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शीर्ष अदालत ने कहा, ट्रैक्टर रैली पर फैसला दिल्ली पुलिस के जिम्मे

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कहा कि 26 जनवरी को राजधानी में किसानों की प्रस्तावित ट्रैक्टर रैली कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला है। लिहाजा इसके बारे में फैसला करने का पहला अधिकार दिल्ली पुलिस को है कि राष्ट्रीय राजधानी में किसे प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए।

Author नई दिल्‍ली | Updated: January 19, 2021 7:10 AM
Tractorअपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते किसान। फाइल फोटो।

प्रस्तावित ट्रैक्टर रैली या गणतंत्र दिवस पर समारोहों व सभाओं को बाधित करने की कोशिश करने सहित अन्य सभी प्रकार के प्रदर्शनों पर रोक लगाने के लिए केंद्र की याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस के पास इस मामले से निपटने का पूरा अधिकार है।

मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति विनीत सरन के एक पीठ ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान केंद्र से कहा-क्या यह भी सुप्रीम कोर्ट बताएगा कि पुलिस की क्या शक्तियां हैं और वह इनका इस्तेमाल कैसे करेगी? हम आपको यह नहीं बताने जा रहे कि आपको क्या करना चाहिए। पीठ ने अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल से कहा कि वह इस मामले में 20 जनवरी को आगे सुनवाई करेगा।

पीठ ने कहा, ‘दिल्ली में प्रवेश का मामला कानून व्यवस्था से जुड़ा है और पुलिस इस पर फैसला करेगी। अटार्नी जनरल, हम इस मामले की सुनवाई स्थगित कर रहे हैं और आपके पास इस मामले से निपटने का पूरा अधिकार है।’ केंद्र ने दिल्ली पुलिस के जरिए दायर याचिका में कहा है कि गणतंत्र दिवस समारोहों को बाधित करने की कोशिश करने वाली कोई भी प्रस्तावित रैली या प्रदर्शन देश के लिए शर्मिंदगी का कारण बनेगा।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि दिल्ली में प्रवेश की अनुमति देने और नहीं देने के बारे में फैसला पुलिस को ही करना है क्योंकि अदालत प्रथम प्राधिकारी नहीं है। पीठ ने वेणुगोपाल से कहा कि शीर्ष अदालत कृषि कानूनों के मामले की सुनवाई कर रही है और हमने पुलिस की शक्तियों के बारे में कुछ नहीं कहा है। इसके साथ ही अदालत ने सवाल किया-क्या किसान संगठन आज पेश हो रहे हैं? वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने कहा कि वे इस मामले में कुछ किसान संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

एक किसान संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील एपी सिंह ने पीठ को बताया कि उन्होंने एक हलफनामा दाखिल किया है। इस हलफनामे में कृषि कानूनों के मामले को सुलझाने के लिए अदालत द्वारा नियुक्त समिति के शेष तीन सदस्यों को हटाने और ऐसे लोगों को चुनने का अनुरोध किया गया है जो आपसी सद्भाव के आधार पर काम कर सकें।

जजों ने कहा-हम उस दिन (सुनवाई की अगली तारीख) सभी की याचिका पर सुनवाई करेंगे। अदालत ने 12 जनवरी को एक अंतरिम आदेश में अगले आदेश तक नए कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी और दिल्ली की सीमाओं पर विरोध कर रहे किसान संगठनों व केंद्र के बीच गतिरोध के समाधान पर अनुशंसा करने के लिए चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। समिति में भारतीय किसान यूनियन के भूपेंद्र सिंह मान, अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान के दक्षिण एशिया के निदेशक डाक्टर प्रमोद कुमार जोशी, कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और शेतकरी संगठन के अध्यक्ष अनिल घनवट को शामिल किया गया था। बाद में मान ने खुद को समिति से अलग कर लिया था।

अदालत ने 12 जनवरी को कहा था कि इस मामले में आठ हफ्ते बाद आगे सुनवाई करेगी तब तक समिति इस गतिरोध को दूर करने के लिए अपने सुझाव दे देगी। महत्त्वपूर्ण है कि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आए हजारों किसान पिछले एक महीने से भी अधिक समय से दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर तीनों नए कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग करते हुए धरना प्रदर्शन कर रहे हैं।

‘ट्रैक्टर रैली निकालना हमारा संवैधानिक अधिकार’

