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बेबस लोग: शहर से की तौबा, गांव में रोजी-रोटी नहीं, पर अब रहना है यहीं

यूपी के बहराइच जिले के एक गांव से पंजाब के अमृतसर कमाने गए थे। वहां एक कमरे में 16-17 लोग रह रहे थे। पैसे खत्म हो गए थे और रोजमर्रा की वस्तुओं की किल्लत होने लगी थी। गांव के दो लोग आठ अप्रैल को साइकिल से अमृतसर से बहराइच के लिए निकल पड़े। रास्ते में भूखे प्यासे 250 किमी दूर अंबाला शहर तक जा पहुंचे। लेकिन वहां पुलिस ने आगे नहीं जाने दिया। पुलिस से बचते बचाते अमृतसर के उसी कमरे में वापस पहुंच गए।’

Author बहराइच | Updated: June 4, 2020 4:48 AM
Corona Virus, Migrant Laborsकोरोना वायरस के चलते लागू लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों का अपने गृह राज्यों की तरफ लौटने का सिलसिला जारी है। (फोटो-विडियो स्क्रीनशॉट)

बहराइच जिले का राजकमल स्वर्ण मंदिर के शहर अमृतसर में ‘लड्डू करारे’ बेचता था और मजे से परदेस में खा कमा रहा था। लेकिन पूर्णबंदी के दौरान उसने ऐसी विपदा झेली कि अब उसने कभी परदेस नहीं जाने का सबक गांठ बांध लिया है। अब राजकमल गांव लौट आया है और अब यहीं कोई काम करके अपना और अपने परिवार का पेट पालने का फैसला कर चुका है।

बहराइच जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर विशेश्वरगंज ब्लॉक अंतर्गत कुरसहा ग्राम पंचायत के इमरती गांव के 25 वर्षीय राजकमल पांडे की कहानी लाखों प्रवासियों की कहानी जितनी ही पीड़ादायक है। आठवीं कक्षा तक पढ़े राजकमल की छह साल पहले शादी हुई थी। शादी के बाद पत्नी को गांव पर ही रखा और खुद कमाने पंजाब चला गया।

बीच में चार-पांच महीने पर एक आध हफ्ते के लिए घर आ जाता था। बहराइच के अपने पांच भाइयों सहित गांव व आसपास के इलाकों के 15-20 लोगों की टीम के साथ मिलकर राजकमल पांडे अमृतसर के सुंदरनगर के निकट जोड़ा फाटक इलाके में मशहूर लड्डू ‘लड्डू करारे’ बनवाकर बेचने का काम करता था। सभी साथी मेहनत के अनुरूप महीने में 12-15 हजार कमा ही लेते थे। अकेले बहराइच व गोंडा के करीब एक हजार लोग अमृतसर व आसपास के इलाकों में चने की दाल से बने खट्टे ‘लड्डू करारे’ बेचने का व्यापार करते हैं।

राजकमल खाली ने बताया, ‘मार्च में होली पर घर आए थे। कई महीने की बचत यहां घर पर देकर 16 मार्च को वापस अमृतसर पहुंचे। 17-18 साथियों ने 18 मार्च को दोबारा काम शुरू किया। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू, और फिर पूर्णबंदी हो गई। हाथ में कोई बचत नहीं थी।’ राजकमल कहता है, सोशल डिस्टेंंिसग की बात करना बेमानी था, क्योंकि एक ही कमरे में 16-17 लोग रहते थे। सबके पैसे खत्म होने लगे। जल्दी ही खाने पीने व रोजमर्रा जरूरत की वस्तुओं की किल्लत होने लगी।

राजकमल ने बताया, ‘गांव के दो लोग आठ अप्रैल को साइकिल से अमृतसर से बहराइच के लिए निकल पड़े। रास्ते में भूखे प्यासे, पुलिस नाकों पर पंजाब पुलिस से रोते गिड़गिड़ाते या चकमा देते 250 किलोमीटर दूर हरियाणा के अंबाला शहर तक जा पहुंचे। लेकिन वहां पुलिस ने आगे नहीं जाने दिया। पुलिस से बचते बचाते अमृतसर के उसी कमरे में वापस पहुंच गए।’ वह बताते हैं कि कुछ दिन बाद न तो पैसे बचे थे, न ही राशन। कभी कोई राशन दे जाता, कभी गुरुद्वारे या समाजसेवियों के लंगर की शरण लेनी पड़ती थी। जैसे तैसे एक महीना बीता, मन विचलित हो रहा था। इस बीच अमृतसर में थाने पर जाकर कई बार अपनी जानकारी लिखवाई।

बहराइच में स्थानीय विधायक सुभाष त्रिपाठी को फोन पर व्यथा बताई तो उन्होंने भी आनलाइन पोर्टल पर पंजीकरण करवा कर मदद की कोशिश की। उन्होंने बताया कि 11 मई को श्रमिक स्पेशल ट्रेन में नंबर आया। इससे वह घर के नजदीकी स्टेशन गोण्डा जंक्शन उतरकर सरकारी बस द्वारा बहराइच अपने गांव पहुंच गए। कोरोना संक्रमण की जांच में राजकमल स्वस्थ पाया गया और गांव स्थित घर के बाहर बरामदे में ही एकांतवास पूरा किया।

राजकमल के मुताबिक सरकार से उसे अभी तक सिर्फ एक बार राशन किट व पंजाब से गांव तक का ट्रेन का किराया मिला है। उसे अभी तक न तो मनरेगा के तहत कोई काम की जानकारी है और न ही सरकार से स्थायी अथवा अस्थायी नौकरी की सूचना! दूर दूर तक रोजी रोटी का कोई जरिया नहीं सूझ रहा है लेकिन फिर भी राजकमल ने फैसला कर लिया है कि अब कमाने परदेस नहीं जाएगा।

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