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दुर्गोत्सव पर छाया, कोरोना का काला साया

मूर्तिकार मिंटू पाल के मुताबिक देश छोड़ इस बार विदेश से मिलने वाले आर्डर में भारी गिरावट आई है। उन्होंने बताया कि हर साल कुम्हारटोली से देवी दुर्गा समेत लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश व कार्तिक की 150 से 170 मूर्तियां विदेश भेजी जाती थीं, लेकिन इस साल इनकी संख्या घटकर केवल 20 से 25 रह गई है। विदेश जाने वाली मूर्तियों की संख्या में इतनी गिरावट क्यों आई? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि मार्च के आखिरी सप्ताह यानी पूर्णबंदी (लॉकडाउन) की पहली पारी से ही कुम्हारटोली में कई जगह बैनर लगा दिए गए थे, जिन पर अंग्रेजी में लिखा है- फॉरेनर्स नॉट अलाउड (विदेशियों को अनुमति नहीं)। इस वजह से विदेशी आर्डर कम मिले। मूर्तिकार कौशिक घोष कहते हैं कि कोरोना के कारण ज्यादातर मूर्तिकारों के पास काम नहीं है। सब हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं।

Author कोलकाता | Published on: July 9, 2020 1:16 AM
कोरोना वायरस की वजह से इस बार दुर्गा पूजा की तैयारी नहीं की जा रही है। इससे मूर्तिकारों का काफी नुकसान हो रहा है।

शंकर जालान
जी हां, कोरोना का काला साया सूबे के प्रमुख त्योहार यानी दुर्गोत्सव को प्रभावित कर रहा है। हालांकि दुर्गोत्सव में अभी साढ़े तीन महीने से भी अधिक समय शेष है, लेकिन मूर्ति निर्माण का समय निकल गया है और दिन-प्रतिदिन निकलता जा रहा है। इस वजह से उत्तर कोलकाता स्थित मूर्तिकारों के मठ कहे जाने वाले कुम्हारटोली के करीबन 450 मूर्तिकारों को रोजी-रोटी की चिंता सताने लगी है।

मूर्तिकारों के संगठन कुम्हारटोली मृतशिल्प संस्कृति समिति का कहना है कि आश्विन शुक्ल पक्ष (सितंबर-अक्तूबर) में होने वाले कहीं नौ और कहीं पांच दिवसीय दुर्गोत्सव के लिए हर साल प्रतिमा निर्माण का आर्डर होली (मार्च) के दिन से मिलने शुरू हो जाते है। यहां बनने वाली 4000 मूर्तियों में से 5 फीसद का आर्डर और अग्रिम भुगतान होली पर मिल जाता है।

इसके बाद बांग्ला नववर्ष (पोइला बैशाख, 14 अप्रैल), अक्षय तृतीया और रथयात्रा तक यहां लगभग सभी मूर्तिकारों को पर्याप्त काम यानी आर्डर और अग्रिम पैसा मिल जाता था और सावन (जुलाई) से ये मूर्तिकार युद्धस्तर पर मूर्ति गढ़ने जुट जाते थे, लेकिन इस साल कोरोना महामारी की वजह से स्थिति बिल्कुल विपरीत है।

समिति की तरफ से बताया गया कि अपनी व्यथाओं का जिक्र करने हुए और आर्थिक मदद की अपील करते हुए राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खत लिखा गया था, लेकिन अभी कोई उत्तर नहीं आया।

कुम्हारटोली की महिला मूर्तिकार चाइना पाल ने बताया कि विगत वर्षों तक वे जुलाई में अपने गोला (मूर्ति निर्माण की जगह) पर नो आर्डर की तख्ती लगाकार तन्मयता से एक चाल (एक साथ पांचों मूर्ति) की प्रतिमा बनाने में जुट जाती थीं, लेकिन इस बार अभी तक आर्डर का इंतजार कर रही हंै। उन्होंने कहा कि कोरोना को लेकर मौजूदा वक्त में जो स्थिति है और आगामी 2-3 महीने को लेकर जो आशंका जताई जा रही है, उसे देखते हुए बगैर आर्डर के मूर्ति गढ़ने की वे हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।

उन्होंने कहा कि आर्डर नहीं मिलने और प्रतिमा न बनने व न बिकने पर केवल आमदनी का नुकसान होगा, लेकिन अगर बिना आर्डर के मूर्ति बना ली और वह न बिकी तो आमदनी छोड़ लागत का भी नुकसान होगा।

मूर्तिकार समीर मल्लिक ने बताया कि ऐसी विकट स्थिति उन जैसे मूर्तिकारों ने इससे पहले कभी नहीं देखी। उन्होंने कहा दुर्गोत्सव तो अवश्य मनाया जाएगा, लेकिन बेहद सूक्ष्म रुप में, क्योंकि आयोजकों का बजट कम है, प्रायोजकों का अभाव है, सरकारी दिशा-निर्देश हैं और लोगों में कोरोना को लेकर भय है।

मल्लिक ने बताया कि इस बार कोरोना की मार हम जैसे मूर्तिकारों के अलावा आलोक सज्जा, पंडाल निर्माणकर्ता, सजावटी सामान बनाने वालों के साथ-साथ बैंड पार्टी और ताशा बाजा (विसर्जन) वालों पर भी पड़ेगी।

कांफेडरेशन आफ वेस्ट बंगाल ट्रेड एसोसिएशंस के अध्यक्ष सुशील पोद्दार बताते हैं कि सूबे में दुर्गापूजा के दौरान लगभग 3000 करोड़ रुपए का कारोबार होता था। पूजा पंडाल के निर्माण से लेकर बाजार में खरीदारी भी इसका हिस्सा होती थी, लेकिन कोरोना के कारण सुस्त अर्थव्यवस्था व बाजार की स्थिति को देखते हुए यह कारोबार 20 से 25 फीसद तक सिमट जाने की पूरी संभावना है। कई मूर्तिकार कुछ छोटी-छोटी प्रतिमा जरूर बना रहे हैं, लेकिन इनसे होने वाली कमाई से घर-परिवार चलाना मुश्किल होगा।

कम रहेगा दुर्गापूजा का कारोबार
कांफेडरेशन आॅफ वेस्ट बंगाल ट्रेड एसोसिएशंस के अध्यक्ष सुशील पोद्दार बताते हैं कि बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान लगभग 3000 करोड़ रुपए का कारोबार होता था। पूजा पंडाल के निर्माण से लेकर बाजार में खरीदारी भी इसका हिस्सा होती थी, लेकिन कोरोना के कारण सुस्त अर्थव्यवस्था व बाजार की स्थिति को देखते हुए यह कारोबार 20 से 25 फीसद तक सिमट जाने की पूरी संभावना है।

मूर्तिकार समीर मल्लिक ने बताया कि ऐसी विकट स्थिति उन जैसे मूर्तिकारों ने इससे पहले कभी नहीं देखी। उन्होंने कहा दुर्गोत्सव तो अवश्य मनाया जाएगा, लेकिन बेहद सूक्ष्म रुप में, क्योंकि आयोजकों का बजट कम है, प्रायोजकों का अभाव है, सरकारी दिशा-निर्देश हैं और लोगों में कोरोना को लेकर भय है।

मल्लिक ने बताया कि इस बार कोरोना की मार हम जैसे मूर्तिकारों के अलावा आलोक सज्जा, पंडाल निर्माणकर्ता, सजावटी सामान बनाने वालों के साथ-साथ बैंड पार्टी और ताशा बाजा (विसर्जन) वालों पर भी पड़ेगी।

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