अनुभव भी सामने आ रहे हैं। ‘अच्छा स्क्रीन समय’ बनाम ‘खराब स्क्रीन समय’ की बहस और चिंता इसी अनुभव की देन है।

आनलाइन शिक्षा पर विशेषज्ञों की स्पष्ट राय है कि है ‘डिजिटल लर्निंग’ में अभिभावकों का निर्देशन, उत्पादक और अनुत्पादक ‘स्क्रीन टाइम’ और एकतरफा वीडियो संबोधन के सत्र के बजाय परस्पर संवाद वाले सत्रों को शामिल किया जाए। फिक्की-एआरआईएसई (अलायंस फॉर री-इमेजनिंग स्कूल एजुकेशन) द्वारा ‘अच्छा स्क्रीन समय बनाम बुरा स्क्रीन समय’ विषय पर आयोजित एक हालिया वेबिनार में विशेषज्ञों की तकरीबन यह आमराय थी कि स्क्रीन शिक्षा का बेहतर माध्यम तभी हो सकता है जब इसके एकतरफा चरित्र को समझते हुए हम इसके इस्तेमाल में कहीं न कहीं समामुदायिकता, परस्पर भागीदारी और संवाद जैसी प्रक्रिया को प्राथमिकता देंगे।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र विशु कार्तिक की राय में अहम यह नहीं कि कोई आदमी स्क्रीन देखने में कितना वक्त बिता रहा है। इसके बजाए किसी व्यक्ति की कुशलता पर इस बात का असर ज्यादा पड़ता है कि वह देख क्या रहा है और उसका संदर्भ क्या है। साफ है कि उत्पादक और अनुत्पादक स्क्रीन समय का अंतर करना मौजूदा दौर की एक बड़ी दरकार है। दरअसल, यह पूरा मसला शिक्षण के नए अभ्यास से ही नहीं जुड़ा है बल्कि इसके लिए अलग से शिक्षण-प्रशिक्षण की जरूरत है।

शिक्षकों को यह समझना होगा कि वे शिक्षण के लिए एकतरफा व्याख्यान के बजाए परिसंवाद आयोजित करने जैसा तरीका अपनाएं। वास्तव में किसी भी विद्यार्थी पर संवाद और सामग्री की गुणवत्ता का असर पड़ता है न कि इस बात का कितना समय स्क्रीन पर दिया जा रहा है। शैक्षणिक मनोवैज्ञानिक और प्रशिक्षक रवींद्रन तो आगे बढ़कर यह तक कहते हैं कि आनलाइन शिक्षा मौजूदा सूरतेहाल में एक अच्छा विकल्प जरूर है पर हमें इस माध्यम के रचनात्मक इस्तेमाल को लेकर अभी बहुत कुछ सीखना पड़ेगा। वे कहते हैं कि स्क्रीन को लेकर अनियंत्रित भावना का आना खतरनाक है।

उन्हीं के शब्दों में, ‘स्क्रीन पहले भी थे और आधुनिक दुनिया में भी रहेंगे। दो साल से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन दिखाना अच्छा विचार नहीं है। हालांकि दो से तीन साल की उम्र के बच्चों को कोई गतिविधि सिखाने के लिए दो से तीन घंटे का स्क्रीन समय दिया जा सकता है।’ साफ है कि आनलाइन शिक्षा को लेकर हमें अभी कई स्तरों पर जागरूक होना होगा।

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