दिल्ली के दरियापुर कलां गांव में रहने वाले किसान सत्यवान सहारावत के सामने बासमती धान की खेती में कई चुनौतियां हैं। इनमें सबसे बड़ी दो समस्याएं हैं-पानी और मजदूर।
पारंपरिक तरीके से धान की खेती में सबसे पहले खेत में पानी भरकर बार-बार जुताई की जाती है। इस प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में पडलिंग कहा जाता है। इसके बाद नर्सरी में तैयार पौधों को मुख्य खेत में रोपा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में बहुत ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है।
सत्यवान सहारावत बताते हैं, “सिर्फ पडलिंग में ही तीन बार सिंचाई जितना पानी खर्च हो जाता है। रोपाई के बाद पहले तीन हफ्तों तक हर दूसरे दिन खेत में 4 से 5 सेंटीमीटर पानी बनाए रखना जरूरी होता है। इसके बाद भी हफ्ते में एक बार सिंचाई करनी पड़ती है।”
वर्तमान में सत्यवान सहारावत के पास 54 एकड़ जमीन है, जिसमें से 50 एकड़ में वह बासमती धान की खेती कर रहे हैं।
जानकार बताते हैं कि धान की किस्म के अनुसार सिंचाई की जरूरत अलग-अलग होती है। उदाहरण के लिए पूसा बासमती-1509 की फसल 115 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है, जबकि पूसा बासमती-1121 को 140 से 145 दिन लगते हैं। बारिश कितनी होती है, इस पर भी सिंचाई निर्भर करती है। पूरे सीजन में 20 से 30 बार सिंचाई करनी पड़ सकती है और हर बार प्रति एकड़ 2 लाख लीटर से ज्यादा पानी की जरूरत होती है।
5 जुलाई तक देश में सामान्य से 24.1 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। ऐसे में पानी की बचत किसानों के लिए और भी ज्यादा जरूरी हो गई है। सिर्फ पानी ही नहीं, मजदूरों की भी कमी है। अब किसानों के लिए रोपाई करने वाले मजदूर मिलना भी मुश्किल हो गया है।
इस बारे में सत्यवान सहारावत कहते हैं, “रोपाई करने वाले मजदूरों को मैं प्रति एकड़ 4 हजार रुपये देता हूं। इसके अलावा उनके चाय-पानी और गैस सिलेंडर या लकड़ी की व्यवस्था भी करनी पड़ती है। छोटे किसान, जो यह व्यवस्था नहीं कर पाते, उन्हें 5 हजार रुपये प्रति एकड़ तक खर्च करना पड़ता है।”
DSR तकनीक बनी किसानों की नई उम्मीद
इन चुनौतियों के बीच किसानों के पास अब एक नई तकनीक आ गई है। इसका नाम है डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR)। इस तकनीक में नर्सरी तैयार करने, पौधे उखाड़ने और उन्हें मुख्य खेत में लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। खेत में पडलिंग और लगातार पानी भरने की भी आवश्यकता नहीं होती।
DSR में धान के बीज सीधे खेत में बोए जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे गेहूं की बुवाई की जाती है। असल में पारंपरिक धान की खेती में खेत में भरा पानी खरपतवार को बढ़ने से रोकता है। पानी की वजह से खरपतवार के बीज अंकुरित नहीं हो पाते। इसलिए शुरुआती दिनों में खेत में लगातार पानी बनाए रखना जरूरी होता है।
लेकिन DSR तकनीक में पानी की जगह हर्बीसाइड का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए ऐसी धान की किस्म चाहिए, जो इमाजेथापायर नाम के हर्बीसाइड को सहन कर सके।
इस बारे में सत्यवान सहारावत बताते हैं कि पहले वह पूसा-1509 और पूसा-1121 की खेती करते थे। ये किस्में इमाजेथापायर को सहन नहीं कर पाती थीं। यह दवा खरपतवार और धान के पौधों में फर्क नहीं कर पाती थी और दोनों को नुकसान पहुंचाती थी।
अब सत्यवान सहारावत पूसा बासमती-1985 और पूसा बासमती-1979 की खेती कर रहे हैं। ये दोनों किस्में इमाजेथापायर हर्बीसाइड टॉलरेंट (HT) हैं। इन्हें नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) ने विकसित किया है।
