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परियोजनाओं में देरी के लिए लचर बहाना नहीं दे सकते : क्रिस्टोफर

रक्षा परियोजनाओं में देरी के लिए आलोचनाओं का सामना कर रहे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के प्रमुख एस क्रिस्टोफर ने गुरुवार को कहा कि इसके लिए कोई ‘लचर बहाना’ नहीं बनाया जा सकता और इसमें विलंब के कारणों को सरकार को स्पष्ट किया जा रहा है।

Author कोलकाता | June 24, 2016 4:15 AM
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के प्रमुख एस क्रिस्टोफर

रक्षा परियोजनाओं में देरी के लिए आलोचनाओं का सामना कर रहे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के प्रमुख एस क्रिस्टोफर ने गुरुवार को कहा कि इसके लिए कोई ‘लचर बहाना’ नहीं बनाया जा सकता और इसमें विलंब के कारणों को सरकार को स्पष्ट किया जा रहा है। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि डीआरडीओ विदेशी कंपनियों के साथ न सिर्फ प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार है, बल्कि रक्षा क्षेत्र में किए गए एफडीआइ सुधारों के मद्देनजर उसे अपने उत्पादों का निर्यात भी करना है। सरकार ने सोमवार को रक्षा क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को सौ फीसद हिस्सेदारी रखने की अनुमति देने की घोषणा की थी। उन्होंने यह भी बताया कि सेना अपने पहले चरण की खरीद में टैंक रोधी मिसाइल ‘नाग’ शामिल कर सकती है जिसकी मारक क्षमता ‘थोड़ी कम’ है। डीआरडीओ इसके लिए मिसाइल की चार किलोमीटर की मारक क्षमता का लक्ष्य हासिल करने पर काम करेगा।

डीआरडीओ द्वारा विभिन्न परियोजनाओं पर तामील करने में बार-बार हो रही देरी के बारे में संवाददाता सम्मेलन में पूछे जाने पर एजंसी के महानिदेशक एस क्रिस्टोफर ने कहा कि जब ये कार्यक्रम और परियोजनाएं शुरू की गई थीं तो उन लोगों को जटिलताओं का आभास नहीं था। अगर मैंने कहा है कि सात साल (उत्पाद को सौंपने में लगेंगे) तो सात साल समाप्त होने के बाद कोई मेरा दरवाजा खटखटाएगा। इसलिए यह वर्षों की गलत गणना की समस्या है। दूसरा मुद्दा उन्होंने गौर किया कि उत्पाद को विकसित करने की अवधि के दौरान कई बार रक्षा बलों की आवश्यकता बढ़ जाती है और इसलिए उत्पाद के विकास में कुछ और वक्त लगता है।

क्रिस्टोफर ने कहा कि नया उत्पाद अन्य देशों में भी काफी वक्त लेता है। जब आप पनडुब्बी लेते हैं तो इसमें तीन दशक से कम समय नहीं लगता। हवाई चेतावनी प्रणाली को तैयार करने में अमेरिका में भी 15 साल से कम वक्त नहीं लगता है। इसलिए जब हम उसकी तुलना करते हैं तो हम भी उसी तरह की स्थिति में हैं। ये वे क्षेत्र हैं, जहां हम फंसे हुए हैं। हम आलतू-फालतू बहाना नहीं बना सकते। हम सरकार को इसे स्पष्ट कर रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली डीआरडीओ तीनों सशस्त्र बलों की जरूरतों के हिसाब से उत्पादों और प्रौद्योगिकी को डिजाइन करने और उनका विकास करती है।

उन्होंने कहा कि किसी दिन यह संभावना हो सकती है कि सौ फीसद एफडीआइ के साथ कोई बड़ी कंपनी अपनी प्रौद्योगिकी के साथ आए और हमारे लिए प्रतिस्पर्धा बन जाए। हम प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हैं। सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ पर जोर देने के बारे में पूछे जाने पर क्रिस्टोफर ने कहा कि जहां तक डीआरडीओ का सवाल है तो यह अप्रत्याशित फायदा है। डीआरडीओ प्रमुख ने कहा कि डीआरडीओ प्रौद्योगिकी भारत में तैयार की जाती है। यह बड़ा प्रोत्साहन है। हमने सरकार को डीआरडीओ उत्पादों का निर्यात करने के बारे में कई बार कहा है। अगर मैं आपके स्तर का नहीं हूं तो कई अन्य देश हैं, जो गरीब हैं और वे हमारे उत्पाद लेने को तैयार हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि सेना अपने पहले चरण की खरीद में टैंक रोधी मिसाइल ‘नाग’ शामिल कर सकती है जिसकी मारक क्षमता ‘थोड़ी कम’ है। डीआरडीओ इसके लिए मिसाइल की चार किलोमीटर की मारक क्षमता का लक्ष्य हासिल करने पर काम करेगा। डीआरडीओ जादवपुर विश्वविद्यालय के साथ मिलकर रक्षा बलों के लिए साइबर सुरक्षा और रोबोटिक से संबंधित प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए यहां 100 करोड़ रुपए का अनुसंधान केंद्र भी शुरू करेगा। इस बाबत सरकार संचालित विश्वविद्यालय के परिसर में गुरुवार को ‘जगदीश चंद्र बोस सेंटर फॉर एडवांस्ड टेक्नोलॉजी’ की आधारशिला रखी गई।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित नाग मिसाइल तीसरी पीढ़ी का ‘फायर एंड फॉर्गेट’ निर्देशित मिसाइल है जो बहुत कम थर्मल कान्ट्रास्ट के साथ लक्ष्य का पता लगाने व उस पर वार करने की क्षमता से लैस है। इस मिसाइल की अधिकतम मारक क्षमता चार किलोमीटर है, हालांकि भीषण गर्मी के दौरान नाग मिसाइल यह लक्ष्य हासिल नहीं कर पाता।

क्रिस्टोफर ने कहा-‘हमने रक्षा मंत्री से अनुरोध किया और उन्होंने हमें सेना से यह बात करने को कहा कि पहले चरण में वह हल्की घटाई गई मारक क्षमता और वह भी सुबह 11 बजे से दोपहर तीन बजे तक, के साथ उसे स्वीकार कर सकते हैं। दूसरे चरण में हम लक्ष्य को लेकर कोशिश करेंगे और सुधार करेंगे।’ उन्होंने कहा, ‘अगर आप गर्मी में धूप में घंटों टैंक को छोड़ दें तो टैंक के अंदर और बाहर के तापमान के बीच शायद हीं कोई अंतर रहता है। इसी समय को लेकर हम चार किलोमीटर की मारक क्षमता का लक्ष्य हासिल नहीं कर पा रहे। हमने 3.2 किलोमीटर का लक्ष्य हासिल किया है।’ क्रिस्टोफर ने कहा कि हालांकि शाम चार बजे के बाद मिसाइल चार किलोमीटर तक का लक्ष्य पहचानने में सक्षम होता है।

इस केंद्र के अगले दो साल में तैयार हो जाने की उम्मीद है। यह डीआरडीओ की ‘सेल्फ-एकाउंटिंग’ इकाई के रूप में काम करेगा। डीआरडीओ के प्रमुख एस क्रिस्टोफर ने कहा कि वे लंबे समय से जादवपुर विश्वविद्यालय और कोलकाता में अन्य संस्थानों के साथ काम कर रहे हैं और यहां केंद्र बनाए जाने से उनके कर्मियों को सुगम संप्रेषण और तेजी से डिजाइन हासिल करने में मदद मिलेगी।

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