किसान संगठन के नेताओं ने सोमवार को कहा कि शांतिपूर्वक ट्रैक्टर रैली निकालना किसानों का संवैधानिक अधिकार है और 26 जनवरी को प्रस्तावित इस रैली में हजारों लोग भाग लेंगे। किसान राजपथ और उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्रों में रैली नहीं निकालेंगे। वे केवल दिल्ली में आउटर रिंग रोड पर रैली निकालेंगे। किसान नेताओं ने कहा कि इससे आधिकारिक गणतंत्र दिवस परेड में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी।

भारतीय किसान यूनियन (लखोवाल) पंजाब के महासचिव परमजीत सिंह ने कहा, ‘हम दिल्ली की सीमाओं पर अटके हुए हैं। हमने इन सीमाओं पर बैठने का फैसला स्वयं नहीं किया था, हमें दिल्ली में प्रवेश करने से रोका गया। हम कानून-व्यवस्था बाधित किए बिना शांतिपूर्वक रैली निकालेंगे। हम हमारे संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करेंगे और निश्चित ही दिल्ली में प्रवेश करेंगे।’ अखिल भारतीय किसान सभा के उपाध्यक्ष (पंजाब) लखबीर सिंह ने कहा कि किसान 26 जनवरी को आउटर रिंग रोड पर ट्रैक्टर ट्राली निकालने के बाद प्रदर्शन स्थलों पर लौटेंगे।

किसान संगठनों और सरकार के बीच 10वें दौर की बातचीत कल

तीन कृषि कानूनों को लेकर सरकार और किसान संगठनों के बीच मंगलवार को होने वाली 10वें दौर की वार्ता अब बुधवार को होगी। कृषि मंत्रालय ने किसान संगठनों को यह जानकारी दी। इससे एक दिन पहले सरकार ने सोमवार को कहा कि दोनों पक्ष मामले का जल्द समाधान चाहते हैं लेकिन अलग विचारधारा के लोगों की संलिप्तता की वजह से इसमें देरी हो रही है।

अब सरकार-किसान संगठनों के बीच बुधवार दोपहर 2 बजे 10वें दौर की वार्ता प्रस्तावित है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले को सुलझाने के मकसद से गठित समिति भी मंगलवार को अपनी पहली बैठक करेगी। 10वें दौर की वार्ता से पहले मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और ओड़ीशा के 270 कृषि उत्पादक संघों के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री रूपाला से मुलाकात की और तीनों कानूनों को वापस न लेने की अपील की। दूसरे कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी भी इस बैठक में उपस्थित थे।

रूपाला ने सरकार का यह पक्ष दोहराया कि नए कृषि कानून किसानों के हित में हैं और कहा कि जब भी कोई अच्छा कदम उठाया जाता है तो इसमें अड़चनें आती हैं। मामले को सुलझाने में देरी इसलिए हो रही है क्योंकि किसान नेता अपने हिसाब से समाधान चाहते हैं। रूपाला ने कहा, ‘जब किसान हमसे सीधी बात करते हैं तो अलग बात होती है लेकिन जब इसमें नेता शामिल हो जाते हैं, अड़चनें सामने आती हैं। अगर किसानों से सीधी वार्ता होती तो जल्दी समाधान हो सकता था।’ उन्होंने कहा कि चूंकि विभिन्न विचारधारा के लोग इस आंदोलन में प्रवेश कर गए हैं, इसलिए वे अपने तरीके से समाधान चाहते हैं।
उन्होंने कहा, ‘दोनों पक्ष समाधान चाहते हैं, लेकिन दोनों के अलग-अलग विचार हैं। इसलिए विलंब हो रहा है। कोई न कोई समाधान जरूर निकलेगा।’ पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों के किसान दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर पिछले लगभग 50 दिनों से तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं।

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने इस बीच डिजिटल माध्यम से एक कार्यक्रम में कहा कि तीनों कृषि कानून किसानों के लिए लाभकारी होंगे। उन्होंने कहा, ‘पिछली सरकारें भी ये कानून लागू करना चाहती थीं लेकिन दबाव के कारण वे ऐसा नहीं कर सकीं। मोदी सरकार ने कड़े निर्णय लिए और ये कानून लेकर आई। जब भी कोई अच्छी चीज होती है तो अड़चने भी आती हैं।’

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