इन किस्मों को जेनेटिक मॉडिफिकेशन (GM) से नहीं बनाया गया है। इन्हें म्यूटेशन ब्रीडिंग तकनीक से तैयार किया गया है। इस तकनीक में धान के पौधे में पहले से मौजूद ALS जीन में बदलाव किया जाता है।
IARI के पूर्व निदेशक ए.के. सिंह बताते हैं, “ALS जीन ऐसा एंजाइम बनाता है, जो पौधे की बढ़त के लिए जरूरी तीन अमीनो एसिड—ल्यूसीन, आइसोल्यूसीन और वेलीन—बनाने में मदद करता है। सामान्य धान में इमाजेथापायर इस एंजाइम से जुड़कर इन अमीनो एसिड का बनना रोक देता है। नई HT किस्मों में यही जीन बदला गया है, जिससे धान का पौधा सुरक्षित रहता है, जबकि खरपतवार नष्ट हो जाते हैं।”
किसानों का बढ़ता भरोसा
पिछले साल सत्यवान सहारावत ने पूसा बासमती-1985 और पूसा बासमती-1979 की एक-एक एकड़ में खेती की थी। अच्छे नतीजे मिलने के बाद उन्होंने इस साल 20 एकड़ में DSR तकनीक अपनाई। इनमें 16 एकड़ में पूसा बासमती-1985 और 4 एकड़ में पूसा बासमती-1979 लगाई गई।
सत्यवान सहारावत कहते हैं, “इसमें न नर्सरी बनानी पड़ती है और न ही रोपाई के लिए मजदूरों की जरूरत होती है। करीब 30 से 35 प्रतिशत पानी की बचत होती है, क्योंकि खेत में लगातार पानी भरने की जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए सिंचाई करनी होती है।”
सत्यवान सहारावत के मुताबिक, उन्होंने 27 मई से 8 जून के बीच 20 एकड़ में DSR की बुवाई पूरी की। इसके लिए खेत की एक बार जुताई की गई और लेजर लैंड लेवलर से उसे समतल किया गया। इस काम पर प्रति एकड़ करीब 1,500 रुपये खर्च हुए। बुवाई गांव के ही किसान प्रवीण कुमार की 55 हॉर्सपावर ट्रैक्टर से चलने वाली DSR मशीन से कराई गई।
प्रवीण कुमार द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहते हैं, “इस बार मैंने अपनी मशीन से दरियापुर कलां में 200 एकड़ से ज्यादा जमीन में बुवाई की है। मशीन पौधों और कतारों के बीच बराबर दूरी बनाए रखती है। मैंने यह मशीन 1.4 लाख रुपये में खरीदी थी। यह एक घंटे में एक एकड़ की बुवाई कर देती है और इसमें 2.5 से 3 लीटर डीजल खर्च होता है।”
तेजी से बढ़ रहा DSR का दायरा
साल 2025 में इन दोनों HT बासमती किस्मों की खेती करीब 10 हजार एकड़ में हुई थी। IARI के पूर्व निदेशक ए.के. सिंह का अनुमान है कि इस साल यह रकबा बढ़कर 1 लाख एकड़ तक पहुंच सकता है। हालांकि, यह बदलाव सिर्फ बासमती तक सीमित नहीं है।
सवाना सीड्स प्राइवेट लिमिटेड ने अपने ‘फुलपेज’ नाम के बदले हुए ALS जीन का इस्तेमाल करते हुए सावा-134 और सावा-127 नाम के दो गैर-बासमती धान हाइब्रिड विकसित किए हैं।
कंपनी की भारतीय इकाई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अजय राणा कहते हैं, “2024 में हमारे दोनों HT हाइब्रिड 14 हजार एकड़ में लगाए गए थे। 2025 में यह बढ़कर 40 हजार एकड़ हो गया और इस साल 1.20 लाख एकड़ तक पहुंच जाएगा।”
इस 1.20 लाख एकड़ में करीब 45 हजार एकड़ मध्य प्रदेश, 35 हजार एकड़ छत्तीसगढ़, 25 हजार एकड़ पंजाब-हरियाणा और 15 हजार एकड़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हैं। अजय राणा आगे कहते हैं, “HT-DSR तकनीक की मांग तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि पानी और मजदूर दोनों की कमी है। हमारे बीज पूरी तरह बिक चुके हैं और हम मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं।”
सवाना सीड्स ने अपनी ‘फुलपेज’ तकनीक का लाइसेंस बेयर क्रॉपसाइंस, रैलिस इंडिया, श्रीराम बायोसीड, माहिको और सीडवर्क्स इंटरनेशनल को दिया है। वहीं, IARI ने भी माहिको, कावेरी सीड, पायनियर हाई-ब्रेड, पैन सीड्स, यशोदा हाइब्रिड सीड्स और लीडबेत्तर सीड्स के साथ समझौते किए हैं। इससे आने वाले वर्षों में DSR तकनीक का दायरा और तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।
